रविवार, जनवरी 19, 2020


इन्सान सुकून ढूंढ़ता बाज़ार चला आया,
ज़िन्दगी को चलाने वह शहर चला आया।

सियासत ने फिर वादों की झड़ी लगाई,
अमन की तलाश में फ़कीर चला आया।

उसके ख़्याल शजर हो कर रह गये,
वो आज भीड़ में तलवार चला आया।

सियासत ने इंसानियत को तक़सीम में रखा,
बच्चा हर त्यौहार में इख़्तिफ़ार चला आया।

मैंने सदियों से उसकी ज़िन्दगी के लिए व्रत रखे,
वो आज फ़िर नई दुनिया बसाकर चला आया।

गाँव की मिट्टी की ख़ुशबू शहर में आने लगी,
सपनों को ख़रीदने जाने कौन इधर चला आया।

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