बुधवार, जनवरी 29, 2020

भूख और गाँधी जी का ग्राम स्वराज्य : Hunger and Gandhi's Gram Swaraj

’’भोजन व्यक्ति के लिए है न कि व्यक्ति का जीवन भोजन के लिए’’- गाँधी जी ने जब यह विचार दिया था तब उन्होने सोचा होगा कि व्यक्ति को जिन्दा रहने के लिए भोजन चाहिए न कि जीवन भर भोजन इकट्ठा करने में व्यक्ति का जीवन ही लग जाय। इस संदेश से स्पष्ट होता है कि गाँधी जी ने जो कल्पना ग्राम स्वराज्य में की थी यह उसका एक आधार है। 

भूख को मिटाने के लिए भोजन की आवश्यकता होती है लेकिन भोजन तक पहुँच के रास्ते में गरीबी एक बड़ा अवरोध है जिसे हम भारत के हर हिस्से में महसूस कर सकते है। आर्थिक व सामाजिक अवरोधकों के द्वारा कुछ लोग हाशिये पर है। ऐसा नहीं है कि लोग हाशिये पर बना रहना चाहते है राजनैतिक और स्वार्थी तत्वों के चलते कुछ लोगों को बढावा दिया जाता है और समाज का बड़ा तबका उन सभी जरूरी चीज़ों से लगभग वंचित हो जाता है जिनके चलते वह जिन्दा भर रहने के लिए जीवन भर जद्दोजहद करता रहता है। समाज में गरीबी एक अभिशाप है जिसका शिकार समाज का एक बड़ा हिस्सा हो रहा है। व्यक्तिगत व परिवार के लिए खाने की व्यवस्था करने में ही उसकी कमाई का ज्यादातर हिस्सा चला जाता है।

गाँधी जी अनुसार ऐसी विशमता तथा असमानता पर आधारित सामाजिक व्यवस्था में जिसमें कुछ थोड़े से व्यक्ति ही अमीर होते है तथा अधिकांश जनता को जीवन के लिए पर्याप्त भोजन भी नहीं मिल पाता हो, रामराज्य की स्थापना नहीं की जा सकती है। गाँधी जी का इन वर्षों में भुखमरी व अकाल को समझने और अपनी पद यात्राओं के दौरान नजदीक से देखने का मौका मिला जिनमें वर्ष 1891 से 1901 तक लाखों आदमी भुखमरी और महामारी के कारण काल के ग्रास बन गए। इसके पश्चात वर्ष 1911 से  21 तक के समय में पुनः संक्रामक रोगों का दौर-दौरा हो गया। लाखों मनुष्य काल के गाल में चले गये। विश्व में लाखों लोग ऐसे है जो बिलकुल ही निराश्रित है और जिनके रहने के लिए मकान तक नहीं है और जो सड़को की पटरियों और पुलों पर रहते है और जिन्हें अपना पेट कूड़ेंदानों  और कूड़े के ढेरों से खाद्यान्न बीनकर भरना पड़ता है और अधिकांश इस प्रकार के निराश्रित व्यक्ति भारतीय उपमहाद्वीप में ही रहते है। हम भारत में भूख पर बात करना चाहते है क्योंकि भारत में भूख अभी भी पर्याप्त रूप से फैली हुई है दुनिया की आबादी का बीस प्रतिशत हिस्सा भारत की सीमाओं में समाया हुआ है भारत में लगभग 20 करोड़ लोग रोज़ भूखे सोते हैं और लगभग 5 करोड़ लोग भुखमरी के कगार पर हैं यानि आसानी से कहा जा सकता है कि भारत की आबादी में से लगभग 25 करोड़ लोग भुखमरी के कगार पर है। 

गाँधी जी अनुसार सामाजिक प्रगति का परीक्षण यह है कि जन-सामान्य में से भुखमरी की स्थिति समाप्त हो जाए। गाँधी जी चाहते थे कि प्रत्येक व्यक्ति को अपने भोजन के लिए कार्य करना चाहिए। इस सिद्धान्त के सम्बन्ध में उनका विष्वास था कि ’’यह सामाजिक ढांचे में मूल क्रान्ति उत्पन्न करेगा तथा समाज में श्रेणी के विभेद, श्रम तथा पूँजी  के मध्य के संघर्ष तथा गरीब व अमीर के मध्य की खाई को समाप्त करेगा। भूख एक शब्द या विचार नहीं है, भूख! जिस्म के भोजन के लिए भूख! जो इन्सान के जन्म के साथ ही पैदा होती है वह खुद उसके साथ जीती है मरने तक। भूख से उनका सरोकार था कि वह भूख रहे भुखमरी न बनें क्योंकि जब भूख, भुखमरी बनती है तो उसका प्रकोप सामाजिक हो जाता है न कि व्यक्तिगत। जब कोई भी समस्या सामाजिक हो जाती है तो उसके परिणामों की गणना करना आसान नहीं होता। काश! हम प्राकृतिक संसाधनों का दोहन भूख को मिटानें में कर पाते। लेकिन सदियों से ही समाज का एक बड़ा हिस्सा भोजन की कमी से भूख के मारे जान क्यों गवाता रहा है। जबकि कुछ लोग अपने लिए हमेशा भोजन का प्रबंध करते रहे हैं। उन्होने सत्य तथा अंहिसा को आर्थिक प्रणाली के अनिवार्य अंग मानते हुए, अपरिग्रह, सम्पति के समान वितरण, रोटी, श्रम, तथा स्वदेशी पर जोर दिया। गाँधी जी का श्रम से तात्पर्य रोटी के लिए किये जाने वाले श्रम से था।

उन्होने अंशदान करने वाले तथा दानी वर्ग के व्यक्तियों के द्वारा गरीबों की जाने वाली कृपा को, गरीबी का अपमान माना है । उनके शब्दों में ’’मैं नंगे रहने वाले व्यक्तियों को कपड़े देकर उनका अपमान नहीं कर सकता हूँ, क्योंकि उन्हें कपड़ों की आवश्यकता  नहीं है। इसके बजाय मुझे उन्हें काम देना चाहिए जिसकी उन्हें अत्यधिक आवश्यकता  है।’’ समाज का एक बड़ा हिस्सा रोटी, कपड़ा और मकान के लिए जीवन भर जद्दोजहद करता रहता है। किसी को भूखें और खुले आसमान में जिंदगी बिताने के लिए समाज किन अधिकारों से छोड़ देता है।

गाँधी जी की जीवन के अन्त समय में दुनिया भर में यह माने जाने लगा कि समाज कल्याण में भूख को विशेष दर्जा देना ही होगा। संयुक्त राष्ट्र संघ की आम सभा, 1948, द्वारा मानव अधिकारों की सार्वभौमिक घोषणा समकालीन अंतर्राष्ट्रीय मानव अधिकारों की व्यवस्था की स्थापना हुई, जिसके अनुसार मानव परिवार के सभी सदस्यों के सहज सम्मान, समान और अहस्तांतरणीय मानव अधिकारों की मान्यता, भारत में स्वतंत्रता, न्याय और शांति का आधार हैयह घोषणा यह भी मानती है कि इन मानव अधिकारों को लागू करने की मुख्य ज़िम्मेदारी राष्ट्रीय सरकारों की है। इसमें कहाँ गया है कि यदि लोगों के पास मानव अधिकार हैं तो उन्हें यह बुनियादी दावा करने का हक़ है कि दूसरे लोग कुछ चीजों को करें या करने से बचें, चूँकि राज्य अपनी सीमाओं में व्यवस्था और सामाजिक न्याय के लिए प्राथमिक तौर पर उत्तरदायी हैं, राज्य इन व्यक्तिगत और बुनियादी दावों का प्राथमिक लक्ष्य हैं...। पर्याप्त भोजन के मानव अधिकार के उत्तरोत्तर साकारीकरण हेतु राज्यों से अपेक्षा है कि वे अंतरर्राश्ट्रीय कानून के अंतर्गत अपने सुसंगत मानवाधिकारों के दायित्वों को पूरा करें।

भोजन का प्रबंध जोकि प्रत्येक व्यक्ति का जन्म सिद्ध अधिकार है, उस अधिकार की हमेशा अवहेलना ही होती रही है। अगर कहीं पर भूख के लिए कुछ कार्य हो रहे है तो वह अधिकारों की तरह नहीं बल्कि दया भाव से हो रहे है। भुखमरी मिटाने के लिए होने वाले कार्यों को दया भाव से किया जाता है। सन् 2007 के अक्टूबर माह में मुझे साबरमती नदी के किनारे बसे शहर  अहमदाबाद जाने का मौका मिला। जहाँ गुजरात विद्यापीठ में दो दिवसीय बैठक हो रही थी, विषय था ’’अन्न अधिकार’’। काफी उत्साहित था में गाँधी जी के विचारों पर बनीं विद्यापीठ में हो रही अन्न अधिकार की बैठक को लेकर। लेकिन दिल कुछ दुखी हुआ वहाँ के स्थानीय लोगों से बात करके की गाँधी के स्वराज्य की बात हमें कहीं भी अमल में नहीं दिखायी देता, देश से तो गाँधी जी का गाँव आत्मनिर्भरता का सपना शायद कभी भी पूरा नहीं हो सकेगा। अंग्रेजों ने हमें वर्ग और क्षेत्र में बांटा था लेकिन हमने उन्हें खाने के लिए भोजन तो दिया नहीं और बाटकर भी रखा है, निम्न आय वर्ग और उच्च आय वर्ग में, आदि ।

भारत में नीति-निर्धारकों ने कुछ हद तक कुपोषण की लगातार उपस्थिति को तो स्वीकार कर लिया जाता है और हल भी निकाला जाता है बेशाक वह मुकम्मल नहीं होता, किन्तु भयंकर भूख की स्थितियों या दीर्घकालिक भूख की क्षेत्रीय स्थितियों को कम ही स्वीकार किया जाता है, उसका अध्ययन या हल कम ही किया जाता है, जैसा पहले ही कहा गया है स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद शुरू के वर्षों में खाद्य-असुरक्षा का भारी खतरा जो हमारे देश की करोड़ों की आबादी पर मंडरा रहा था, वह अकाल और भारी भुखमरी का था जो कम कृषि उत्पादकता का नतीजा था, जिसका कारण कृषि उत्पादकता का अस्थिर मानसून पर निर्भर होना और भूमि और खाद्य का अत्यधिक असमान वितरण था। भारत का कल्याण कृषि से अधिक अच्छा और शीघ्रता से किया जा सकता है। यहीं वस्तुएं और सेवाएं कृषि और कृषीतर संसाधनों से प्राप्त होती है। कृषि से भोजन और कपड़ा मिल सकता है तथा घरेलू अथवा लघु उद्योग भी उपलब्ध हो जाते है जिन्हें उत्तरोत्तर बढाने की आवश्यकता  है और मेहनत-मजदूरी को कम करने की आवश्यकता  नहीं है।

गाँधी जी ने लिखा है कि ’’नगरवालों के लिए गाँव अछुत हैं। नगर में रहने वाला गाँव को जानता भी नहीं। वह वहाँ रहना भी नहीं चाहता। अगर कभी गाँव  में रहना पड़ ही जाता है तो षहर की सारी सुविधाएं जमा करके उन्हें शहर का रूप देने की कोशिश करता है। अगर वह तीस करोड़ ग्रामवासियों के रहने लायक शहरों का निर्माण कर सके तो यह कोशिश बुरी नहीं कहीं जायेगी।’’

गाँधी जी का मानना था कि जब हम नीतियों का निर्धारण करें, तो निर्धारण का काम ग्राम पंचायतों के माध्यम से जिला, राज्य से होते हुए वह केन्द्रिय सरकार तक पहुचे जिसकी अवहेलना भारत में आज तक होती रही है। क्योंकि भारत की आत्मा ग्राम में निवास करती हैं। ग्राम स्वराज्य में साफ़ कहा गया है कि हमें गाँवों का विकास करके जन-साधारण को आत्म निर्भर बनाना है।

गाँधी जी गाँवों व आदिवासी क्षेत्रों में होने वाली स्थानीय फसलों व साग-सब्जियों के उपयोग को प्राथमिकता देते थे जिसका मुख्य कारण था कि खाद्य सामग्रियों का मौसम व वातावरण के साथ उनकी पौष्टिकता का होना। पोशण और पुष्टिकर आहार की समस्या पर गाँधी जी ने कहा कि ’’भारतीयों को पूरा पोषण न मिल पाने की वजह गरीबी ही नहीं, भोजन के पोषण-तत्वों के संबंध में उनका घोर अज्ञान भी है।’’ हमारे देश के निवासियों को किस प्रकार का भोजन प्राप्त होता है। यहाँ के निवासी जिस प्रकार का भोजन करते हैं वह आवश्यक पौष्टिक तत्वों से वंचित रहता है, उसमें जीवन-रक्षक प्रदार्थों का अभाव रहता है। पौष्टिक भोजन तो दूर रहा यहाँ पर कितने ही ऐसे व्यक्ति हैं जिन्हें भर पेट भोजन भी नहीं मिल पाता। ऐसी दशा में यह आशा करना कि भारतीयों की आयु अधिक होगी दुराषा मात्र है। सन् 1931 में भारतीयों की औसत आयु 27 वर्ष थी। उन्होने एक बार कहा भी था  कि ’’कपड़ा मिलें अपने पीछे बेकारी लाई और आटा तथा चावल की मिलें पोशक तत्वों की कमी से होने वाली बीमारियां।

गाँधी जी बेरोजगार तथा भूखे लोगों के लिए कार्य करना चाहते थे। उनके मन में यह विचार था कि प्रत्येक व्यक्ति को अपने शारीरिक श्रम से उपार्जित किया गया भोजन ग्रहण करना चाहिए। किसानों की घोर दरिद्रता गाँधी जी को एक क्षण भी चैन नहीं लेने देती थी। लेकिन देश में आज भी शायद ही राज्य या जिला हो जहाँ लोग भूख से सामना नहीं कर रहे यह कहीं पर आंशिक हो सकता तो कहीं पर इसका विस्तार काफी अधिक है। गाँवों और शहरों में व्यक्ति, परिवार और समुदाय भूख से आज भी लड़ रहे हैं, उनके लिए यह जीवन का एक हिस्सा बन चुका है। इनमें से अधिकांश लोग असंगठित क्षेत्र से आते है, जैसे भूमिहीन मजदूर और कारीगर, दलितों और आदिवासियों जैसे- सामाजिक रूप से दमित समूह, ऐसे घर जिनका मुखिया एक महिला होती है, बेसहारा लोग, विशेष रूप से मुश्किल परिस्थितियों में कार्यरत गली के बच्चे और कामगार बच्चे, अपाहिज और बुर्जुग लोग जिनकी देखभाल करने वाला कोई नहीं, अप्रवासी मज़दूर। ऐसी खामोश त्रासदी रोज़ कई घरों में और हमारे देश  की गलियों में घटित होती है, कि बड़ी संख्या में लोग भूखे पेट सोते हैं। अगर आज भी लोग भूखें पेट सोते है तो इसके लिए कौन जिम्मेवार है?

अगर हमने गाँधी जी के ग्राम स्वराज्य को अपनाया होता तो भारत की तस्वीर बदली हुई होती क्योंकि गाँधी जी कहते थे कि ’’मुफ्त भोजन से राष्ट्र का पतन होता है।’’ अर्थात सरकार द्वारा चलाये जाने वाले सरकारी कार्यक्रम केवल कुलीन वर्ग के लोगों के दिमाग की उपज है न कि जन-साधारण की जरूरतों के मुताबिक। 

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