शुक्रवार, जनवरी 31, 2020

Constitution and right to food : संविधान और भोजन का अधिकार

भारत का संविधान 26 नवम्बर 1949 को पारित हुआ तथा 26 जनवरी 1950 से प्रभावी हुआ। भारतीय संविधान की धारा 21 में दिए गए जीवन के (बुनियादी) अधिकारसे जोड़कर हम भोजन के मानव अधिकार को देख सकते हैं । वास्तव में, उच्चतम न्यायालय ने कई बार स्पष्ट रूप से कहा है कि जीवन के अधिकार की व्याख्या मानवीय सम्मान के साथ जीनेके मानव अधिकार के रूप में की जानी चाहिए, जिसमें भोजन और दूसरी बुनियादी जरूरतों का अधिकार शामिल है।

मैग्ना कार्टा के अनुसार न्याय अथवा मानव अधिकार प्रत्येक व्यक्ति को दिये जायेंगे, इनमें किसी प्रकार का विलम्ब नहीं होगा और न इसका क्रय ही किया जायेगा। न्यायिक हस्तक्षेपों और व्याख्याओं ने इस मानव अधिकार की सीमाओं का विस्तार करके भोजन के मानव अधिकार, काम के मानव अधिकार और आवास के मानव अधिकार समेत कई दूसरे सामाजिक आर्थिक मानव अधिकारों को शामिल किया गया है। नियमित पोषण के बिना जीवन जैविक तौर पर असंभव है इसलिए भोजन के अधिकार को व्यापक रूप से एक बुनियादी मानव अधिकार माना गया है।

भोजन के अधिकार को संविधान की धारा 39 (ए) और 47 के साथ भी जोड़ा जा सकता है। धारा 39 (ए) में निर्देष है कि राज्य यह सुनिश्चित करें कि सभी नागरिकों के पास आजीविका के पर्याप्त साधनों का अधिकारहो। संविधान की धारा 47 के अनुसार राज्य अपनी जनता के पोषण-स्तर और जीवन-स्तर को ऊँचा उठाने और जन-स्वास्थ्य में सुधार को अपने मूल कर्तव्यों में गिनेगा।ये दो धाराएं  “राज्य के नीति निदेशक सिद्धांतों से संबद्ध हैंजिन्हें यह नहीं माना जाता कि अदालत द्वारा लागू करवाया जा सकता है (धारा 37)। किंतु यह तर्क देना संभव है कि धारा 39 (ए) और 47 को जीवन के बुनियादी अधिकार की अभिव्यक्ति के रूप  में अदालत से लागू करवाया जा सकता है।
इस संबंध में दो बहुत ही महत्वपूर्ण केस निम्नलिखित हैं:-
  • भारतीय कानूनी सहायता और सलाह परिषद द्वारा 1996 में उच्चतम न्यायालय में दायर याचिका (नागरिक) सं. 42/97     
  • पीपुल्स यूनियन फॉर सिविल लिबर्टीज, राजस्थान द्वारा 2001 में उच्चतम न्यायालय में दायर याचिका (नागरिक) सं.196
सन् 2001 के मध्य में भारत में बहुतायत के बीच भूखका एक नया रूप देखने को मिला। एक ओर देश में अनाज का भण्डार इतना भरा जितना कभी नहीं भरा। दूसरी ओर सूखा-ग्रस्त तथा अन्य इलाकों में भूखमरी भी बढ़ी। इस स्थिति के आधार पर पीपुल्स यूनियन ऑफ सिविल लिबर्टीज़ (पी.यू.सी.एल.) यानि नागरिक आज़ादी के लिए जन संगठन” - राजस्थान इकाई ने रोटी के हक़को लेकर उच्चतम न्यायालय में एक अर्जी डाली। शुरू में यह केस, सूखा-राहत के विशिष्ट सन्दर्भ में, भारत सरकार, भारतीय खाद्य निगम और छः राज्य सरकारों के विरुद्ध दायर किया गया था। लेकिन बाद में इसमें व्यापक तौर पर मौजूद, नियमित बनीं रहने वाली भूख को शामिल किया गया और सभी राज्यों को मुद्दई बनाया गया जिनसे जवाब-तलब करना था। 

23 जुलाई, 2001 को कोर्ट ने यह टिप्पणी कि  “हमारी राय में, सबसे अधिक महत्व इस बात का है कि भोजन, वृद्ध, विकलांग और कमजोर लोगों, गरीब औरतों, गरीब पुरुषों को मिले जो भूख से मरने के खतरे से जूझ रहे हैं, गर्भवती और दूध पिलाने वाली मांओं ओर गरीब बच्चों को मिले, विशेषकर उनको जिनके पास या जिनके परिवार के पास पर्याप्त धन नहीं है कि वह भोजन प्राप्त कर सकें। अकाल की स्थिति में भोजन की कमी हो सकती है, परन्तु यहाँ बहुतायत के बीच कमी वाली स्थिति है। भोजन बड़ी मात्रा में उपलब्ध है परन्तु अति-गरीब और बेसहारा लोगों के बीच उसका वितरण कम होता है और कभी तो होता ही नहीं है, जिससे कुपोषण, भुखमरी और उससे संबंधित अन्य समस्याएं उठ खड़ी होती हैं।

पहले केस में, उड़ीसा के कालाहांडी, बालंगीर और कोरापुट ज़िलों में भूख से हुई मौतों की रिपोर्टों को भारत के उच्चतम न्यायालय के नोटिस में लाया गया था। याचिका दाखिल करते हुए उच्चतम न्यायालय ने संवैधानिक संस्था राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग को उस क्षेत्र में चिरकालिक भूख की स्थिति का ज़ायज़ा लेने के लिए कहा था। आयोग ने अपनी सुनवाइयों और प्रभावित क्षेत्रों के कष्टदायक दौरों, जो की कई वर्षों तक जले, द्वारा महत्वपूर्ण योगदान दिया और स्पष्ट किया कि दरिद्रता और दीर्धकालिक संकट भूखमरी की निशानी है, न केवल मौत; साथ में यह भी स्पष्ट किया कि भुखमरी उस मौलिक अधिकार का जर्बदस्त उल्लंघन और इंकार है जिसके तहत हरेक व्यक्ति को भूख से मुक्ति का मानव अधिकार है।

इस अर्जी का कानूनी आधार बहुत सीधा सादा है। संविधान की धारा 21 जीने के हक़ देती है और सरकार का कर्तव्य बनता है उसकी रक्षा करना। यह एक मौलिक अधिकार है। पहले के कई केसों में उच्चतम न्यायालय ने फ़ैसले दिए हैं  कि जीने के अधिकार का मतलब है इज़्ज़त से जीने का अधिकार और रोटी या खाने का मानव अधिकार भी अन्य कई अधिकारों की तरह इज़्ज़त से जीने के अधिकार में शामिल है। मूल रूप से इस अर्जी में दलील दी गई है कि नीति तथा कार्यान्वयन, दोनों स्तरों पर, राहत की स्थिति के प्रति केन्द्र और राज्य सरकारों की प्रतिक्रिया स्पष्टतः इस मानव अधिकार का उल्लघंन है। इस अर्जी ने इस बात को साबित करने के लिए सरकारी और ज़मीनी स्तर के आँकड़ों का प्रयोग किया है। 

खाद्य सुरक्षा मुहैया कराने में सरकारी उपेक्षा को लेकर अर्जी ने दो पहलुओं को चिन्हित किया है। एक है सरकार द्वारा सार्वजनिक वितरण प्रणाली  (राशन प्रणाली ) का ख़त्म किया जाना। राशन प्रणाली की असफलता कई स्तरों पर उजागर होती है। इसकी सुविधा केवल ग़रीबी रेखा के नीचे जी रहे लोगों के लिए सीमित की गई है ।
इस अर्जी का दूसरा बिन्दु है सरकार के राहत कार्य की कमियाँ। कई राज्यों में अकाल सम्बंधी नियमावली है जिसके आधार पर राहत कार्य होते हैं । सूखा की स्थिति में इन्हें लागू करना अनिवार्य हो जाता है। इसके अनुसार ये ज़रूरी है कि हर ऐसे व्यक्ति को काम दिया जाए जो राहत-कार्य के लिए आता है। लेकिन इसके विपरीत राजस्थान सरकार ने श्रम-सीमाकी नीति अपनाई है। इसमें सरकारी आँकड़ों के अनुसार: सूखा पीड़ित आबादी को ही काम मिल पाता है। वास्तविक रोज़गार का स्तर इससे भी नीचे है। बहुत से राज्यों से ख़बर मिली है कि कानूनी रूप से मान्य न्यूनतम वेतन नहीं मिलता है। 

इन समस्याओं की जिम्मेदारी सरकार पैसों की कमी पर डालती है। उच्चतम न्यायालय ने पहले ही कह दिया है कि संवैधानिक कर्तव्यों को पूरा करने की असफलता को सरकार पैसे की कमीके मत्थे नहीं मढ़ सकती। वैसे भी, खाद्य के ऊपर तक भरे भण्डारण को देखते हुए यह बहाना बिल्कुल नहीं लागू हो सकता। राज्य सरकार ने बार-बार केन्द्र सरकार से राहत-कार्य के लिए मुफ़्त अनाज माँगा है पर उसे मिला नहीं। लेकिन यह भी है कि राज्यों को जो अनाज मिला है उसका भी अक्सर पूरा उपयोग नहीं हुआ है। इसकी वजह से राज्य सरकार का पक्ष कमज़ोर भी पड़ जाता है। 

संविधान की इससे जुड़ीं धाराएं इस प्रकार हैं:-
  • संविधान की धारा 21:- “किसी भी व्यक्ति को अपनी ज़िन्दगी या वैयक्तिक स्वतंत्रता से जुदा नहीं किया जा सकता सिवाय कानून द्वारा स्थापित प्रक्रिया के।
  • संविधान की धारा 39 (ए):- राज्य ...अपने नीतिनिर्धारण द्वारा यह सुरक्षित करेगा कि नागरिकों, पुरुषों व महिलाओं दोनों के पास समान रूप से आजीविका कमाने के पर्याप्त साधनों का अधिकार हो।
  • संविधान की धारा 47:- “पोषण के स्तर और अपनी जनता के जीवन स्तर को ऊँचा रखने और जन-स्वास्थ्य में बेहतरी लाने को राज्य अपने प्राथमिक कत्र्तव्यों में गिनेगा...।
  • संविधान की धारा 39 (1):- “इस भाग में जो अधिकार दिए गए हैं उन्हें लागू करने की गारंटी के लिए उपयुक्त प्रक्रिया द्वारा उच्चतम न्यायालय में जाने का अधिकार।

बुधवार, जनवरी 29, 2020

Education ( शिक्षा )

शब्दों का जंजाल है,
सदियों से बेहाल है,
शिक्षा राजनीति है,
यह भी एक मुददा है।
समाज के कुछ ठेकेदारों ने,
बाँधा है पुलिंदा,
मुट्ठी भर ही तो क़लमकार है,
लिखते जो दुनिया की तक़दीर है।
जब-जब भी क़लम चलती है,
हमेशा वह ग़रीब पर भारी पड़ती है,
थके हुए मन को रूके हुए तन को,
न कभी मिल पाया है,
इन शब्दों का सहारा।
वो कहते है शिक्षा क्या है?
ये कहते है परिवर्तन क्या है?
हम कहते है ज़रूरतें क्या है?
शिक्षा बेचारी कुछ नहीं कहती,
क्योंकि शिक्षा एक राजनैतिक मुददा है,
और राजनीति समाज पर भारी है,
हम समाज के परिवर्तन की बात करते हैं,
शिक्षा और राजनीति की नहीं।

भूख और गाँधी जी का ग्राम स्वराज्य : Hunger and Gandhi's Gram Swaraj

’’भोजन व्यक्ति के लिए है न कि व्यक्ति का जीवन भोजन के लिए’’- गाँधी जी ने जब यह विचार दिया था तब उन्होने सोचा होगा कि व्यक्ति को जिन्दा रहने के लिए भोजन चाहिए न कि जीवन भर भोजन इकट्ठा करने में व्यक्ति का जीवन ही लग जाय। इस संदेश से स्पष्ट होता है कि गाँधी जी ने जो कल्पना ग्राम स्वराज्य में की थी यह उसका एक आधार है। 

भूख को मिटाने के लिए भोजन की आवश्यकता होती है लेकिन भोजन तक पहुँच के रास्ते में गरीबी एक बड़ा अवरोध है जिसे हम भारत के हर हिस्से में महसूस कर सकते है। आर्थिक व सामाजिक अवरोधकों के द्वारा कुछ लोग हाशिये पर है। ऐसा नहीं है कि लोग हाशिये पर बना रहना चाहते है राजनैतिक और स्वार्थी तत्वों के चलते कुछ लोगों को बढावा दिया जाता है और समाज का बड़ा तबका उन सभी जरूरी चीज़ों से लगभग वंचित हो जाता है जिनके चलते वह जिन्दा भर रहने के लिए जीवन भर जद्दोजहद करता रहता है। समाज में गरीबी एक अभिशाप है जिसका शिकार समाज का एक बड़ा हिस्सा हो रहा है। व्यक्तिगत व परिवार के लिए खाने की व्यवस्था करने में ही उसकी कमाई का ज्यादातर हिस्सा चला जाता है।

गाँधी जी अनुसार ऐसी विशमता तथा असमानता पर आधारित सामाजिक व्यवस्था में जिसमें कुछ थोड़े से व्यक्ति ही अमीर होते है तथा अधिकांश जनता को जीवन के लिए पर्याप्त भोजन भी नहीं मिल पाता हो, रामराज्य की स्थापना नहीं की जा सकती है। गाँधी जी का इन वर्षों में भुखमरी व अकाल को समझने और अपनी पद यात्राओं के दौरान नजदीक से देखने का मौका मिला जिनमें वर्ष 1891 से 1901 तक लाखों आदमी भुखमरी और महामारी के कारण काल के ग्रास बन गए। इसके पश्चात वर्ष 1911 से  21 तक के समय में पुनः संक्रामक रोगों का दौर-दौरा हो गया। लाखों मनुष्य काल के गाल में चले गये। विश्व में लाखों लोग ऐसे है जो बिलकुल ही निराश्रित है और जिनके रहने के लिए मकान तक नहीं है और जो सड़को की पटरियों और पुलों पर रहते है और जिन्हें अपना पेट कूड़ेंदानों  और कूड़े के ढेरों से खाद्यान्न बीनकर भरना पड़ता है और अधिकांश इस प्रकार के निराश्रित व्यक्ति भारतीय उपमहाद्वीप में ही रहते है। हम भारत में भूख पर बात करना चाहते है क्योंकि भारत में भूख अभी भी पर्याप्त रूप से फैली हुई है दुनिया की आबादी का बीस प्रतिशत हिस्सा भारत की सीमाओं में समाया हुआ है भारत में लगभग 20 करोड़ लोग रोज़ भूखे सोते हैं और लगभग 5 करोड़ लोग भुखमरी के कगार पर हैं यानि आसानी से कहा जा सकता है कि भारत की आबादी में से लगभग 25 करोड़ लोग भुखमरी के कगार पर है। 

गाँधी जी अनुसार सामाजिक प्रगति का परीक्षण यह है कि जन-सामान्य में से भुखमरी की स्थिति समाप्त हो जाए। गाँधी जी चाहते थे कि प्रत्येक व्यक्ति को अपने भोजन के लिए कार्य करना चाहिए। इस सिद्धान्त के सम्बन्ध में उनका विष्वास था कि ’’यह सामाजिक ढांचे में मूल क्रान्ति उत्पन्न करेगा तथा समाज में श्रेणी के विभेद, श्रम तथा पूँजी  के मध्य के संघर्ष तथा गरीब व अमीर के मध्य की खाई को समाप्त करेगा। भूख एक शब्द या विचार नहीं है, भूख! जिस्म के भोजन के लिए भूख! जो इन्सान के जन्म के साथ ही पैदा होती है वह खुद उसके साथ जीती है मरने तक। भूख से उनका सरोकार था कि वह भूख रहे भुखमरी न बनें क्योंकि जब भूख, भुखमरी बनती है तो उसका प्रकोप सामाजिक हो जाता है न कि व्यक्तिगत। जब कोई भी समस्या सामाजिक हो जाती है तो उसके परिणामों की गणना करना आसान नहीं होता। काश! हम प्राकृतिक संसाधनों का दोहन भूख को मिटानें में कर पाते। लेकिन सदियों से ही समाज का एक बड़ा हिस्सा भोजन की कमी से भूख के मारे जान क्यों गवाता रहा है। जबकि कुछ लोग अपने लिए हमेशा भोजन का प्रबंध करते रहे हैं। उन्होने सत्य तथा अंहिसा को आर्थिक प्रणाली के अनिवार्य अंग मानते हुए, अपरिग्रह, सम्पति के समान वितरण, रोटी, श्रम, तथा स्वदेशी पर जोर दिया। गाँधी जी का श्रम से तात्पर्य रोटी के लिए किये जाने वाले श्रम से था।

उन्होने अंशदान करने वाले तथा दानी वर्ग के व्यक्तियों के द्वारा गरीबों की जाने वाली कृपा को, गरीबी का अपमान माना है । उनके शब्दों में ’’मैं नंगे रहने वाले व्यक्तियों को कपड़े देकर उनका अपमान नहीं कर सकता हूँ, क्योंकि उन्हें कपड़ों की आवश्यकता  नहीं है। इसके बजाय मुझे उन्हें काम देना चाहिए जिसकी उन्हें अत्यधिक आवश्यकता  है।’’ समाज का एक बड़ा हिस्सा रोटी, कपड़ा और मकान के लिए जीवन भर जद्दोजहद करता रहता है। किसी को भूखें और खुले आसमान में जिंदगी बिताने के लिए समाज किन अधिकारों से छोड़ देता है।

गाँधी जी की जीवन के अन्त समय में दुनिया भर में यह माने जाने लगा कि समाज कल्याण में भूख को विशेष दर्जा देना ही होगा। संयुक्त राष्ट्र संघ की आम सभा, 1948, द्वारा मानव अधिकारों की सार्वभौमिक घोषणा समकालीन अंतर्राष्ट्रीय मानव अधिकारों की व्यवस्था की स्थापना हुई, जिसके अनुसार मानव परिवार के सभी सदस्यों के सहज सम्मान, समान और अहस्तांतरणीय मानव अधिकारों की मान्यता, भारत में स्वतंत्रता, न्याय और शांति का आधार हैयह घोषणा यह भी मानती है कि इन मानव अधिकारों को लागू करने की मुख्य ज़िम्मेदारी राष्ट्रीय सरकारों की है। इसमें कहाँ गया है कि यदि लोगों के पास मानव अधिकार हैं तो उन्हें यह बुनियादी दावा करने का हक़ है कि दूसरे लोग कुछ चीजों को करें या करने से बचें, चूँकि राज्य अपनी सीमाओं में व्यवस्था और सामाजिक न्याय के लिए प्राथमिक तौर पर उत्तरदायी हैं, राज्य इन व्यक्तिगत और बुनियादी दावों का प्राथमिक लक्ष्य हैं...। पर्याप्त भोजन के मानव अधिकार के उत्तरोत्तर साकारीकरण हेतु राज्यों से अपेक्षा है कि वे अंतरर्राश्ट्रीय कानून के अंतर्गत अपने सुसंगत मानवाधिकारों के दायित्वों को पूरा करें।

भोजन का प्रबंध जोकि प्रत्येक व्यक्ति का जन्म सिद्ध अधिकार है, उस अधिकार की हमेशा अवहेलना ही होती रही है। अगर कहीं पर भूख के लिए कुछ कार्य हो रहे है तो वह अधिकारों की तरह नहीं बल्कि दया भाव से हो रहे है। भुखमरी मिटाने के लिए होने वाले कार्यों को दया भाव से किया जाता है। सन् 2007 के अक्टूबर माह में मुझे साबरमती नदी के किनारे बसे शहर  अहमदाबाद जाने का मौका मिला। जहाँ गुजरात विद्यापीठ में दो दिवसीय बैठक हो रही थी, विषय था ’’अन्न अधिकार’’। काफी उत्साहित था में गाँधी जी के विचारों पर बनीं विद्यापीठ में हो रही अन्न अधिकार की बैठक को लेकर। लेकिन दिल कुछ दुखी हुआ वहाँ के स्थानीय लोगों से बात करके की गाँधी के स्वराज्य की बात हमें कहीं भी अमल में नहीं दिखायी देता, देश से तो गाँधी जी का गाँव आत्मनिर्भरता का सपना शायद कभी भी पूरा नहीं हो सकेगा। अंग्रेजों ने हमें वर्ग और क्षेत्र में बांटा था लेकिन हमने उन्हें खाने के लिए भोजन तो दिया नहीं और बाटकर भी रखा है, निम्न आय वर्ग और उच्च आय वर्ग में, आदि ।

भारत में नीति-निर्धारकों ने कुछ हद तक कुपोषण की लगातार उपस्थिति को तो स्वीकार कर लिया जाता है और हल भी निकाला जाता है बेशाक वह मुकम्मल नहीं होता, किन्तु भयंकर भूख की स्थितियों या दीर्घकालिक भूख की क्षेत्रीय स्थितियों को कम ही स्वीकार किया जाता है, उसका अध्ययन या हल कम ही किया जाता है, जैसा पहले ही कहा गया है स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद शुरू के वर्षों में खाद्य-असुरक्षा का भारी खतरा जो हमारे देश की करोड़ों की आबादी पर मंडरा रहा था, वह अकाल और भारी भुखमरी का था जो कम कृषि उत्पादकता का नतीजा था, जिसका कारण कृषि उत्पादकता का अस्थिर मानसून पर निर्भर होना और भूमि और खाद्य का अत्यधिक असमान वितरण था। भारत का कल्याण कृषि से अधिक अच्छा और शीघ्रता से किया जा सकता है। यहीं वस्तुएं और सेवाएं कृषि और कृषीतर संसाधनों से प्राप्त होती है। कृषि से भोजन और कपड़ा मिल सकता है तथा घरेलू अथवा लघु उद्योग भी उपलब्ध हो जाते है जिन्हें उत्तरोत्तर बढाने की आवश्यकता  है और मेहनत-मजदूरी को कम करने की आवश्यकता  नहीं है।

गाँधी जी ने लिखा है कि ’’नगरवालों के लिए गाँव अछुत हैं। नगर में रहने वाला गाँव को जानता भी नहीं। वह वहाँ रहना भी नहीं चाहता। अगर कभी गाँव  में रहना पड़ ही जाता है तो षहर की सारी सुविधाएं जमा करके उन्हें शहर का रूप देने की कोशिश करता है। अगर वह तीस करोड़ ग्रामवासियों के रहने लायक शहरों का निर्माण कर सके तो यह कोशिश बुरी नहीं कहीं जायेगी।’’

गाँधी जी का मानना था कि जब हम नीतियों का निर्धारण करें, तो निर्धारण का काम ग्राम पंचायतों के माध्यम से जिला, राज्य से होते हुए वह केन्द्रिय सरकार तक पहुचे जिसकी अवहेलना भारत में आज तक होती रही है। क्योंकि भारत की आत्मा ग्राम में निवास करती हैं। ग्राम स्वराज्य में साफ़ कहा गया है कि हमें गाँवों का विकास करके जन-साधारण को आत्म निर्भर बनाना है।

गाँधी जी गाँवों व आदिवासी क्षेत्रों में होने वाली स्थानीय फसलों व साग-सब्जियों के उपयोग को प्राथमिकता देते थे जिसका मुख्य कारण था कि खाद्य सामग्रियों का मौसम व वातावरण के साथ उनकी पौष्टिकता का होना। पोशण और पुष्टिकर आहार की समस्या पर गाँधी जी ने कहा कि ’’भारतीयों को पूरा पोषण न मिल पाने की वजह गरीबी ही नहीं, भोजन के पोषण-तत्वों के संबंध में उनका घोर अज्ञान भी है।’’ हमारे देश के निवासियों को किस प्रकार का भोजन प्राप्त होता है। यहाँ के निवासी जिस प्रकार का भोजन करते हैं वह आवश्यक पौष्टिक तत्वों से वंचित रहता है, उसमें जीवन-रक्षक प्रदार्थों का अभाव रहता है। पौष्टिक भोजन तो दूर रहा यहाँ पर कितने ही ऐसे व्यक्ति हैं जिन्हें भर पेट भोजन भी नहीं मिल पाता। ऐसी दशा में यह आशा करना कि भारतीयों की आयु अधिक होगी दुराषा मात्र है। सन् 1931 में भारतीयों की औसत आयु 27 वर्ष थी। उन्होने एक बार कहा भी था  कि ’’कपड़ा मिलें अपने पीछे बेकारी लाई और आटा तथा चावल की मिलें पोशक तत्वों की कमी से होने वाली बीमारियां।

गाँधी जी बेरोजगार तथा भूखे लोगों के लिए कार्य करना चाहते थे। उनके मन में यह विचार था कि प्रत्येक व्यक्ति को अपने शारीरिक श्रम से उपार्जित किया गया भोजन ग्रहण करना चाहिए। किसानों की घोर दरिद्रता गाँधी जी को एक क्षण भी चैन नहीं लेने देती थी। लेकिन देश में आज भी शायद ही राज्य या जिला हो जहाँ लोग भूख से सामना नहीं कर रहे यह कहीं पर आंशिक हो सकता तो कहीं पर इसका विस्तार काफी अधिक है। गाँवों और शहरों में व्यक्ति, परिवार और समुदाय भूख से आज भी लड़ रहे हैं, उनके लिए यह जीवन का एक हिस्सा बन चुका है। इनमें से अधिकांश लोग असंगठित क्षेत्र से आते है, जैसे भूमिहीन मजदूर और कारीगर, दलितों और आदिवासियों जैसे- सामाजिक रूप से दमित समूह, ऐसे घर जिनका मुखिया एक महिला होती है, बेसहारा लोग, विशेष रूप से मुश्किल परिस्थितियों में कार्यरत गली के बच्चे और कामगार बच्चे, अपाहिज और बुर्जुग लोग जिनकी देखभाल करने वाला कोई नहीं, अप्रवासी मज़दूर। ऐसी खामोश त्रासदी रोज़ कई घरों में और हमारे देश  की गलियों में घटित होती है, कि बड़ी संख्या में लोग भूखे पेट सोते हैं। अगर आज भी लोग भूखें पेट सोते है तो इसके लिए कौन जिम्मेवार है?

अगर हमने गाँधी जी के ग्राम स्वराज्य को अपनाया होता तो भारत की तस्वीर बदली हुई होती क्योंकि गाँधी जी कहते थे कि ’’मुफ्त भोजन से राष्ट्र का पतन होता है।’’ अर्थात सरकार द्वारा चलाये जाने वाले सरकारी कार्यक्रम केवल कुलीन वर्ग के लोगों के दिमाग की उपज है न कि जन-साधारण की जरूरतों के मुताबिक। 

सोमवार, जनवरी 27, 2020

Hunger Education and Marginalized People


भूख, शिक्षा और हाशिये के लोग
भूख को मिटाने के लिए भोजन की आवश्यकता होती है लेकिन भोजन तक पहुँच के रास्ते में ग़रीबी एक बड़ा अवरोध है, जिसे हम भारत के हर हिस्से में महसूस कर सकतेहैं। आर्थिक व सामाजिक अवरोधकों के द्वारा कुछ लोग हाशिये पर है। ऐसा नहीं है कि लोग हाशिये पर बना रहना चाहते हैं। राजनैतिक और स्वार्थीं तत्वों के चलते कुछ लोगों को बढ़ावा दिया जाता है और समाज का बड़ा तबका उन सभी जरूरी चीज़ों से लगभग वंचित हो जाता है, जिनके चलते वह ज़िन्दा भर रहने के लिए जीवनभर जद्दोजहद करता रहता है। समाज में ग़रीबी एक अभिषाप है जिसका शिकार समाज का एक बड़ा हिस्सा हो रहा है। व्यक्तिगत व परिवार के लिए खाने की व्यवस्था करने में ही उसकी कमाई का ज़्यादातर हिस्सा चला जाता है क्योंकि ज्यादातर मामलों में कम शिक्षित लोगों की जो आमदनी होती है उससे उनके लिए ज़िन्दा रहना भर ही मुस्किल होता है। व्यक्ति को जीवन जीने के लिए जो कम से कम आवश्यकता होती है वह है रोटी की। अतः भोजन को मौलिक अधिकार के रूप में देखना चाहिए। स्वामी विवेकानंद का कहना था कि ’’निरक्षरों को शिक्षा, भूखों को खाना तथा नंगों के लिए वस्त्र का प्रबंध करके ही भारत की उन्नति की जा सकती है।’’
भारत में लगभग 20 करोड़ लोग रोज़ भूखे सोते हैं और लगभग 5 करोड़ लोग भुखमरी के कगार पर हैं (गोयल, 2004)। यानि आसानी से कहा जा सकता है कि भारत की आबादी में से लगभग 25 करोड़ लोग भुखमरी में जी रहे हैं। भारत में ग़रीबी दूर करने की दिशा में काम कर रहे प्रोफेसर ज़्यां द्रेज़ कहते है कि भारत में मानव संसाधन के विकास और शिक्षा की ओर कभी ध्यान नहीं दिया जाता है जिसके चलते लोग अनपढ़ हैं, उनका स्वास्थ्य ख़राब है और बच्चे भूखे हैं। जो भूख और कुपोषण में जीते हैं, उनके पास शिक्षा व आर्थिक ताकत की कमी है, वे प्रायः अदृष्य रहते हैं, राजनैतिक रूप में महत्वहीन हैं और असंगठित हैं। ज़्यां द्रेज़ ने ठीक कहा है कि यह ’एक स्थायी मानवीय आपातकाल’ की स्थिति है जिसमें भारत में हर दो बच्चों में एक कुपोषित रहता है, तीन में से दो औरतों में खून की कमी है।

भोजन की उपलब्धता से तात्पर्य यह है कि प्रत्येक व्यक्ति का जीवन स्तर ऐसा हो कि जिसमें उसे जीने के लिए खाने की उपलब्धता पर इतनी भर चिन्ता हो कि वह कुछ घण्टे काम करके अपने लिए खाने का प्रबंध कर सकें यह तब ही मुमकिन है कि जब समाज में अशिक्षा, गरीबी, भुखमरी और अकाल की स्थिति न हो। किसान नेता स्वर्गीय चरण सिंह ने अपनी किताब ’’भारत की भयावह आर्थिक स्थिति: कारण और निदान’’ में लिखा है कि अमरीका और आस्ट्रेलिया में किसी भी भोजनालय में दो डालर में स्वच्छ और बगैर मिलावट का शुद्ध भोजन मिल सकता है जो आस्ट्रेलिया और अमरीका के मजदूर की एक घंटे की मजदूरी है जबकि भारत के निर्माण कार्य में लगी हुई अशिक्षित महिला मजदूर को दिन भर काम करने पर पेट भर भोजन ही किसी ढाबे में मिल सकेगा। ’’भोजन व्यक्ति के लिए है न कि व्यक्ति का जीवन भोजन के लिए’’- गाँधी जी ने जब यह विचार दिया था तब उन्होंने सोचा होगा कि व्यक्ति को जिन्दा रहने के लिए भोजन चाहिए न कि जीवन भर भोजन इकट्ठा करने में व्यक्ति का जीवन ही लग जाय।

स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद शुरू के वर्षों में खाद्य-असुरक्षा का भारी खतरा जो हमारे देश की करोड़ों की आबादी पर मंडरा रहा था वह अकाल और भारी भुखमरी का था जो कम कृषि उत्पादकता का नतीजा था, जिसका कारण कृषि उत्पादकता का अस्थिर मानसून पर निर्भर होना और भूमि और खाद्य का अत्यधिक असमान वितरण था। लैरी कॉलिन्स और डॉमनीक्यू लेपैरे (1975) ने लिखा है ’’जब भारत अपनी स्वतंत्रता प्राप्त करने वाला ही था, उस क्षण कलकत्ता में 30 लाख लोग कम भोजन के कारण अल्प पोषाहार की दशा में रह रहे हैं, यथा- उन लोगों का कैलोरी ग्रहण हिटलर के मृत्यु शिविरों में रह रहे लोगों को दी जाने वाली कैलोरियों से भी कम था। हम लोगों को पर्याप्त मात्रा में सन्तुलित आहार का सेवन करना चाहिये, मांस-मछली, दूध-घी, शाक-सब्जी, फल-फूल अधिक से अधिक मात्रा में सेवन करना चाहिए। परन्तु यह कहने से पूर्व क्या हम इस बात को भी सोचते हैं कि हममें से कितने ऐसे लोग है जो इन पदार्थों का उपयोग करने में समर्थ है। वर्ष 1891 से 1901 के दौरान लाखों इंसान भुखमरी और महामारी के कारण काल के ग्रास बन गए। इसके पश्चात 1911-21 तक के समय में पुनः संक्रामक रोगों का दौर-दौरा हो गया, लाखों मनुष्य काल के गाल में चले गये। विश्व की कुल लगभग चार अरब जनसंख्या में से 35 करोड़ लोग ऐसे है जो बिलकुल ही निराश्रित है और जिनके रहने के लिए मकान तक नहीं है, शिक्षा नहीं है, काम नहीं है,  सड़कों की पटरियों और पुलों पर रहते है और जिन्हें अपना पेट कूड़ेंदानों और कूड़े के ढेरों से खाद्यान्न बीनकर भरना पड़ता है और अधिकांश इस प्रकार के निराश्रित व्यक्ति भारतीय उपमहाद्वीप में ही रहते है। यह वह समय था जब जनता के विषाल हिस्से की जीने के लिए न्यूनतम आवश्यकता भोजन तक की पहुँच न होने के कारण दुःखद सामूहिक मौत हो जाया करती थीं।
शहरी भारत की भोजन असुरक्षा एटलस के अनुसार ’शहरों में लोगों द्वारा ली जा रही औसत कैलोरी ग्रामीण इलाकों की तुलना में कम है। शहरी और ग्रामीण भारत, दोनों ही जगह पिछले तीन दशकों में कैलोरीज़ की खपत थोडी़ कम हुई है।’ जनसंख्या के अन्य हिस्सों की तुलना में दलितों और आदिवासियों में पोषण-स्तर कमतर है। हमारे देश के निवासी जिस प्रकार का भोजन करते हैं वह आवश्यक पौष्टिक तत्वों से वंचित रहता है, उसमें जीवन-रक्षक प्रदार्थों का अभाव रहता है। पौष्टिक भोजन तो दूर रहा यहाँ पर कितने ही ऐसे व्यक्ति हैं जिन्हें भर पेट भोजन भी नहीं मिल पाता। ऐसी दशा में यह आशा करना कि भारतीयों की आयु अधिक होगी, कल्पना मात्र है। सन् 1931 में भारतीयों की औसत जीवन प्रत्याशा 27 वर्ष थी। जो कि वर्ष 2019 में 68.7 वर्ष तक तो हो गई है लेकिन यह अब भी कई एशिया के देशों से कम है।
निर्धनता ही भारत में सभी बुराइयों की जड़ है। दरिद्रता ही जनशिक्षा के मार्ग में सबसे बड़ी बाधा है। सामाजिक रूप से कमजोर समुदायों के लोग भोजन न मिलने के कारण अधिक कष्ट भोगते हैं। बच्चों और महिलाओं में निम्न पोषण स्तर, अधिक कुपोषण और खून की कमी की अधिक शिकायतों की वज़ह से अनुसूचित जाति के बच्चों में मृत्यु दर अधिक पायी जाती है जो कि स्वास्थ्य के स्तर के महत्वपूर्ण सूचकों में से एक है।
भुखमरी के सन्दर्भ में तो सामाजिक सुरक्षातन्त्र का महत्त्व और भी अधिक हो जाता है। अमीर विकसित देशों में अकाल नहीं पड़ते। इसका कारण वहाँ के सभी लोगों का अमीर होना नहीं है। यह ठीक है कि जब लोग शिक्षित होते है और उनके पास रोजगार होता है, उन्हें अच्छी-खासी आमदनी मिलती है पर बहुत-से लोग बहुत लम्बे समय तक इस अवस्था का लाभ नहीं उठा पाते। यदि सामाजिक सुरक्षा तन्त्र नहीं होता तो उस दशा में उनकी सारी सम्पत्ति पर आधारित विनिमय अधिकारिताएँ उनके निर्वाह के लिए शायद  ही पर्याप्त हो पातीं। (अमर्त्य सेन, 2002, ग़रीबी और अकाल)
कितनी अजीब बात है कि सरकारी एजेंसियां और अंतर्राष्ट्रीय एजेंसियां भी भूख के साथ जी रहे या मर रहे लोगों की संख्या का रिकार्ड नहीं रखतीं। यहाँ तक कि सरकारी शोध एजेंसियों के काम में भी इसी तरह का स्पष्ट इंकार होता है। जार्ज केंट (2002) कहते है कि ’’राष्ट्रिय पोशण संस्थान सूक्ष्म पोषक तत्वों पर छोटे तकनीकी सवालों में उलझा हुआ है और ऐसे प्रश्नों पर प्रायोगिक अध्ययन करता है जो विकसित देशों में पर्याप्त रूप से हल किए जा सकते हैं जबकि देशभर में गहरी और व्यापक भूख की व्यावहारिक तौर पर उपेक्षा करता है। पोषक तत्वों पर तकनीकी शोध समस्या का सामना करने से बचता है जो कि तकनीकी होने के बजाय गंभीर रूप से राजनीतिक समस्या है। अगर सरकार और इसकी एजेंसियां भूख की समस्या को देखने से इंकार करती हैं तो इसे हल करने की उम्मीद नहीं है।
उड़ीसा में भूख से हुई कथित मौतों की जांच में राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग में डॉ0 अमृता रंगास्वामी के हस्तक्षेप से कुछ महत्वपूर्ण और मानवीय सिद्धांतों को स्थापित किया गया है। इनमें से पहला है कि मौत अनिवार्यतः भुखमरी का प्रमाण नहीं है। ’भूख से हुई मौतों की रोकथाम की प्रक्रिया में पोस्टमार्टम की जाँच-पड़ताल से कोई खास फायदा नहीं होता और न ही इससे भोजन के अधिकार की सुरक्षा में मदद मिलती है। वास्तव में, इससे उन परिवारों और समुदायों को भावनात्मक रूप से ठेस पहुँचती है जिन्होंने अपने सदस्यों को भुखमरी कारण खोया है। उन नागरिकों को, विशेषकर जिनके पास खाने को कुछ नहीं है, सम्मान से जीने का अधिकार है! इससे आगे उनका कहना है कि भोजन की कम उपलब्धता कोई अलग घटना नहीं है, इससे घरों में, समुदायों को या कुछ सामाजिक श्रेणियों को लगातार पर्याप्त पोषण न मिलना जाहिर होता है। ऐसे लोग प्रायः बहुत गरीब, अशिक्षित और साधनों से वंचित या दरिद्र होते है।’’ नागरिकों के मूल अधिकार मानव स्वतंत्रता के मापदण्ड और संरक्षक दोनों है। अमर्त्य सेन के अनुसार ’अकालों को रोकने में भारत सफल रहा है- 1947 में आज़ादी मिलने के बाद से भारत में कोई बड़ा अकाल नहीं पड़ा है। कृषि में शैक्षिक ज्ञान की कमी से बहुत खेती बर्बाद हो जाने की कई घटनाएं हुई हैं, प्रायः बड़े क्षेत्रों में ऐसे हालात हुए हैं और कभी तो राष्ट्रीय भोजन उपलब्धता में भी तेजी से गिरावट आई है परन्तु खतरनाक अकालों को रोक दिया गया है।’ उनका मानना है कि ’इनमें मौत का कारण बनने से पहले जन कार्रवाई से ऐसा संभव हुआ। हालांकि स्वतंत्रता के बाद की पूरी अवधि में ऐसा हुआ है, अकाल जैसे हालातों को पैदा होने से रोकने में अधिक कुशलता का परिचय मिलता है। उदाहरण के तौर पर, बिहार में 1967 में लगभग अकाल जैसी स्थिति में जो हुआ उसकी तुलना में 1973 में महाराष्ट्र में, 1979 में पश्चिम बंगाल में और 1987 में गुजरात में भयानक अकालों को बड़ी तेजी से रोका गया, जिससे मृत्यु दरों पर अपेक्षाकृत कम बुरा असर पड़ा।
भारत में भुखमरी फैलने का एक मुख्य कारण यहाँ की अशिक्षा, बेरोजगारी और निर्धनता है। यहाँ की निर्धनता की तुलना किसी भी अन्य देश से नहीं की जा सकती। जब भुखमरी का हमारे ऊपर प्रकोप होता है तो निर्धनता के कारण हम उसका अच्छी तरह से सामना नहीं कर पाते है, न तो हमारे पास पर्याप्त मात्रा में सुरक्षित अन्न ही होता है और न धन होता है, जिससे कि भुखमरी का अच्छी तरह सामना किया जा सके। इस प्रकार हमारी यह भुखमरी अन्न की भुखमरी न होकर धन की भुखमरी भी होती है। अकाल में भुखमरी स्वाभाविक होती है, पर प्रत्येक भुखमरी जैसी अवस्था में अकाल नहीं होता। भुखमरी, गरीबी की ओर भी इंगित करती है किन्तु सदैव ही ग़रीबी का अर्थ भुखमरी भी नहीं होता। हम गरीबी के सामान्य धरातल से आगे बढ़ कर अकाल की बात करते हैं।
सन् 1876-78 में दक्षिण भारत में भीषण अकाल पड़ा और इसके निवारण के लिए सर रिचार्ड स्टैचे की अध्यक्षता में एक अकाल कमीशन नियुक्त किया गया। इस कमीशन ने अकाल-निवारण के लिए कुछ सिद्धान्त निश्चित किए वे सिद्धान्त निम्नलिखित है :-
·        काम करने योग्य शिक्षित व अशिक्षित व्यक्तियों को अच्छे परिश्रमिक पर कार्य दिया जाए,
·        जो लोग काम करने के योग्य नहीं उन्हें उनके गाँव में कुछ आर्थिक सहायता दी जाए,
·        खाद्यान्न वितरण की अच्छी व्यवस्था की जाए,
·        फसलों के नष्ट-भ्रष्ट या न होने की दशा में उन लोगों से जो भू-स्वामी है, माल-गुजारी न ली जाए या ली जाए तो उचित रूप से ली जाए।

जो अकाल निवारण के लिए कमीशन ने सन् 1878 में जो बातें कही थी वैसे सिद्धान्तों को लेकर आज भी बार-बार योजना/नीति आयोग और सरकारों को लिखा जाता है लेकिन इसका केन्द्रीय सरकार पर कोई असर नहीं दिखाई देता है। देश में खाद्य सामग्री की आपूर्ति से ही सारा ध्यान अकेन्द्रित रहता है। भुखमरी की बात में व्यक्तियों और वस्तुओं के सम्बन्ध महत्वपूर्ण बन जाते हैं। यह बात तो स्पष्ट होती है कि भुखमरी की बात व्यक्तियों के खाद्य पदार्थों पर स्वामित्व की ही बात है। अतः भुखमरी के स्वरूप को सही रूप से समझने के लिए हमें समाज में स्वामित्व की संरचना को ठीक-ठीक समझना होगा। खाद्य आपूर्ति पर मालीकाना हक एक प्रकार का अधिकार है, जो हकदारी का दावा करता है लेकिन यह दावा भुखमरी के दौर में पूँजीपतियों का लाभ के लिए उपयोग किया गया एक बाजारीय प्रापेंगेन्डा है, न की कोई मौलिक अधिकार। स्वामी विवेकानंद ने जनता के श्रम पर बने अमीरों की भर्त्सना करते हुए कहा है कि ’’जब तक करोड़ों लोग भूखें और अज्ञानी बने रहते हैं, मैं उन शिक्षित व्यक्तियों को, जो उनके मूल्य पर पढ़े हैं, किन्तु उन्हें शिक्षित करने का प्रयास नहीं करते, देशद्रोही मानता हूँ।’’
आंतोनिन आर्तो ने कहा है कि ’’मुझे लगता है कि उस संस्कृति का पक्ष लेना जो कभी किसी व्यक्ति को भूख से बचा कर नहीं रख पायी उतना महत्वपूर्ण नहीं है जितना संस्कृति नाम की चीज़ से उन विचारों को खींच निकालना जिनकी शक्ति भूख की बेबस कर देने वाली शाक्ति से मिलती-जुलती है।’’ फिर भी भूख के विरूद्ध जंग अभी भी किसी भी तरह से जीती नहीं गयी है। जनता के दबाव और राज्य की कार्रवाई अकालों को न होने की अपेक्षा भूख पर काबू पाने या पर्याप्त पोषण जोकि न केवल जिंदा रहने के लिए बल्कि एक स्वास्थ्य और सक्रिय जीवन के लिए आवश्यक है, उससे वंचना से निपटने में कम सफल रहे हैं।
अतः देश की जनता को अशिक्षा, बेरोजगारी,  गरीबी और दरिद्रता से निकालने के लिए संघर्ष करना होगा।

गुरुवार, जनवरी 23, 2020

पुस्तक समीक्षा : कविताओं में भी छोटी-छोटी कवितायें छिपी हैं।

गुरमिन्दर सिंह जी की किताब “काग़ज़ की तलाश” एक बार सरसरी निगाह से पढ़ी और फिर एक बार तसल्ली से पढ़ी।
कवि मन का साहित्य के प्रति प्रेम तो इन के शीर्षकों से ही झलकता है जब ये “काग़ज़ की तलाश”  या “किताब खुली रहने दो” जैसे शीर्षक रखते हैं। 
मुझे लगता है , “काग़ज़” का प्रयोग कवि ने  “उम्मीद” या  “आशा” के अर्थ में किया है ।
गुरमिन्दर जी को पढ़ते हुए उनकी छटपटाहट पाठक तक भी आती है और पाठक भी इन्हीं के साथ साथ न केवल गाँव, खेत में घूमता है बल्कि उन्ही के साथ-साथ शहरों में आकर सरकारी तंत्र से, भ्रष्टाचार से .. रूह खोती कोमलता से भी दो-चार होता है ।
 “चमगादड़ की तरह 
उलटा लटका हुआ है 
आज का इंसान .....  
कविता में इंसान की लाचारी दिखती है तो....
“मैं बाज़ार की वस्तु 
फ़िल्म का किरदार 
सरकार की योजना हूँ ...”
कविता में बाज़ारवादी व्यवस्था के साथ-साथ सरकारी घोषणाओं के मायाजाल को इंगित किया है।
कवि केवल लिखने के लिये ही नही लिखता जैसा आजकल हो रहा है बल्कि जिन के लिए लिख रहा है उनकी सारी अपेक्षाओं, उपेक्षाओं व उम्मीदों को महसूस भी करता है ...
“....बाक़ी जो जनता बच गयी 
वो तो अवशेष है”  
कविता में राजनीति कैसे जनता के साथ खिलवाड़ कर पोषित हो रही है का “अच्छा हिसाब" लगाया है ।
“कविता मिली आज फटेहाल में 
शब्द पाये दिगम्बर स्थिति में ........,

साहित्य अकादमी के द्वार पर 
भीख माँगते देखा कविता को”

आज के लेखन में फैली राजनीति का कितना सटीक चित्रण है ।
“ कितना भी क्रूर हो ज़माना 
स्नेह धीरे से जाता है पनप 
लाख कीचड़ उछाले कोई 
आख़िर फूल तो जाता है खिल ....

.....सच जाता है बिखर 
अपने पिटारे से ....
कि अपनी ही खूशबू से 
अपनी गन्ध उड़ी है ।”
विश्वास से भरी कविता है जिसमें कवि कहता है कि बंधनों से ...
आज़ादी की खूशबू को बाँधना नामुमकिन है .. 

ये खूशबू है जो गन्ध की तरह फैल जाएगी। 
 “समर्पित” कविता में महानगरों में रहने वाले लोगों का डर व मकान मालिकों की साम्राज्यवादी मानसिकता का ज़िक्र है तो “तट तक आओ” एक मधुर सी प्रेमपगी कविता है तो “समाज” एक क्रांतिकारी कविता है जिसमें कवि की हुंकार सुनाई देती है। “रंग बिखेरना” भी एक अलग से भाव की कविता है।

“मैं वो पत्र हूँ जिसमें,
भार के अनुपात में,
कटौती कर लगे हैं टिकट,
न भेजने वाले को ग़म,
पाने वाले का इंतज़ार बाक़ी,
डाक घर की अभी रक़म बाक़ी,
छूटने को छटपटा रहा हूँ .....
एक कविता है जिसमें पत्र के माध्यम से अपनी विवशता दर्शायी है ।

गुरमिन्दर जी की जो बात मुझे सबसे ज़्यादा अच्छी लगी वो ये कि कविताओं में भी छोटी छोटी कवितायें छिपी हैं।
“सुरक्षा का बल ही, 
इंसान की असुरक्षा है”

“इंसान की जड़ें सूख रहीं,
तना न जाने हरा कैसे”

“आज बाहर निकल कर देखा, 
मेरी ज़िंदगी का सफ़ा ख़ाली”

“वह लिबास में संस्कृति तलाशता है,
विचारों में झाँकने की कोशिश नही करता” 

जैसी दो-दो पंक्तियों की कवितायें हैं जो आप को रुक कर सोचने पर मजबूर करती है।
“काग़ज़ की तलाश” की कुछ अन्य कवितायें .. अर्ज़ी, लड़की, फ़ाइल, शब्दावली, अर्थी के पास, शिशिर के शिविर भी काफ़ी अच्छी कवितायें हैं। 

कवि का मन भावुक भी है, दुःखी भी, उसमें ग़ुस्सा तो है पर सकारात्मक ग़ुस्सा है।

सबसे बड़ी बात कि कवि आशावादी है ...
उसे विश्वास है कि सही आवाज़ चीज़ों को बदल सकती है....
“लगा एक ज़ोर से आवाज़,
दुनियाँ के शोर से,
बड़ी हो,
तेरी वो आवाज़।”
कवि को अनन्त शुभकामनायें  🌹 🌹
श्रीमति सरोज पुनिया 
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