रविवार, जनवरी 19, 2020

संस्कृति और भाषा

सृजनात्मक महत्वाकांक्षा ही मानव प्रकृति (कृतिम प्रकृति) का निर्माण करती है और यह दिन-प्रतिदिन बढ़ती रहती है। अतः बुद्धि का उपयोग निरन्तर बल और श्रम के साथ संस्कृति निर्माण का कार्य करती है। संस्कृति का केन्द्र बिन्दु आत्मिक संस्कृति है, वस्तुगत जगत और दृष्टिकोणों के आधार पर निर्मित जीवन पद्धति संस्कृति का निर्माण एवं परिवर्तन का युग है, जिसे हम आदिम, दास प्रथा, समांतवदी, पूँजीवादी, और समाजवादी आदि संस्कृति की कसौटी कहते हैं।


संसार को एक रूप करने वह समझने के लिए भाषा सार्वभौमिक सामग्री है। भाषा का पूर्ण विस्तार ही मानवीय विस्तार है, आपसी सहयोग का विस्तार है। अत: उस समय काल की संस्कृति का विस्तार भी भाषा पर निर्भर करता है, क्योंकि भाषा के विस्तार से संस्कृति एक कोने से दूसरे कोने की ओर कदम रखती है जिस रफ्तार से पश्चात भाषाएं दुनिया के हर कोने की ओर बढ़ी हैं उसी रफ्तार से पश्चात संस्कृति भी हर तरफ़ बढ़ती जा रही है। 

जब दो सभ्यताओं का संपर्क होता है तो उनमें सांस्कृतिक विश्लेषण कई स्तरों पर होता है, जिसका व्यापक प्रभाव पड़ता है। कभी-कभी आंशिक पड़ता है तो कभी पूर्णतया परिवर्तित हो जाता है। उसमें सकारात्मक व नकारात्मक दोनों ही प्रकार की प्रतिक्रियाएं होती हैं। संस्कृति प्रकृति का एक बहुमूल्य हिस्सा है और संस्कृति का जन्म सभ्यता से होता है। अतः सभ्यता का जनक मानव है इसलिए यह तथ्य साफ़ है कि मानव सभ्यता और संस्कृति का जनक है।

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