रविवार, जनवरी 19, 2020

पुरुष प्रधान समाज और बेटी

ओ लड़कियों!
तुम क्यों पढ़ना चाहती हो,
तुम तो अदद फूल हो,
इस संसार की रौनक हो,
क्यों इन पौथियों के चक्कर में आकर,
तुम भी!
दस से छः की सरकारी बाबू,
बनना चाहती हो,
हमारा समाज और ये सरकारें,
केवल अपनी राजनीति के लिए,
आपका भी उपयोग कर रही हैं,
ड्रेस किताब साइकिल कभी एमएसटी,
ये सब छलावे मात्र है,
तुम्हारी तरक़्क़ी के,
जहाँ देश का संविधान सँवरता है,
वहाँ तो आरक्षण दे नहीं सकते,
घर की लड़की को दूर पढ़ा नहीं सकते,
बराबरी का दर्ज़ा,
केवल बोलने मात्र,
माँ-बाप की नज़र में अभी तक,
पुरुष प्रधान समाज रचा बसा है,
बेटा वंश चलायेगा,
बेटी पराये घर जायेगी,
वो बात अलग है,
बेटा जेल में भी सम्मान के क़ाबिल है,
बेटी का बाप होना, जैसे कंलक,
यह संकीर्ण मानसिकता,
कब तक ज़िंदा रहेगी,
ओ लड़कियों!
इतना पढ़ो और बढ़ो,
समाज तुम्हारे आगे,
जब तक नहीं झुक जाता,
देवियों की तरह पूजा मान्य नहीं,
लड़कियों को संतान मानो।

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