सोमवार, जनवरी 27, 2020

Hunger Education and Marginalized People


भूख, शिक्षा और हाशिये के लोग
भूख को मिटाने के लिए भोजन की आवश्यकता होती है लेकिन भोजन तक पहुँच के रास्ते में ग़रीबी एक बड़ा अवरोध है, जिसे हम भारत के हर हिस्से में महसूस कर सकतेहैं। आर्थिक व सामाजिक अवरोधकों के द्वारा कुछ लोग हाशिये पर है। ऐसा नहीं है कि लोग हाशिये पर बना रहना चाहते हैं। राजनैतिक और स्वार्थीं तत्वों के चलते कुछ लोगों को बढ़ावा दिया जाता है और समाज का बड़ा तबका उन सभी जरूरी चीज़ों से लगभग वंचित हो जाता है, जिनके चलते वह ज़िन्दा भर रहने के लिए जीवनभर जद्दोजहद करता रहता है। समाज में ग़रीबी एक अभिषाप है जिसका शिकार समाज का एक बड़ा हिस्सा हो रहा है। व्यक्तिगत व परिवार के लिए खाने की व्यवस्था करने में ही उसकी कमाई का ज़्यादातर हिस्सा चला जाता है क्योंकि ज्यादातर मामलों में कम शिक्षित लोगों की जो आमदनी होती है उससे उनके लिए ज़िन्दा रहना भर ही मुस्किल होता है। व्यक्ति को जीवन जीने के लिए जो कम से कम आवश्यकता होती है वह है रोटी की। अतः भोजन को मौलिक अधिकार के रूप में देखना चाहिए। स्वामी विवेकानंद का कहना था कि ’’निरक्षरों को शिक्षा, भूखों को खाना तथा नंगों के लिए वस्त्र का प्रबंध करके ही भारत की उन्नति की जा सकती है।’’
भारत में लगभग 20 करोड़ लोग रोज़ भूखे सोते हैं और लगभग 5 करोड़ लोग भुखमरी के कगार पर हैं (गोयल, 2004)। यानि आसानी से कहा जा सकता है कि भारत की आबादी में से लगभग 25 करोड़ लोग भुखमरी में जी रहे हैं। भारत में ग़रीबी दूर करने की दिशा में काम कर रहे प्रोफेसर ज़्यां द्रेज़ कहते है कि भारत में मानव संसाधन के विकास और शिक्षा की ओर कभी ध्यान नहीं दिया जाता है जिसके चलते लोग अनपढ़ हैं, उनका स्वास्थ्य ख़राब है और बच्चे भूखे हैं। जो भूख और कुपोषण में जीते हैं, उनके पास शिक्षा व आर्थिक ताकत की कमी है, वे प्रायः अदृष्य रहते हैं, राजनैतिक रूप में महत्वहीन हैं और असंगठित हैं। ज़्यां द्रेज़ ने ठीक कहा है कि यह ’एक स्थायी मानवीय आपातकाल’ की स्थिति है जिसमें भारत में हर दो बच्चों में एक कुपोषित रहता है, तीन में से दो औरतों में खून की कमी है।

भोजन की उपलब्धता से तात्पर्य यह है कि प्रत्येक व्यक्ति का जीवन स्तर ऐसा हो कि जिसमें उसे जीने के लिए खाने की उपलब्धता पर इतनी भर चिन्ता हो कि वह कुछ घण्टे काम करके अपने लिए खाने का प्रबंध कर सकें यह तब ही मुमकिन है कि जब समाज में अशिक्षा, गरीबी, भुखमरी और अकाल की स्थिति न हो। किसान नेता स्वर्गीय चरण सिंह ने अपनी किताब ’’भारत की भयावह आर्थिक स्थिति: कारण और निदान’’ में लिखा है कि अमरीका और आस्ट्रेलिया में किसी भी भोजनालय में दो डालर में स्वच्छ और बगैर मिलावट का शुद्ध भोजन मिल सकता है जो आस्ट्रेलिया और अमरीका के मजदूर की एक घंटे की मजदूरी है जबकि भारत के निर्माण कार्य में लगी हुई अशिक्षित महिला मजदूर को दिन भर काम करने पर पेट भर भोजन ही किसी ढाबे में मिल सकेगा। ’’भोजन व्यक्ति के लिए है न कि व्यक्ति का जीवन भोजन के लिए’’- गाँधी जी ने जब यह विचार दिया था तब उन्होंने सोचा होगा कि व्यक्ति को जिन्दा रहने के लिए भोजन चाहिए न कि जीवन भर भोजन इकट्ठा करने में व्यक्ति का जीवन ही लग जाय।

स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद शुरू के वर्षों में खाद्य-असुरक्षा का भारी खतरा जो हमारे देश की करोड़ों की आबादी पर मंडरा रहा था वह अकाल और भारी भुखमरी का था जो कम कृषि उत्पादकता का नतीजा था, जिसका कारण कृषि उत्पादकता का अस्थिर मानसून पर निर्भर होना और भूमि और खाद्य का अत्यधिक असमान वितरण था। लैरी कॉलिन्स और डॉमनीक्यू लेपैरे (1975) ने लिखा है ’’जब भारत अपनी स्वतंत्रता प्राप्त करने वाला ही था, उस क्षण कलकत्ता में 30 लाख लोग कम भोजन के कारण अल्प पोषाहार की दशा में रह रहे हैं, यथा- उन लोगों का कैलोरी ग्रहण हिटलर के मृत्यु शिविरों में रह रहे लोगों को दी जाने वाली कैलोरियों से भी कम था। हम लोगों को पर्याप्त मात्रा में सन्तुलित आहार का सेवन करना चाहिये, मांस-मछली, दूध-घी, शाक-सब्जी, फल-फूल अधिक से अधिक मात्रा में सेवन करना चाहिए। परन्तु यह कहने से पूर्व क्या हम इस बात को भी सोचते हैं कि हममें से कितने ऐसे लोग है जो इन पदार्थों का उपयोग करने में समर्थ है। वर्ष 1891 से 1901 के दौरान लाखों इंसान भुखमरी और महामारी के कारण काल के ग्रास बन गए। इसके पश्चात 1911-21 तक के समय में पुनः संक्रामक रोगों का दौर-दौरा हो गया, लाखों मनुष्य काल के गाल में चले गये। विश्व की कुल लगभग चार अरब जनसंख्या में से 35 करोड़ लोग ऐसे है जो बिलकुल ही निराश्रित है और जिनके रहने के लिए मकान तक नहीं है, शिक्षा नहीं है, काम नहीं है,  सड़कों की पटरियों और पुलों पर रहते है और जिन्हें अपना पेट कूड़ेंदानों और कूड़े के ढेरों से खाद्यान्न बीनकर भरना पड़ता है और अधिकांश इस प्रकार के निराश्रित व्यक्ति भारतीय उपमहाद्वीप में ही रहते है। यह वह समय था जब जनता के विषाल हिस्से की जीने के लिए न्यूनतम आवश्यकता भोजन तक की पहुँच न होने के कारण दुःखद सामूहिक मौत हो जाया करती थीं।
शहरी भारत की भोजन असुरक्षा एटलस के अनुसार ’शहरों में लोगों द्वारा ली जा रही औसत कैलोरी ग्रामीण इलाकों की तुलना में कम है। शहरी और ग्रामीण भारत, दोनों ही जगह पिछले तीन दशकों में कैलोरीज़ की खपत थोडी़ कम हुई है।’ जनसंख्या के अन्य हिस्सों की तुलना में दलितों और आदिवासियों में पोषण-स्तर कमतर है। हमारे देश के निवासी जिस प्रकार का भोजन करते हैं वह आवश्यक पौष्टिक तत्वों से वंचित रहता है, उसमें जीवन-रक्षक प्रदार्थों का अभाव रहता है। पौष्टिक भोजन तो दूर रहा यहाँ पर कितने ही ऐसे व्यक्ति हैं जिन्हें भर पेट भोजन भी नहीं मिल पाता। ऐसी दशा में यह आशा करना कि भारतीयों की आयु अधिक होगी, कल्पना मात्र है। सन् 1931 में भारतीयों की औसत जीवन प्रत्याशा 27 वर्ष थी। जो कि वर्ष 2019 में 68.7 वर्ष तक तो हो गई है लेकिन यह अब भी कई एशिया के देशों से कम है।
निर्धनता ही भारत में सभी बुराइयों की जड़ है। दरिद्रता ही जनशिक्षा के मार्ग में सबसे बड़ी बाधा है। सामाजिक रूप से कमजोर समुदायों के लोग भोजन न मिलने के कारण अधिक कष्ट भोगते हैं। बच्चों और महिलाओं में निम्न पोषण स्तर, अधिक कुपोषण और खून की कमी की अधिक शिकायतों की वज़ह से अनुसूचित जाति के बच्चों में मृत्यु दर अधिक पायी जाती है जो कि स्वास्थ्य के स्तर के महत्वपूर्ण सूचकों में से एक है।
भुखमरी के सन्दर्भ में तो सामाजिक सुरक्षातन्त्र का महत्त्व और भी अधिक हो जाता है। अमीर विकसित देशों में अकाल नहीं पड़ते। इसका कारण वहाँ के सभी लोगों का अमीर होना नहीं है। यह ठीक है कि जब लोग शिक्षित होते है और उनके पास रोजगार होता है, उन्हें अच्छी-खासी आमदनी मिलती है पर बहुत-से लोग बहुत लम्बे समय तक इस अवस्था का लाभ नहीं उठा पाते। यदि सामाजिक सुरक्षा तन्त्र नहीं होता तो उस दशा में उनकी सारी सम्पत्ति पर आधारित विनिमय अधिकारिताएँ उनके निर्वाह के लिए शायद  ही पर्याप्त हो पातीं। (अमर्त्य सेन, 2002, ग़रीबी और अकाल)
कितनी अजीब बात है कि सरकारी एजेंसियां और अंतर्राष्ट्रीय एजेंसियां भी भूख के साथ जी रहे या मर रहे लोगों की संख्या का रिकार्ड नहीं रखतीं। यहाँ तक कि सरकारी शोध एजेंसियों के काम में भी इसी तरह का स्पष्ट इंकार होता है। जार्ज केंट (2002) कहते है कि ’’राष्ट्रिय पोशण संस्थान सूक्ष्म पोषक तत्वों पर छोटे तकनीकी सवालों में उलझा हुआ है और ऐसे प्रश्नों पर प्रायोगिक अध्ययन करता है जो विकसित देशों में पर्याप्त रूप से हल किए जा सकते हैं जबकि देशभर में गहरी और व्यापक भूख की व्यावहारिक तौर पर उपेक्षा करता है। पोषक तत्वों पर तकनीकी शोध समस्या का सामना करने से बचता है जो कि तकनीकी होने के बजाय गंभीर रूप से राजनीतिक समस्या है। अगर सरकार और इसकी एजेंसियां भूख की समस्या को देखने से इंकार करती हैं तो इसे हल करने की उम्मीद नहीं है।
उड़ीसा में भूख से हुई कथित मौतों की जांच में राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग में डॉ0 अमृता रंगास्वामी के हस्तक्षेप से कुछ महत्वपूर्ण और मानवीय सिद्धांतों को स्थापित किया गया है। इनमें से पहला है कि मौत अनिवार्यतः भुखमरी का प्रमाण नहीं है। ’भूख से हुई मौतों की रोकथाम की प्रक्रिया में पोस्टमार्टम की जाँच-पड़ताल से कोई खास फायदा नहीं होता और न ही इससे भोजन के अधिकार की सुरक्षा में मदद मिलती है। वास्तव में, इससे उन परिवारों और समुदायों को भावनात्मक रूप से ठेस पहुँचती है जिन्होंने अपने सदस्यों को भुखमरी कारण खोया है। उन नागरिकों को, विशेषकर जिनके पास खाने को कुछ नहीं है, सम्मान से जीने का अधिकार है! इससे आगे उनका कहना है कि भोजन की कम उपलब्धता कोई अलग घटना नहीं है, इससे घरों में, समुदायों को या कुछ सामाजिक श्रेणियों को लगातार पर्याप्त पोषण न मिलना जाहिर होता है। ऐसे लोग प्रायः बहुत गरीब, अशिक्षित और साधनों से वंचित या दरिद्र होते है।’’ नागरिकों के मूल अधिकार मानव स्वतंत्रता के मापदण्ड और संरक्षक दोनों है। अमर्त्य सेन के अनुसार ’अकालों को रोकने में भारत सफल रहा है- 1947 में आज़ादी मिलने के बाद से भारत में कोई बड़ा अकाल नहीं पड़ा है। कृषि में शैक्षिक ज्ञान की कमी से बहुत खेती बर्बाद हो जाने की कई घटनाएं हुई हैं, प्रायः बड़े क्षेत्रों में ऐसे हालात हुए हैं और कभी तो राष्ट्रीय भोजन उपलब्धता में भी तेजी से गिरावट आई है परन्तु खतरनाक अकालों को रोक दिया गया है।’ उनका मानना है कि ’इनमें मौत का कारण बनने से पहले जन कार्रवाई से ऐसा संभव हुआ। हालांकि स्वतंत्रता के बाद की पूरी अवधि में ऐसा हुआ है, अकाल जैसे हालातों को पैदा होने से रोकने में अधिक कुशलता का परिचय मिलता है। उदाहरण के तौर पर, बिहार में 1967 में लगभग अकाल जैसी स्थिति में जो हुआ उसकी तुलना में 1973 में महाराष्ट्र में, 1979 में पश्चिम बंगाल में और 1987 में गुजरात में भयानक अकालों को बड़ी तेजी से रोका गया, जिससे मृत्यु दरों पर अपेक्षाकृत कम बुरा असर पड़ा।
भारत में भुखमरी फैलने का एक मुख्य कारण यहाँ की अशिक्षा, बेरोजगारी और निर्धनता है। यहाँ की निर्धनता की तुलना किसी भी अन्य देश से नहीं की जा सकती। जब भुखमरी का हमारे ऊपर प्रकोप होता है तो निर्धनता के कारण हम उसका अच्छी तरह से सामना नहीं कर पाते है, न तो हमारे पास पर्याप्त मात्रा में सुरक्षित अन्न ही होता है और न धन होता है, जिससे कि भुखमरी का अच्छी तरह सामना किया जा सके। इस प्रकार हमारी यह भुखमरी अन्न की भुखमरी न होकर धन की भुखमरी भी होती है। अकाल में भुखमरी स्वाभाविक होती है, पर प्रत्येक भुखमरी जैसी अवस्था में अकाल नहीं होता। भुखमरी, गरीबी की ओर भी इंगित करती है किन्तु सदैव ही ग़रीबी का अर्थ भुखमरी भी नहीं होता। हम गरीबी के सामान्य धरातल से आगे बढ़ कर अकाल की बात करते हैं।
सन् 1876-78 में दक्षिण भारत में भीषण अकाल पड़ा और इसके निवारण के लिए सर रिचार्ड स्टैचे की अध्यक्षता में एक अकाल कमीशन नियुक्त किया गया। इस कमीशन ने अकाल-निवारण के लिए कुछ सिद्धान्त निश्चित किए वे सिद्धान्त निम्नलिखित है :-
·        काम करने योग्य शिक्षित व अशिक्षित व्यक्तियों को अच्छे परिश्रमिक पर कार्य दिया जाए,
·        जो लोग काम करने के योग्य नहीं उन्हें उनके गाँव में कुछ आर्थिक सहायता दी जाए,
·        खाद्यान्न वितरण की अच्छी व्यवस्था की जाए,
·        फसलों के नष्ट-भ्रष्ट या न होने की दशा में उन लोगों से जो भू-स्वामी है, माल-गुजारी न ली जाए या ली जाए तो उचित रूप से ली जाए।

जो अकाल निवारण के लिए कमीशन ने सन् 1878 में जो बातें कही थी वैसे सिद्धान्तों को लेकर आज भी बार-बार योजना/नीति आयोग और सरकारों को लिखा जाता है लेकिन इसका केन्द्रीय सरकार पर कोई असर नहीं दिखाई देता है। देश में खाद्य सामग्री की आपूर्ति से ही सारा ध्यान अकेन्द्रित रहता है। भुखमरी की बात में व्यक्तियों और वस्तुओं के सम्बन्ध महत्वपूर्ण बन जाते हैं। यह बात तो स्पष्ट होती है कि भुखमरी की बात व्यक्तियों के खाद्य पदार्थों पर स्वामित्व की ही बात है। अतः भुखमरी के स्वरूप को सही रूप से समझने के लिए हमें समाज में स्वामित्व की संरचना को ठीक-ठीक समझना होगा। खाद्य आपूर्ति पर मालीकाना हक एक प्रकार का अधिकार है, जो हकदारी का दावा करता है लेकिन यह दावा भुखमरी के दौर में पूँजीपतियों का लाभ के लिए उपयोग किया गया एक बाजारीय प्रापेंगेन्डा है, न की कोई मौलिक अधिकार। स्वामी विवेकानंद ने जनता के श्रम पर बने अमीरों की भर्त्सना करते हुए कहा है कि ’’जब तक करोड़ों लोग भूखें और अज्ञानी बने रहते हैं, मैं उन शिक्षित व्यक्तियों को, जो उनके मूल्य पर पढ़े हैं, किन्तु उन्हें शिक्षित करने का प्रयास नहीं करते, देशद्रोही मानता हूँ।’’
आंतोनिन आर्तो ने कहा है कि ’’मुझे लगता है कि उस संस्कृति का पक्ष लेना जो कभी किसी व्यक्ति को भूख से बचा कर नहीं रख पायी उतना महत्वपूर्ण नहीं है जितना संस्कृति नाम की चीज़ से उन विचारों को खींच निकालना जिनकी शक्ति भूख की बेबस कर देने वाली शाक्ति से मिलती-जुलती है।’’ फिर भी भूख के विरूद्ध जंग अभी भी किसी भी तरह से जीती नहीं गयी है। जनता के दबाव और राज्य की कार्रवाई अकालों को न होने की अपेक्षा भूख पर काबू पाने या पर्याप्त पोषण जोकि न केवल जिंदा रहने के लिए बल्कि एक स्वास्थ्य और सक्रिय जीवन के लिए आवश्यक है, उससे वंचना से निपटने में कम सफल रहे हैं।
अतः देश की जनता को अशिक्षा, बेरोजगारी,  गरीबी और दरिद्रता से निकालने के लिए संघर्ष करना होगा।

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