शनिवार, सितंबर 26, 2020

कैलेंडर

    कैलेंडर की तारीखें रेंगती हुई फिर उसी बिन्दु पर पहुँच गई। जहाँ से दर्द का न ख़त्म होने वाला सिलसिला शुरू हुआ। हाँ! चौथाई सदी गुजर जाने के बाद भी मन का बोझ कम नहीं हुआ।

 दर्द से निजात नहीं मिली है। 

दर्द!”

कौन सा दर्द

कैसा दर्द”

कुछ कर पाने या न कर पाने का दर्द”

कैसा था वह क्षण जब सब कुछ फिसल गया था मेरे हाथों सेयदि मैं चाहती तो बचा सकती थी कैलेंडर की तारीख़ कोइस बिन्दु पर रुकने से। बस् एक बार फिर लहू-लुहान होना था और बच जाता,

हाँ! शायद बच जाता एक टुकड़ा आसमान सांस लेने के लिए और लहुलुहान तो वैसे भी होती रही....”

उस दिन हमेशा की तरह सुबह-सवेरे घर-बाहर के पुरुषों के जागने से पहले शौच के लिए खेतों में गई थी। बस् अन्तर इतना था कि हमेशा घर-गाँव की अन्य महिलाओं के साथ झुण्ड में शौच के लिए जाया करती थी। परन्तु उस दिन पेट में पीड़ा कुछ अधिक हुईसो अकेली ही निकल पड़ी। उपयुक्त स्थान तलाश कर ही रही थी कि जकड़ लिया था कल्लू चौधरी के आवारा लड़के बल्ली ने अपनी बाँहों में और पटकना चाहता था बीच खेत में। तब आत्मरक्षा के लिए जाने कहाँ से शक्ति आ गयी थी। एक झटके के साथ स्वयं को आज़ाद कर सरपट भाग खड़ी हुई। लहूलुहान नंगें पैर लिए गिरते-पड़ते घर पहुँची। घरवालों ने उलटे मुझे ही फटकारा ।

क्यों गई थी तन्हा खेत मेंचौधरी का दबदवा है गाँव में उसके ख़िलाफ़ कौन मुँह खोल सकता है।” माँ ने मुँह बन्द रखने की सलाह दी।  इस सलाह में उनकी दुर्बल स्थिति का अहसास ज़्यादा था सलाह तो कम ही थी।

पिता बिस्तर पर चिपक चुके थे बस् स्मृति मात्र ही नज़र आते थेलगता था न जाने कब उनकी अर्थी की तैयारी करनी पड़ जाये। आधुनिक युग के दो भाई पत्नियाँ के आते हीमाँ-बाप को छोड़कर अलग-अलग शहरों बसने चले गए थे। मेरे साथ थी मेरी विवषतामेरा जीवन और दो मरे समान जीव। तब कौन आवाज़ उठाता, चौधरी के खिलाफ़?

मेरा पहला सामना था इस दूनियाँ की कमीनगी सेतब बच गयी थीमैंमगर वह भेड़िया बेखौफ़ होकर घूम रहा था मेरे आसपास। माँ को एक ही रास्ता सूझा था मुझे सुरक्षित रखने का।

गाँव से दूर भेजकर”

निश्चित हो गयी थी माँ”

कितना भोलापन था माँ मेंबीस साल की मासल देह वाली बेसहारा लड़की को शहर भेजकर, उसे लगा था कि उसने अपनी बेटी को सुरक्षित कर लिया है

भेड़िये कहाँ नहीं होते”,

खेत से तो भागकर बचा लिया था अपने आपको” मगर बंद कमरे की चाहर दिवारी से कहाँ भाग कर जाती। वह पिता के पुराने मित्र का घर था। बहुत सज्जन व्यक्ति थे पिता जी के मित्र। पिता जी ने कभी उनके साथ कुछ ऐसा उपकार किया था कि जिसके लिए वह अपने आपको सदैव ऋणी मानते थे। तभी तो पिता जी ने स्वीकृति दी थी उनके घर रहने की। परन्तु परिवार के गुण संतान में पूरे के पूरे कहाँ आते है। उनका लड़का अपने बाप के स्वभाव से बिलकुल अलग था। मेरा दुख यह था कि पिता तुल्य चाचा को अपने शरीर से बहता खून दिखाकर शर्मसार नहीं करना चाहती थी। सो सहती रहीगर्म सलाखों के दाग नंगे शरीर पर।

एक सपना दिया था मुकेश नेसुन्दर भविष्य का सपनाघर की बहू बनाने का सपना। लेकिन इस घर में आने के लिए चाँदी-सोने से लदी लड़कियों की लम्बी कतार थी। चार पहिये युक्त सुन्दर विज्ञापन वाली लड़कियाँ। मेरा आग्रहअनुमयविनय सब व्यर्थ था।

तब तक मैंने घिसटते-घिसटते बी. ए. कर लिया था। पिता जी स्वर्ग सिधार गए थे। लोक लाज के लिए बड़े भैया गाँव से माँ को अपने साथ ले गए। मुझे मान लिया गया था कि नारी समानता के युग में लड़की नहीं लड़के के समान हूँमैं, अपना भविष्य स्वयं बनाने लिए सक्षम हूँ। अतः भाईयों का कोई दायित्व नहीं है। स्वार्थी बुद्धि कैसे नये-नये बहाने तलाश कर लेती है, अपने आप को बचाने के लिये।

मुझे लगा, बुढें अंकल मजबूर आँखों से ज़िल्लत के साथ मुझे घर से निकलते हुए देखें इससे पहले मैं उन्हें अपने पिता के ऋण से मुक्त करने हुए स्वयं अपना बसेरा कहीं ओर देख लूं।

वक़्त की मार और समय की ज़रूरत ने मुझे काम दिला दिया था एक मोटे थूलथूल से इन्सान की पी.ए. बन गयीवेतन कोई ज़्यादा नहीं थाकाम भी ज़्यादा नहीं। बस् कुछ कपड़ों में बदलाव आना शुरू हुआकुछ जानकारी हुई आज के समाज कीइन्सान के भीतर बैठे भूत को देखने का भी मौका मिला और मालूम हुआ इन्सानइन्सान का शोषण कैसे करता हैकितना गिर जाता है अपने आप सेइन्सानियत सेदूसरे की लाचारी का किस तरह भोग करता है, मज़बूरी  का फ़ायदा आख़िर कहाँ तक उठाया जा सकता हैबहुत कुछ मालूम हुआ मुझे नौकरी के दौरान।

पहली बार एहसास हुआ नारी पर दुर्बलअबलाकमज़ोरलाचारबदचलनवेश्यारन्ड़ीआदि शब्द किस प्रकार बड़े ही साधारण ढंग थोप देता है मेरा समाजनारी की मज़बूरी परयह असामाजिक शब्द मुझे भी सहने और सुनने पड़े लेकिन समाज इन्हें सामाजिक शब्द कहता है।

आख़िर नौकरी छोड़ देनी पड़ी और फिर वहीं बेरोज़गारी। नौकरी के दौरान दो चार मित्र सखा भी बने। अब उनके लिए मैं सार्वजनिक सम्पति समझी जाने लगी। जिसका मन करें और जी में आये वह ही मुझे उपयोग (नौकरी दिलाने के नाम पर) करने की कोशिश करने लगा। मुझे वह भी भगवान का दूत नज़र आता था क्योंकि वह मुझे काम और काम के बदले दाम दिलाने का सहारा देता था कि आज कम्पनी मैंनेजरकभी डायरेक्टर सेकभी मालिक से.... बात करके आया हूँ। हो सके तो कॉफी होम आ जानावहाँ बात करवा दूंगा आमने-सामने। 

आना-जाना तो किसी को भी नहीं होता था बस वह मुझे उपयोग करने लिएमोहरा बनाने के लिए या एक लड़की को एक औरत तक का सफ़र दिखाने के लिए बुलाया जाता था सब सहना पड़ता है भूख के आगे। हाथमन और तन सब फैलाना पड़ता हैशायद ये ही दस्तूर है जीवन के जीने काज़िन्दगी से लड़ने का...।

मेरे मित्रों में रमेश भी था जिसने मुझे वाकई समझने की कोशिश की और उसने काफ़ी हद तक उबारा भी उस दयनीय स्थिति सेनौकरी भी दिलायीउसने मुझे अपने घर में रहने के लिए बुला लियाजहाँ वह अकेला रहता था। परिवार कहीं दूसरी जगह रहता था मगर दिल्ली में ही। दिन कुछ सुगन्धि व राते रंगीन लगने लगी थी। मैं भी जीवन भर की प्यासीरेत की ढेर थी जिसने कभी पानी व स्नेह नहीं देखा थालेकिन ज़िन्दगी अब कुछ रंगीन सी नज़र आने लगी थीकुछ परिवर्तन लग रहा थामैं आसा कर रही थी अपने जीवन में किसी परिर्वतन की। रमेश के आत्मीय व्यवहार ने नई आशाएँ जगाई थीं मन मेंपरन्तु कभी-कभी सपने सच होते ही होते बिखर जाते है। 



एक दिन अचानक रमेश का एक्सीडैंड हो गया। गंभीर हालत में अस्पताल पहुँचाया गया। रमेश की हालत देखकर डॉक्टरों ने आपरेशन का फरमान सुना दियादस हज़ार का ख़र्च! मैं खाली हाथरमेश की कुल जमा पूंजी न के बराबर। कहाँ से हो पैसों का जुगाड़परिचित चेहरों पर नज़र डालीकभी गोपाल सम्पर्क में आया था। बीमा कम्पनी में एजेंट थाऐसे ही किसी के घर पर मेरी भेट हुई थी उससेबहुत शालीन व भोला लगा था मुझे।

कभी कहा था उसने मुझसे- “प्रीति जी मैं आपको कोई जॉब दिलाने का प्रयास करुँगाफिर भी मेरी आवश्यकता पड़े तो निःसंकोच कहनाहिचकना नहीं...”

इस संकट के समय में उसकी याद आई मुझेमैं उसके पास पहुँच गयी, भारीमन से रमेश के एक्सीडैंड का ज़िक्र करते हुए मैंने उससे कहा “मुझे पैसों की सख़्त ज़रूरत है। प्लीज! कैसे भी कर दोमैं आपका एहसान ज़िन्दगी भर नहीं भूलूंगी...”

उसने मेरी बात गंभीरता से सुनी फिर उसके चेहरे पर एक मुस्कान उभरी, “बोला! तो ठीक है रमेश बच जायेगामैं दूगां आपरेशन का पूरा ख़र्चमगर एक शर्त है।”

क्या?”

बस् एक रात मेरे साथ गुजार लो”

यह सुनकर मैं स्तब्ध रह गयी। यह गोपाल ही है क्या?...  “शराफत का चौला उतार फैंका था उसने... किसी मर्द के साथ एक रात गुजारना मेरे लिए कुछ नया नहीं था। लेकिन फिर एक नये मर्द का स्पर्षमेरी मानसिकता और मैं इसे कबूल नहीं कर सके!”

लेकिन, हाँ! कैलेंडर की रुकी हुई तारीख़ पर मेरी निगाहें टिकी थी।

वह फैसले की घड़ी थी।”

रमेश बच सकता है डॉक्टर ने कहाँ था”

अगर आपरेशन के ख़र्च की व्यवस्था हो जाए तो रमेश बच सकता है।”

लेकिन…, रमेश सब कुछ जानता था मेरे बारें मेंमेरा अतीत उससे छिपा नहीं था। शायद उसने मेरा सान्दिय पाकर कहाँ था मुझसे ...”

प्रीति ...वायदा करो अब से तुम्हारा शरीरतुम्हारी आत्म, तुम अब सिर्फ़ मेरी हो...”

मैंने अपने आँसुओं को आँखों में रोक करउसके गले में बाहें डाल कर कहाँ थाहाँ! मूझे कबूल है।”

“लड़कियाँनिकाह के समय यहीं तो कहती है, जैसा सुना था मैंने?”

गोपाल कह रहा था... “बोलो प्रीतिमेरी शर्त मंजूर है तुम्हें?...”

ज़िन्दगी में पहली बार मुझे किसी बात की चुभन महसूस हुई”

न जाने कैसे मेरा हाथ हवा में लहराया और ज़ोरदार थप्पड़ की आवाज़ के साथ जड़ गया गोपाल के गाल पर... और मैं पलट कर भागी अस्पताल की ओर ...”

कहाँ गिरी थी बेहोश होकरअस्पताल की सीड़ियों पर या डॉक्टर के पैरों पर या रमेश की देह पर..... पता नहीं...।

बस् कैलेंडर में एक तारीख़ अंकित हो गई थी। मैं रोक सकती थी इस तारीख़ को....वर्षों गुजरने के बाद भी फैसला नहीं कर सकी हूँ कि गोपाल की बात न मान कर रमेश को मौत में ढकेल दिया है या गोपाल के गाल पर तमाचा मार कर रमेश के विश्वास की लाज रखी है।”

फैसला नहीं कर पाने का दर्द है सीने मेंसाँसें रुकने लगती है जब यह तारीख़, रमेश की मौत की तारीख़ उभर आती है कैलेंडर के विशेष पन्ने पर...”

शुक्रवार, जुलाई 24, 2020

ऑफिस

उसे काम नहीं आता,
रोज़ ऑफिस चला आता है,
जाने उसने वर्षों क्या किया,
खाली राजनीति के बल खड़ा रहा,
ये हैं शासन का ग़ुलाम,
काम इसे भी नहीं आता ,
ये ज़ुबान से भी तेज़ फिसलता है,
केंचुए से भी कम नरम,
इस आदमी की चमड़ी है,
दोस्तों!
दफ़्तर बैरंग है,
कागज़ पर हस्ताक्षर की क़ीमत,
केवल उसके सन्तोष के लिये,
घटे-बढ़े हमें क्या लेना,
शिक्षा तो आँकड़ों से चली है,
कोई न जोड़ पाया है,
बच्चों जो आज उपस्थित है ,
तुम केवल उन्हें गिनों,
जिन्हें सरकार गिनना चाहती है,
क्योंकि छूटे हुए देवताओं,
और देश के लोगों पर ही,
उसका काम आज तक टिका है,
वैसे वो करना नहीं चाहता,
समय उसे काट रहा है, या.....
वह दफ़्तर में दिनों की,
गिनती कर रहा है,
और उसे,
इंतज़ार है तबादले का।













Source: Photo byTirachard Kumtanom 

बुधवार, जुलाई 22, 2020

गरीबी और भूख

भोजन की उपलब्धता से तात्पर्य यह है कि प्रत्येक व्यक्ति का जीवन स्तर ऐसा हो कि जिसमें उसे जीने के लिए खाने की उपलब्धता पर इतनी भर चिन्ता हो कि वह कुछ घण्टे काम करके अपने लिए खाने का प्रबंध कर सकें। यह तब ही मुमकिन है कि जब समाज में गरीबी, भुखमरी और अकाल की स्थिति न हो। गरीबी का अर्थ यह है कि ऐसी वस्तुओं और सेवाओं का अभाव न रहे जो व्यक्ति की आवश्यकताओं को पूरा करती है, चाहे वह आवश्यकताएं मूल हो अथवा सामान्य हों। यह वस्तुएं और सेवाएं कृषि और कृषि से संबंधित संसाधनों से प्राप्त होती है।  
 
भारत में ग़रीबी दूर करने की दिशा में काम कर रहे प्रोफेसर ज़्यां द्रेज़ लिखते है कि भारत में मानव संसाधन के विकास की ओर कभी ध्यान नहीं दिया जाता है, जिसके चलते लोग अनपढ़ हैं उनका स्वास्थ्य ख़राब है और बच्चे भूखे है।  अस्सी के दशक में भारत के प्रधानमंत्री के एक भाषण को देखे तो पता चलता है कि देश में कुपोषण और गरीबी को किस तरह नाकारा गया है “मैंने अपना अधिक समय देश में यात्रा करने में बिताया। विषेष रूप से गत तीन वर्षों में जब मेरे पास कोई सरकारी सवारी नहीं थी, मुझे कोई भी कुपोषण का उदाहरण नहीं मिला। वास्तव में बच्चें अधिक स्वस्थ दिखाई दिए। उनकी आंखें अधिक चमकीली थीं और वे अधिक अच्छे कपड़े पहने हुए थे।’’  जबकि उस वक्त दिल्ली शहर में ही 26 प्रतिशत लोग गंदी बस्तियों में रहते हैं या गरीबी स्तर से बहुत ही नीचे हैं। इसका कारण यह है कि जो भूख और कुपोषण में जीते हैं, उनके पास आर्थिक ताकत की कमी है, वे प्रायः अदृष्य रहते हैं, राजनैतिक रूप में महत्वहीन हैं और असंगठित हैं। क्या यह एक अत्याचार नहीं है कि जनसंख्या के अन्य हिस्सों की तुलना में दलितों और आदिवासियों में पोषण-स्तर कमतर है।

भूखशिक्षा और हाशिये के लोग के बारें में पढ़ें 

सामान्य गरीबी, नियमित भुखमरी या अकाल आदि के प्रभावों की सही समझ-बूझ के लिए समाज के स्वामित्व अधिकारों के स्वरूप और विनिमय अधिकारिताओं तथा उनकी अन्तर्निहित शक्तियों पर गौर करना आवश्यक है, इसके लिए उत्पादन विधाओं की प्रकृति, आर्थिक वर्ग संरचना और उनके अंतरसंबंधों  का सूक्ष्म अध्ययन आवश्यक हो जाता है। इस लेख में वास्तविक अकाल अवस्थाओं के विश्लेषण में इन मुद्दों को और अधिक सुस्पष्ट एवं स्थूल स्वरूप प्राप्त होगा। खाद्य आपूर्ति पर मालीकाना हक़ एक प्रकार का अधिकार है, जो हक़दारी का दावा करता है लेकिन यह दावा भुखमरी के दौर में पूंजीपतियों के लाभ के लिए उपयोग किया गया एक बाजारीय प्रापेंगेन्डा है न की कोई मौलिक अधिकार।
संविधान और भोजन का अधिकार के बारें में पढ़ें 

अतः भुखमरी के विश्लेषण के लिए अधिकारिता की अधिकारिकता की व्यवस्था को समझना होगा। यह बात गरीबी के सन्दर्भ में और भी स्वाभाविक हो जाती है। अकाल या  भुखमरी के दौर में तो यह अपने आप में ही सिद्ध होती प्रतीत है। भारत में भूख पर बात करना चाहते है क्योंकि भारत में भूख अभी भी पर्याप्त रूप से फैली हुई है दुनिया की आबादी का बीस प्रतिशत हिस्सा इसी भारत की सीमाओं में समाया हुआ है।  भारत में लगभग 20 करोड़ लोग रोज़ भूखे सोते हैं और लगभग 5 करोड़ लोग भुखमरी के कगार पर हैं यानि आसानी से कहा जा सकता है कि दुनिया की आबादी में से लगभग 25 करोड़ लोग भुखमरी के कगार पर है।

चरण सिंह ने अपनी किताब “भारत की भयावह आर्थिक स्थिति: कारण और निदान में लिखते हैं कि अमरीका और आस्ट्रेलिया में किसी भी भोजनालय में दो डालर में स्वच्छ और बगैर मिलावट का शुद्ध भोजन मिल सकता है जो आस्ट्रेलिया और अमरीका के मजदूर की एक घंटे की मजदूरी है जबकि भारत के निर्माणकार्य में लगी हुई अकुशल महिला मजदूर को दिन भर काम करने पर पेट भर भोजन ही किसी ढाबे में मिल सकेगा। जीवित रहने के लिए जब पर्याप्त भोजन नहीं मिलता उस स्थिति को भुखमरी कहा जाता है। इसका सीधा सा कारण है खाने को पर्याप्त भोजन न होना। भुखमरी फैलने का एक कारण हो सकता है खाद्य आपूर्ति या हम कह सकते है कि आम आदमी की पहुँच भोजन तक नहीं है।

भारत में नीति-निर्धारकों ने कुछ हद तक कुपोषण की लगातार उपस्थिति को तो स्वीकार कर लिया जाता है और हल भी निकाला है, बेशक वह मुकम्मिल नही होता, किन्तु भयंकर भूख की स्थितियों या दीर्घकालिक भूख की क्षेत्रीय स्थितियों को कम ही स्वीकार किया जाता है, उसका अध्ययन या हल कम ही किया जाता है। जैसा पहले ही कहा गया है स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद शुरू के वर्षों में खाद्य-असुरक्षा का भारी खतरा जो हमारे देश की करोड़ों की आबादी पर मंडरा रहा था वह अकाल और भारी भुखमरी का था जो कम कृषि उत्पादकता का नतीजा था जिसका कारण कृषि उत्पादकता का अस्थिर मानसून पर निर्भर होना और भूमि और खाद्य का अत्यधिक असमान वितरण था। कुछ भूमि-सुधारों, 1974 से 2004 तक मात्र तीन दशकों में खाद्य उत्पादन में हुई भारी वृद्धि, सार्वजनिक वितरण प्रणाली के तहत देश भर में राशन की दुकानों के बड़े जाल द्वारा खाद्य वितरण में लाए गए सुधार के कारण, यह खतरा काफी हद तक टला है। भारत का कल्याण कृषि से अधिक अच्छा और शीघ्रता से किया जा सकता है। कृषि से भोजन और कपड़ा मिल सकता है तथा घरेलू अथवा लघु उद्योग भी उपलब्ध हो जाते है जिन्हें उत्तरोत्तर बढाने की आवश्यकता है और मेहनत-मजदूरी को कम करने की आवश्यकता नहीं है।


भारत में भोजन की स्थिति पर आधिकारिक दृष्टिकोण भोजन-उत्पादन आपूर्ति पक्ष में वृद्धि पर ध्यान केन्द्रित करने का होता है और भुखमरी को अपवाद की रूप में प्रस्तुत किया जाता है, जो अधिकांशत: मानसून की कमी या प्राकृतिक आपदाओं के कारण पैदा हुई। हरित क्रांति ने आश्वस्त किया कि भारत में जनसंख्या में वृद्धि की तुलना में खाद्यान्न-उत्पादन में वृद्धि आगे रहे। दीर्घकालिक कमी की स्थिति से निकल कर देश आज अधिकांश खाद्य-पदार्थों में सरपल्स और निर्यात के युग में आ गया है। देश खाद्यान्न उत्पादन में आत्मनिर्भर है और इस समय हमारे पास लगभग 6 करोड़ टन का बफर स्टॉक है। पर्याप्त उत्पादन हासिल करने के कदमों के साथ-साथ जन वितरण प्रणाली के माध्यम से सही समय पर और वहनीय दरों पर सही गुणवत्ता और मात्रा का खाद्यान्न सही स्थानों और लोगों तक पहुँचाने की आवश्यकता है।

शहरी भारत की भोजन असुरक्षा एटलस के अनुसार शहरों में लोगों द्वारा ली जा रही औसत कैलोरी ग्रामीण इलाकों की तुलना में कम है और शहरी और ग्रामीण भारत, दोनों ही जगह पिछले तीन दशकों में कैलोरीज़ की खपत थोडी़ सी कम हुई है। फिर भी भूख के विरूद्ध जंग अभी भी किसी भी तरह से जीती नहीं गयी है। जनता के दबाव और राज्य की कार्रवाई अकालों को न होने की अपेक्षा भूख पर काबू पाने या पर्याप्त पोषण जोकि न केवल जिंदा रहने के लिए बल्कि एक स्वस्थ और सक्रिय जीवन के लिए आवश्यक है उस वंचना से निपटने में कम सफल रहे हैं।
विश्व की कुल जनसंख्या में से 35 करोड़ लोग ऐसे है जो बिलकुल ही निराश्रित है और जिनके रहने के लिए मकान तक नहीं है और जो सड़कों की पटरियों और पुलों पर रहते है और जिन्हें अपना पेट कूड़ेंदानों और कूड़े के ढेरों से खाद्यान्न बीनकर भरना पड़ता है और अधिकांश इस प्रकार के निराश्रित व्यक्ति भारतीय उपमहाद्वीप में ही रहते है। भुखमरी पर विमर्श का फोकस भुखमरी से मर रहे लोगों पर न होकर उन लोगों पर होना चाहिए जो जीवन के हिस्से के रूप में भुखमरी के साथ जी रहे हैं। इसका गहरा संबंध उतने ही उपेक्षित मुद्दे  दरिद्रता से है, जिस बात को बिलकुल ही महत्व नहीं दिया जाता वह यह है कि भूख से मौत एक बहुत ही चिरकालिक, अदृष्य दरिद्रता की बीमारी का परिणाम है।

हम लोगों को पर्याप्त मात्रा में सन्तुलित आहार का सेवन करना चाहिये, मांस-मछली, दूध-घी, शाक-सब्जी, फल-फूल अधिक से अधिक मात्रा में सेवन करना चाहिए। परन्तु यह कहने से पूर्व क्या हम इस बात को भी सोचते है कि हममें से कितने ऐसे जोग है जो इन पदार्थों का उपयोग करने में समर्थ है।

शनिवार, जून 27, 2020

विद्यालय प्रबन्ध समिति


विद्यालय प्रबन्ध समिति की संरचना कैसी है?
शिक्षा के अधिकार में समुदाय की सक्रिय भागीदारी की परिकल्पना की गयी है। विद्यालय प्रबंध समिति के माध्यम से अभिभावकों की विशेष भूमिका और दायित्व तय किये गये हैं। शिक्षक का दायित्व है कि विद्यालय प्रबंध समिति के सदस्यों को समय-समय पर विद्यालय की कार्यप्रणाली और विभिन्न प्रावधानों, आदि पर जागरूक करें और जोड़ने का प्रयास करें जिससे विद्यालय में एक बेहतर प्रबंधन व्यवस्था से संबंधित मुद्दों पर काम करने के लिये विद्यालय प्रबंध समिति एवं शिक्षक एक साथ मिलकर काम कर सकें।
संरचना एवं गठन
निःशुल्क एवं अनिवार्य बाल शिक्षा का अधिकार अधिनियम, 2009 की धारा 21 के तहत प्रत्येक विद्यालय में एक विद्यालय प्रबन्ध समिति गठित की जाएगी। उत्तर प्रदेश निःशुल्क और अनिवार्य बाल शिक्षा का अधिकार नियमावली, 2011 के अनुसार समिति में कुल 15 सदस्य होगें। 15 सदस्यों में से 11 सदस्य विद्यालय में दाखिला प्राप्त बच्चों के माता-पिता होगें और चार नामित सदस्य होगें। समिति के कुल सदस्यों में से कम से कम 50 प्रतिशत महिलाएं होंगी।
चार नामित सदस्य निम्नलिखित होगें-
1.    स्थानीय प्राधिकारी (पंचायत) द्वारा नामित सदस्य,
2.    एक सदस्य सहायक नर्स एवं मिड वाईफ (ए0एन0एम0),   
3.    एक लेखपाल (जिला मजिस्ट्रेट द्वारा नामित)
4.    विद्यालय के प्रधानाध्यापक विद्यालय प्रबन्ध समिति के सचिव।
Ø  विद्यालय प्रबंध समिति के 11 सदस्यों में एक-एक सदस्य अनुसूचित जाति/ अनुसूचित जन जाति, अन्य पिछडा वर्ग तथा कमजोर वर्ग के बालक के माता-पिता होंगे।  
Ø  विद्यालय के शिक्षक विद्यालय क्षेत्र के दायरे में सभी अभिभावकों की खुली सभा में भागीदारी के लिए व्यापक प्रचार-प्रसार करेगें व बैठक का स्थान, दिनांक तय करें। बैठक के दिन सभी अभिभावकों को बैठक के उद्देश्य बताते हुए विद्यालय प्रबंध समिति सम्बन्धी शासनादेश के प्रमुख बिन्दुओं से अवगत करायेगें।
Ø  विद्यालय प्रबंध समिति के 11 सदस्यों का बैठक में आम सहमति से चुनाव किये जाने के उपरान्त, चयनित 11  सदस्यों द्वारा अपने साथियों में से एक अध्यक्ष एवं एक उपाध्यक्ष का चुनाव आपसी सहमति से करेगें।
Ø  विद्यालय प्रबन्ध समिति समुदाय के अपवंचित वर्गों, यथा- महिला, अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति, मजदूर, किसान, पिछड़ों को समुचित प्रतिनिधित्व दिया जाएगा।
Ø  प्रारम्भिक शिक्षा के विकास में अभिरुचि रखने वाले समर्पित एवं समय देने वाले व्यक्तियों को इसमें शामिल होने का अवसर दिया जाएगा।
Ø  विद्यालय प्रबंध समिति की बैठकों  में गांव में निवासरत् सेवानिवृत्त शिक्षक अथवा अन्य विभाग से सेवानिवृत्त अधिकारी/कर्मचारियों को सम्मिलित किया जाय जिससे विद्यालय के विकास में उनका महत्वपूर्ण योगदान लिया जा सके।    
विद्यालय प्रबन्ध समिति का कार्यकाल कितने वर्ष का होता है?
Ø  विद्यालय प्रबंध समिति का कार्यकाल दो वर्ष का होता है। दो वर्ष बाद समिति का पुनर्गठन किया जायेगा।
Ø  प्रत्येक वर्ष विद्यालय प्रबन्ध समिति के अभिभावक सदस्यों को (बच्चों द्वारा विद्यालय छोड़ने की स्थिति में) शामिल करने हेतु अद्यतन किया जायेगा।
Ø  विद्यालय प्रबन्ध समिति के अध्यक्ष बदल जाने की स्थिति में अथवा प्रधानाध्यापक के स्थानान्तरण की स्थिति में खाता संचालन में यथा आवश्यक संशोधन जिला बेसिक शिक्षा अधिकारी की अनुमति से किया जायेगा।
विद्यालय प्रबंध समिति के कार्य क्या-क्या होय है?
Ø  06 से 14 वर्ष के सभी बालक/बालिकाओं का शत-प्रतिशत नामांकन एवं नियमित उपस्थिति सुनिश्चित करना।
Ø  यह सुनिश्चित करना कि सभी अध्यापक और छात्र विद्यालय में नियमित रूप से समय पर आये।
Ø  विद्यालय न जाने वाले तरीकों के बारे में जानकारी लेना और देखरेख करना।  
Ø  विद्यालय से बाहर के बच्चों का आयु संगत कक्षा में नामांकन कराना तथा ऐसे बच्चों के लिए विशेष प्रशिक्षण की व्यवस्था करना और इसकी गुणवत्ता की देखरेख करना।
Ø  विद्यालयों में नामांकन बढ़ाने हेतु ग्राम प्रधान, विद्यालय प्रबन्ध समिति, माँ समूह एवं स्थानीय लोगों का सहयोग प्राप्त करना।
Ø  विशेष प्रशिक्षण की व्यवस्था हेतु विद्यालय के प्रधानाध्यापक तथा विद्यालय प्रबन्ध समिति के अध्यक्ष की जिम्मेदारी है।  
Ø  विद्यालय प्रबन्ध समिति की मासिक बैठक में विशेष प्रशिक्षण प्राप्त कर रहे बच्चों की उपस्थिति पर विचार-विमर्श विशेष रूप से किया जाये और अनियमित रूप से उपस्थित रहने वाले बच्चों को, नियमित रूप से विद्यालय भेजने हेतु विद्यालय प्रबन्ध समिति का सहयोग लिया जाये।
Ø  इस सम्बन्ध में विद्यालय प्रबन्ध समिति की बैठक की कार्यवाही रजिस्टर में अनिवार्य रूप से दर्ज़ की जाये।
Ø  बच्चों को बिना भेदभाव व भय के शिक्षा का अधिकार न मिलने पर स्थानीय प्राधिकारी को सूचित करना। 
Ø  विशिष्ट आवश्यकता वाले (दिव्यांग) बच्चों का नामांकन कराना तथा प्रारम्भिक शिक्षा पूरी होने तक इनकी सुविधाओं एवं भागीदारी की देखरेख करना।
Ø  यह सुनिश्चित करना कि अध्यापक अभिभावकों की नियमित बैठक कर बच्चों की उपस्थिति एवं सीखने की प्रगति के बारे में उन्हें बतायें।
Ø  मध्याह्न भोजन की नियमितता एवं गुणवत्ता का ध्यान रखना।
Ø  बच्चों के अधिकार एवं शिक्षा का अधिकार अधिनियम के बारे में आस-पास के लोगों को बताना तथा विद्यालय में अधिनियम के मानक के अनुसार सुविधाएं एवं कार्य हों, इसकी देखरेख करना।
Ø  अध्यापकों पर जनगणना, चुनाव, आपदा राहत को छोड़कर अन्य गैर सरकारी कार्यों का भार न हो।
Ø  विद्यालय को मिलने वाले अनुदान का सही तरीके से उपयोग किया जाए, इसकी देखरेख करना तथा विद्यालय प्रबन्ध समिति को मिलने वाली धनराशि का अलग से हिसाब-किताब रखना।
Ø  शासन के पत्र संख्या 2223/79-5-2012-29/09 टी.सी.-11 दिनांक 6 जुलाई 2012 के अनुसार विद्यालय प्रबन्ध समिति के अध्यक्ष एवं पदेन सदस्य सचिव (प्रधानाध्यापक) के हस्ताक्षरों से संयुक्त खाते का संचालन करना, तथा टीचर ग्रान्ट, निर्माण कार्य, मेन्टेनेन्स ग्रान्ट, विद्यालय ग्रान्ट, यूनिफार्म एवं अन्य कार्यो पर व्यय विद्यालय प्रबन्ध समिति के माध्यम से ही वित्तीय नियमों के अनुसार करना। 
Ø  तीन साल के लिए विद्यालय विकास योजना बनाना एवं योजना को अध्यक्ष/उपाध्यक्ष एवं सदस्य सचिव के हस्ताक्षर के साथ सम्बन्धित प्राधिकारियों के पास भेजना।
Ø  प्रत्येक माता-पिता या अभिभावक का यह कर्तव्य होगा कि वह अपने बच्चे या आश्रित का दाखिला पड़ोस के विद्यालय में कराये या कराने के लिए तैयार रहे, बच्चों को नियमित  विद्यालय भेजें, 3 वर्ष से अधिक और 6 वर्ष से कम उम्र के बच्चों को जिस विद्यालय में पूर्व प्राथमिक शिक्षा का प्रबंध हो, वहाँ अपने बच्चों की देखभाल एवं पूर्व प्रारंभिक शिक्षा उपलब्ध कराने के उद्देश्य से दाखिला कराये और उपरोक्त के अतिरिक्त, विद्यालय प्रबंधन में सहयोग दें।
विद्यालय प्रबन्ध समिति का गठन कैसे होता है?
Ø  विद्यालय क्षेत्र के सभी अभिभावकों की खुली सभा में भागीदारी के लिए व्यापक प्रचार-प्रसार किया जाए।
Ø  पंचायत प्रतिनिधि व प्रधान, स्थानीय प्राधिकारी द्वारा विद्यालय क्षेत्र के दायरे में मुनादी के माध्यम से सभी को सूचित किया जाए।
Ø  बच्चों द्वारा उनके माता-पिता की भागीदारी हेतु संदेश भिजवाना जाए, जिसके लिए बच्चों की कॉपी में लिखकर संदेश भिजवाये और उस पर माता-पिता के हस्ताक्षर करा कर मंगावाये।
Ø  बैठक प्राथमिक एवं उच्च प्राथमिक विद्यालय के परिसर में ही रखी जाय।
Ø  यदि विद्यालय परिसर में स्थान कम हैं तो किसी भी सार्वजनिक स्थान का बैठक हेतु चयन किया जा सकता है।
Ø  बैठक की तिथि और समय का व्यापक प्रचार-प्रसार किया जाय जिससे बैठक में सभी वर्गों की सहभागिता सुनिश्चित हो सके।
Ø  प्रधानाध्यापक द्वारा विद्यालय प्रबन्ध समिति के गठन हेतु आयोजित बैठक का उद्देश्य सभी को बताया जाय।
Ø  विद्यालय प्रबंध समिति के गठन सम्बन्धी शासनादेश के प्रमुख बिन्दुओं से अवगत कराना।
Ø  सभी अभिभावक मिलकर 11 सदस्यों का चयन करेंगे। चयनित सदस्यों में से एक अध्यक्ष एवं एक उपाध्यक्ष का चयन करेंगे।
Ø  अध्यक्ष एवं उपाध्यक्ष में से एक महिला होना अनिवार्य है।
विद्यालय प्रबन्ध समिति की बैठक माह में कम से कम एक बार अनिवार्य रूप से आयोजित की जायेगी तथा बैठक की कार्यवाही एवं लिये गये निर्णयों को विद्यालय प्रबन्ध समिति बैठक रजिस्टर में अवश्य लिखा जाए। यह भी सुनिश्चित कर लिया जाए कि बैठक में उपस्थित सभी सदस्यों के हस्ताक्षर रजिस्टर में कराये जायें।
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