शुक्रवार, जनवरी 31, 2020

Constitution and right to food : संविधान और भोजन का अधिकार

भारत का संविधान 26 नवम्बर 1949 को पारित हुआ तथा 26 जनवरी 1950 से प्रभावी हुआ। भारतीय संविधान की धारा 21 में दिए गए जीवन के (बुनियादी) अधिकारसे जोड़कर हम भोजन के मानव अधिकार को देख सकते हैं । वास्तव में, उच्चतम न्यायालय ने कई बार स्पष्ट रूप से कहा है कि जीवन के अधिकार की व्याख्या मानवीय सम्मान के साथ जीनेके मानव अधिकार के रूप में की जानी चाहिए, जिसमें भोजन और दूसरी बुनियादी जरूरतों का अधिकार शामिल है।

मैग्ना कार्टा के अनुसार न्याय अथवा मानव अधिकार प्रत्येक व्यक्ति को दिये जायेंगे, इनमें किसी प्रकार का विलम्ब नहीं होगा और न इसका क्रय ही किया जायेगा। न्यायिक हस्तक्षेपों और व्याख्याओं ने इस मानव अधिकार की सीमाओं का विस्तार करके भोजन के मानव अधिकार, काम के मानव अधिकार और आवास के मानव अधिकार समेत कई दूसरे सामाजिक आर्थिक मानव अधिकारों को शामिल किया गया है। नियमित पोषण के बिना जीवन जैविक तौर पर असंभव है इसलिए भोजन के अधिकार को व्यापक रूप से एक बुनियादी मानव अधिकार माना गया है।

भोजन के अधिकार को संविधान की धारा 39 (ए) और 47 के साथ भी जोड़ा जा सकता है। धारा 39 (ए) में निर्देष है कि राज्य यह सुनिश्चित करें कि सभी नागरिकों के पास आजीविका के पर्याप्त साधनों का अधिकारहो। संविधान की धारा 47 के अनुसार राज्य अपनी जनता के पोषण-स्तर और जीवन-स्तर को ऊँचा उठाने और जन-स्वास्थ्य में सुधार को अपने मूल कर्तव्यों में गिनेगा।ये दो धाराएं  “राज्य के नीति निदेशक सिद्धांतों से संबद्ध हैंजिन्हें यह नहीं माना जाता कि अदालत द्वारा लागू करवाया जा सकता है (धारा 37)। किंतु यह तर्क देना संभव है कि धारा 39 (ए) और 47 को जीवन के बुनियादी अधिकार की अभिव्यक्ति के रूप  में अदालत से लागू करवाया जा सकता है।
इस संबंध में दो बहुत ही महत्वपूर्ण केस निम्नलिखित हैं:-
  • भारतीय कानूनी सहायता और सलाह परिषद द्वारा 1996 में उच्चतम न्यायालय में दायर याचिका (नागरिक) सं. 42/97     
  • पीपुल्स यूनियन फॉर सिविल लिबर्टीज, राजस्थान द्वारा 2001 में उच्चतम न्यायालय में दायर याचिका (नागरिक) सं.196
सन् 2001 के मध्य में भारत में बहुतायत के बीच भूखका एक नया रूप देखने को मिला। एक ओर देश में अनाज का भण्डार इतना भरा जितना कभी नहीं भरा। दूसरी ओर सूखा-ग्रस्त तथा अन्य इलाकों में भूखमरी भी बढ़ी। इस स्थिति के आधार पर पीपुल्स यूनियन ऑफ सिविल लिबर्टीज़ (पी.यू.सी.एल.) यानि नागरिक आज़ादी के लिए जन संगठन” - राजस्थान इकाई ने रोटी के हक़को लेकर उच्चतम न्यायालय में एक अर्जी डाली। शुरू में यह केस, सूखा-राहत के विशिष्ट सन्दर्भ में, भारत सरकार, भारतीय खाद्य निगम और छः राज्य सरकारों के विरुद्ध दायर किया गया था। लेकिन बाद में इसमें व्यापक तौर पर मौजूद, नियमित बनीं रहने वाली भूख को शामिल किया गया और सभी राज्यों को मुद्दई बनाया गया जिनसे जवाब-तलब करना था। 

23 जुलाई, 2001 को कोर्ट ने यह टिप्पणी कि  “हमारी राय में, सबसे अधिक महत्व इस बात का है कि भोजन, वृद्ध, विकलांग और कमजोर लोगों, गरीब औरतों, गरीब पुरुषों को मिले जो भूख से मरने के खतरे से जूझ रहे हैं, गर्भवती और दूध पिलाने वाली मांओं ओर गरीब बच्चों को मिले, विशेषकर उनको जिनके पास या जिनके परिवार के पास पर्याप्त धन नहीं है कि वह भोजन प्राप्त कर सकें। अकाल की स्थिति में भोजन की कमी हो सकती है, परन्तु यहाँ बहुतायत के बीच कमी वाली स्थिति है। भोजन बड़ी मात्रा में उपलब्ध है परन्तु अति-गरीब और बेसहारा लोगों के बीच उसका वितरण कम होता है और कभी तो होता ही नहीं है, जिससे कुपोषण, भुखमरी और उससे संबंधित अन्य समस्याएं उठ खड़ी होती हैं।

पहले केस में, उड़ीसा के कालाहांडी, बालंगीर और कोरापुट ज़िलों में भूख से हुई मौतों की रिपोर्टों को भारत के उच्चतम न्यायालय के नोटिस में लाया गया था। याचिका दाखिल करते हुए उच्चतम न्यायालय ने संवैधानिक संस्था राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग को उस क्षेत्र में चिरकालिक भूख की स्थिति का ज़ायज़ा लेने के लिए कहा था। आयोग ने अपनी सुनवाइयों और प्रभावित क्षेत्रों के कष्टदायक दौरों, जो की कई वर्षों तक जले, द्वारा महत्वपूर्ण योगदान दिया और स्पष्ट किया कि दरिद्रता और दीर्धकालिक संकट भूखमरी की निशानी है, न केवल मौत; साथ में यह भी स्पष्ट किया कि भुखमरी उस मौलिक अधिकार का जर्बदस्त उल्लंघन और इंकार है जिसके तहत हरेक व्यक्ति को भूख से मुक्ति का मानव अधिकार है।

इस अर्जी का कानूनी आधार बहुत सीधा सादा है। संविधान की धारा 21 जीने के हक़ देती है और सरकार का कर्तव्य बनता है उसकी रक्षा करना। यह एक मौलिक अधिकार है। पहले के कई केसों में उच्चतम न्यायालय ने फ़ैसले दिए हैं  कि जीने के अधिकार का मतलब है इज़्ज़त से जीने का अधिकार और रोटी या खाने का मानव अधिकार भी अन्य कई अधिकारों की तरह इज़्ज़त से जीने के अधिकार में शामिल है। मूल रूप से इस अर्जी में दलील दी गई है कि नीति तथा कार्यान्वयन, दोनों स्तरों पर, राहत की स्थिति के प्रति केन्द्र और राज्य सरकारों की प्रतिक्रिया स्पष्टतः इस मानव अधिकार का उल्लघंन है। इस अर्जी ने इस बात को साबित करने के लिए सरकारी और ज़मीनी स्तर के आँकड़ों का प्रयोग किया है। 

खाद्य सुरक्षा मुहैया कराने में सरकारी उपेक्षा को लेकर अर्जी ने दो पहलुओं को चिन्हित किया है। एक है सरकार द्वारा सार्वजनिक वितरण प्रणाली  (राशन प्रणाली ) का ख़त्म किया जाना। राशन प्रणाली की असफलता कई स्तरों पर उजागर होती है। इसकी सुविधा केवल ग़रीबी रेखा के नीचे जी रहे लोगों के लिए सीमित की गई है ।
इस अर्जी का दूसरा बिन्दु है सरकार के राहत कार्य की कमियाँ। कई राज्यों में अकाल सम्बंधी नियमावली है जिसके आधार पर राहत कार्य होते हैं । सूखा की स्थिति में इन्हें लागू करना अनिवार्य हो जाता है। इसके अनुसार ये ज़रूरी है कि हर ऐसे व्यक्ति को काम दिया जाए जो राहत-कार्य के लिए आता है। लेकिन इसके विपरीत राजस्थान सरकार ने श्रम-सीमाकी नीति अपनाई है। इसमें सरकारी आँकड़ों के अनुसार: सूखा पीड़ित आबादी को ही काम मिल पाता है। वास्तविक रोज़गार का स्तर इससे भी नीचे है। बहुत से राज्यों से ख़बर मिली है कि कानूनी रूप से मान्य न्यूनतम वेतन नहीं मिलता है। 

इन समस्याओं की जिम्मेदारी सरकार पैसों की कमी पर डालती है। उच्चतम न्यायालय ने पहले ही कह दिया है कि संवैधानिक कर्तव्यों को पूरा करने की असफलता को सरकार पैसे की कमीके मत्थे नहीं मढ़ सकती। वैसे भी, खाद्य के ऊपर तक भरे भण्डारण को देखते हुए यह बहाना बिल्कुल नहीं लागू हो सकता। राज्य सरकार ने बार-बार केन्द्र सरकार से राहत-कार्य के लिए मुफ़्त अनाज माँगा है पर उसे मिला नहीं। लेकिन यह भी है कि राज्यों को जो अनाज मिला है उसका भी अक्सर पूरा उपयोग नहीं हुआ है। इसकी वजह से राज्य सरकार का पक्ष कमज़ोर भी पड़ जाता है। 

संविधान की इससे जुड़ीं धाराएं इस प्रकार हैं:-
  • संविधान की धारा 21:- “किसी भी व्यक्ति को अपनी ज़िन्दगी या वैयक्तिक स्वतंत्रता से जुदा नहीं किया जा सकता सिवाय कानून द्वारा स्थापित प्रक्रिया के।
  • संविधान की धारा 39 (ए):- राज्य ...अपने नीतिनिर्धारण द्वारा यह सुरक्षित करेगा कि नागरिकों, पुरुषों व महिलाओं दोनों के पास समान रूप से आजीविका कमाने के पर्याप्त साधनों का अधिकार हो।
  • संविधान की धारा 47:- “पोषण के स्तर और अपनी जनता के जीवन स्तर को ऊँचा रखने और जन-स्वास्थ्य में बेहतरी लाने को राज्य अपने प्राथमिक कत्र्तव्यों में गिनेगा...।
  • संविधान की धारा 39 (1):- “इस भाग में जो अधिकार दिए गए हैं उन्हें लागू करने की गारंटी के लिए उपयुक्त प्रक्रिया द्वारा उच्चतम न्यायालय में जाने का अधिकार।

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