रविवार, जनवरी 19, 2020

अर्थी के पास

आओ तुम्हारे अधरों को
इन नैनों से सहला दूं
अपनी बहकी बाँहों से
तेरे तन का दर्द मिटा दूं
कर्मठ हैं तेरे क़दम
पलकों से सहला दूं
किस व्यथा के कारण
तुम थककर लेट गईं
पैरों की फटी हालत को
हृदय के सागर से धो दूं
तू पथ पर पत्थर तोड़ें
मैंमदिरालय में प्याले फोड़ू
तुम ममता को रोती हो
मैंप्याले-प्याले को फिरता हूँ
तुम करती हो कर्म मेरा भी
क़दम मेरे तब रुकते हैं
जब प्याला चढ़ जाता है
यूँ तो भरकस कोशिश करता हूँ
हर शाम से पहले ‘मैं’ ढलता हूँ
प्याली में मदिरा सा मगर
प्रतिज्ञा करता हूँ कि आज के बाद
न क़दम रखूँगा शराब के ठेके में
प्रातः ही चढ़ती है सनक
दो घूँट मार ही लेता हूँ
उन्हें क्या महक आयेगी
उन पत्थरों की ताड़-ताड़ में
पहुँच भी गयी तो सरक जायेगी
हथौड़े की चोट से अन्दर
या उस बाबू की सुर्ती की महक में
घुलमिलकर रह जायेगी
जिसको देखकर तुम्हें मुस्कुराना होता है
क्योंकि कल के काम का
हिसाब-किताब जो लगाना होता है
ओर वह झाँकता होगा
आपकी कनखियों के अन्दर
उधड़ी हुईं सिलाई देखकर
ज़रा ग़ौर से देखता होगा
आओ आज में सिल देता हूँ
आपकी हालात के चिथड़े
मिटा देता हूँ ज़ख़्म
आपके हृदय के कोने से
प्रिय तुम बोलती क्यूँ नहीं
उठकर पुकारती क्यूँ नहीं
आज फिर ‘मैं’ प्रतिज्ञा करता हूँ
कल से दूर नहीं जाऊंगा।

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