बुधवार, जनवरी 22, 2020

कागज़ की तलाश : An Unwanted Endeavour

Kagaz Ki Talash : An Unwanted Endeavour

गुरमिन्दर सिंह का दूसरा कविता संग्रह “कागज़ की तलाश” आपके हाथों में है। इस संग्रह की कविताओं में अपने वजूद के होने के मकसद पर सवाल करती, हालात से जूझती, कभी व्यवस्था के अंतर्विरोधों को व्यक्त करती तो कभी राजनीति पर व्यंग्य करती, बिछड़े रिश्तों की याद संजोती, सबसे महत्वपूर्ण हाशिये के समाज के सवाल उठाती और यथार्थ की कड़वाहट में भी सपनों को बचाये रखने की अभिव्यक्ति समेत ज़िन्दगी के कई रंग शामिल हैं।    

संग्रह की शुरूआती कविता “लिखना” में कवि जिन के दुःख दर्द की बात अपनी कविता में लिख रहा है वे शायद इनको कभी ना पढ़ पायेंगे, क्योंकि जिन्हें पेट भर रोटी नहीं मिल रही वे किस तरह उसकी कविताओं की किताब ख़रीद पायेंगे। दूसरी बात यह उथल-पुथल भी उसके दिमाग़ में है कि वह कोई तथाकथित बड़ा आदमी तो है नहीं, फिर कोई उसकी किताब को क्यों पढ़ना चाहेगा। कवि लिखता है –
जिन दर्दों को लिखता हूँ “मैं”
उन दर्दों को सहने वाले
नहीं ख़रीद पाते अख़बार और पत्रिका...

आज़ादी के इतने बरस बाद भी सभी के लिए समानता, स्वतंत्रता, बंधुत्वकी बात करने वाले संविधान के बाद भी समाज में इतनी वंचना,गैर-बराबरी और विषमतायें क्यों है, यह सवाल उन्हें बार-बार परेशान करता है। कवि के लिए ज़िन्दगी की बुनियादी सुविधाओं से भी वंचित इस समाज के दर्द की अभिव्यक्ति ही काफ़ी नहीं है, आगे वह राजनीति और व्यवस्था पर सवाल भी उठाते हैं –
क्या कभी किसी ने आकर देखा है
संविधान और बारह सौ क़ानूनों के बाद भी
चालीस करोड़ लोग भुखमरी के द्वार पर...

1990 के बाद आर्थिक उदारीकरण की नीतियों ने अमीर और गरीब के बीच की खाई बढ़ा दी, पलायन बढ़ा और लोग शहरों के किनारे आसरा ढूँढ़ने लगे। ये जो बस्तियाँ बसी, ना यहाँ बुनियादी सुविधायें थी और ना ही कोई सुनिश्चित रोज़गार। यह हमारे देश की नहीं दुनिया के हर देश की कहानी है। रोटी और रोज़गार की तलाश में लगे ऐसे ही लोगों की एक “बस्ती” में समस्याओं की भयंकरता की एक झलक है, “जीव” कविता में -  
एक बूँद पानी के लिए
रात यहाँ गोली चली है
आज फिर वादा हुआ
उस की जाँच के लिए
फैसला अगली वर्षा में होगा...

इस पूंजीवादी व्यवस्था ने इंसान को एक ऐसी मशीन में बदला है जो दूसरों के लिए मुनाफ़ा कमाते-कमाते ख़ुद ज़िंदा रहने के लिए दो रोटी की खोज में ख़ुद को खटा रहा है। यह व्यवस्था कविता, साहित्य, सौन्दर्य, खेल जैसे सांस्कृतिक विकास की बातें तो इनके लिए कल्पना में भी नहीं आने देती। इतना ही नहीं रोटी की तलाश इंसान के अन्दर की इंसानियत, प्रेम और भाईचारे को भी रौंद देती है। पेट का सवाल, यानि ज़िंदा रहना ही ज़िंदगी की सबसे बड़ी चुनौती है। विडम्बना यह है कि सब कुछ खोकर भी भरपेट रोटी नहीं मयस्सर होती। इस चुनौती को बहुत स्पष्टता के साथ कविता “भूख” में व्यक्त किया है-
चमगादड़ की तरह
उलटा लटका हुआ है
आज का इंसान
मात्र रोटी के टुकड़े के लिए
दर-दर की ठोकरें  
झेलता है
..................
आदर्शों को भूलकर
अस्तित्व को खोकर
इंसान पेट के बल लेट रहा है
शायद दब जाए भूख
इस तरह औंधे
पसरने से, लेटने से
भूख इंसान को खा जाती है...

ग्लोबल विलेज की अवधारणा लेकर नव उदारवादी नीतियाँ आयीं, लेकिन दुनिया गाँव तो ना बन सकी पर ग्लोबल बाज़ार ज़रूर बना गया है। ऑनलाइन बिक्री ने रात-दिन घर के अन्दर और बाहर इंसान को बाज़ार में खड़ा कर दिया है। अपने गाँव को छोड़कर महानगर में कंक्रीट के जंगलों के बीच इंसान किस हाल में जी रहा है, विस्थापितों को “समर्पित” इस कविता में देखिये-
गाँव की शालीनता और एश्वर्य को
जेब में रखकर चले आये हैं
और यहाँ हो गए हैं अजनबी
मकान मालिकों की दहशत है
कहीं मकान खाली ना करा ले
महानगर में एक कमरा पाना  
मंगल गृह की यात्रा से कम नहीं है...

बेहतर ज़िंदगी के सपने लिए लाखों लोग इस महानगर की रेलमपेल में गुम हो जाते हैं। इंडिया की छाया में भारत बढ़ता जाता है, जो पूंजीपतियों के लिए मात्र बाज़ार के उपभोक्ता हैं, मुनाफ़ा कमाने का चमत्कारिक बड़ा बाज़ार जहाँ हैं मरीज़ जो उनके प्राइवेट अस्पतालों के उपभोक्ता हैं, बच्चे स्कूलों के,  बहुत सारे कपड़ों, जूतों, किताबों, बस्तों, ...आदि ...आदि को बेचकर बहुत सारा मुनाफ़ा कमाया जा सकता है। लेबर अड्डों पर गाँव के युवक-युवती का अपनी मेहनत बेचने का बड़ा बाज़ार है। राजनीतिज्ञों के लिए ये वोट बैंक, पूंजीपतियों को यहाँ दिखाई देते इस विषय पर बहुत कवियों ने लिखा है, पर गुरमिन्दर सिंह का अपना अंदाज़ है, कविता “बाज़ार में सपने” में देखिये-
सब कुछ बिकता है
बिकाऊ है ज़िन्दगी
अर्थी के बांस से लेकर
पूजा की रोली तक।
या फिर
मैं बाज़ार की वस्तु
फ़िल्म का किरदार 
सरकार की योजना हूँ (कविता)

इस पूंजीवादी समाज की एक और बड़ी विडम्बना है व्यक्तित्व का दोहरापन, दिखावा, कृत्रिमता, तड़क-भड़क, चमक, जिन मुखौटों के पीछे छिपे असल व्यक्ति को पहचानना मुश्किल ही नहीं असंभव हो जाता है। कविता “वृक्षों की छाया’’ में लिखते हैं-
वह लिबास में संस्कृति तलाशता है
विचार में झांकने की कोशिश नहीं करता...

कविताओं में विषयों का विस्तार है, प्रख्यात जन वैज्ञानिक विनोद रैना और साहित्यकार धर्मवीर भारती की याद में भी कविता हैं, और अपने गाँव एवं अपने पिता की याद में भी, स्त्रियों पर भी कविता है और उन के बारे में पित्रसत्तात्मक समाज के नज़रिए की भी, भारत से इंडिया के बीच बढ़ती दूरियों की भी,व्यक्तियों में अलगावकी भावना (alienation) की भी, सरकार, राजनीति और जन सरोकार भी बीच-बीच में अपनी उपस्थिति दर्ज़ कराते रहते हैं। प्रकृति की मौजूदगी और उपमा अलंकार कई जगह कविता की गहराई को बढ़ा देते हैं।

कवि की कविताओं में पूंजीवादी और साम्राज्यवादी दुनिया की त्रासदियाँ ही नहीं विश्व शांति की कामना भी है। एक आदर्शवादी दुनिया की कल्पना उनकी काव्य दृष्टि को पैनापन देती है। आज रक्षा का बजट हमारे बच्चों के शिक्षा, स्वास्थ्य, और पोषण के बजट से भी ज़्यादा है। दुनिया के संसाधनों पर क़ब्ज़ा करने की लिप्सा, ने हथियारों की होड़ को जन्म दिया, हथियारों की इस होड़ ने विश्व शांति, और सौहार्द को निगल लिया, इंसान को इंसान का दुश्मन बना दिया. इसी लिए कवि कहता है-
ख़ून ही ख़ून का दुश्मन
रंग रंग में भेद है
काश विश्व की बेड़ियाँ
सीमाएं मिटा दी जाएँ
सुरक्षा का बल ही
इंसान की असुरक्षा है।  

इन कविताओं में व्यक्ति के अंतर्मन,उसकी भावनाओं और संवेदनशीलता की भी अभिव्यक्ति है। कवि भी आख़िर इंसान ही तो है, ग़म, ख़ुशी, दर्द उसके हिस्से में भी आता है, प्रकृति और बदलते मौसम उसे भी प्रभावित करते हैं। तभी तो पतझड़ के बाद बसंत में नयी कोंपलें कवि को भी अपने पुराने किसी दर्द की याद दिला देती है-
मानसून के आने से
पनप जाती है मौसमी घास  
पतझड़ के आने से ही   
आती है बहार बसंत की
ज़ख्मों को कुरेदने से
आती है याद
ज़ख्मों के होने के दिनों की...

रोज़गार ने गाँव से विस्थापित किया लेकिन जहाँ व्यक्ति ने अपना बचपन गुजारा उसकी याद ज़िन्दगी भर नहीं जाती।  “बचपन के दिन” की ये पंक्तियाँ पलायन कर के आये हर शख्स के दिल मेंधड़कती रहती हैं –
उस टूटी–टटर झोपड़ी में
मेरे बचपन के सिक्के छिपे हैं
जो इतिहास की तरह
मेरा मेहमान दे गया था...

कुछ कविताओं में राजनीतिक स्थितियों पर हल्का व्यंग्य लगता है, पर मुझे ये व्यंग्य की बजाये हालात पर टिप्पणी अधिक लगती है। कविता “मसीहा” तो आज के हालात पर बहुत सटीक है-
तेरी दी राह पर चलने वाले
खेमों में बट रहे हैं
अपने-अपनों की ही गर्दन पर
कुर्सी और झंड़ा रख रहे हैं।

ये कविताएँ एक एक्टिविस्ट कवि की कवितायें हैं। कवि को प्रशासन की लाल फीता शाही के साथ–साथ गैर-सरकारी संगठनों में भी निकटता से काम करने का बड़ा व्यापक अनुभव है। इसीलिये सरकार, फाइलें, नोटिंग, प्लानिंग, रिपोर्ट, बजट, हिसाबआँकड़ेप्रजातंत्रभाषा, शिक्षा, राजनीति जैसे शब्द बार-बार उनकी कविता में आते हैं। इनसे जुड़ी हर कविता के पीछे ना जाने कितनी कहानियाँ होंगी।  कविता ‘भागफल’ एक उदहारण है जिसमे आज के प्रशासन और राजनीति पर टिप्पणी भी है और हल्का हास्य और व्यंग्य भी, पर सब से बड़ी बात ये है कि ये पंक्तियाँ आज की व्यवस्था में जन कल्याणकारी योजनायों का यथार्थ चित्रण हैं-
लोगों की मौत का हिसाब
बच्चों के कुपोषण का हिसाब
बच्चियों की शिक्षा का हिसाब
वृद्धों की पेंशन का हिसाब
ख़र्च से भाग देकर निकाला गया
जो भी भागफल है
उस पर राजनीति होगी
बाकी जो जनता बच गयी है
वो तो अवशेष है ...

या फिर योजना निर्माताओं और योजनाओं के लक्ष्य के  बीच की दूरी को प्रदर्शित करतीं कविता “सन्देश” की ये पंक्तियाँ-
ग़रीबी उन्मूलन का कार्यक्रम
पाँच सितारा होटलों में होता है
थैलियों के कुछ चट्टे-बट्टे ही
ले जाते हैं श्रेय
ग़रीब के हर पैसे का...

दुनिया में हमेशा ही कुछ साहित्यकार शासकों की प्रशंसा में लिखकर इनाम पाते रहे और कुछ जनता की आवाज़ उठाकर गुमनामी और अभाव में रहे। आज भी शासक दलों के पैरोकार कवि और साहित्यकार,पुरस्कार एवं सुविधाएं लेने की होड़ में हैं। इस होड़ में बहुत से कवि तो नेताओं की चाटुकारिता में इतना आगे बढ़ गए कि नेताओं के चरण वंदन में कविता कर रहे हैं। दूसरी तरफ जन सरोकारों से जुड़े बहुत से कवि इलाज़ के अभाव में दम तोड़ रहे है। इन हालातों में साहित्य अपनी सार्थकता खो बैठता है। कवि का दर्द है-
साहित्य समाज का दर्पण
पिछलग्गू नहीं राजनीति का
आज मुझे कवि कवि ना दिखे
सत्ता के अनुगामी हैं।

या फिर “वंचिता” की उपमा में इस कविता को देखिये “कविता आज” में –
कविता आज मिली फटे हाल में
शब्द पाए दिगम्बर स्थिति में
..................................
साहित्य अकादमी के द्वार पर
भीख माँगते देखा कविता को...

ये पंक्तियाँ भी देखे-        
आज मुझे कवि कवि ना दिखे
अनुगामी लगे राजनीति के। (कविता से खिलवाड़ )

ना मैं लेखक हूँ ना समीक्षक, बस गुरमिन्दर सिंह ने ये कवितायें पढ़ने को दी, जो कुछ मुझे महसूस हो वह लिखने का अनुरोध किया। यह बस मेरी प्रतिक्रिया है। यही मुझे इन कविताओं की ताक़त भी लगी कि ये सोचने के लिए मज़बूर करती है।   

कवि की इन कविताओं में एक तलाश है, अपने अस्तित्व की, अस्तित्व के अर्थ की, सपनों की। इनमें संघर्ष का आनंद भी है और एक खुशहाल समाज का सपना भी। एक बैचेनी भी है जो चाहते हैं वह ना कर पाने की, समाज के दुःख-दर्द की, पलायन की, विस्थापन की, दिल और दिमाग़ के साथ ना चल पाने की, समाज को जगाने की, संघर्ष की। इनको पढ़ते हुए आप को ख़ुद लगता है जैसे आप ख़ुद अकेले एक यात्रा पर निकले हैं और ख़ुद से संवाद करते जा रहे हैं।

यह बैचेनी और यह तलाश जारी रहे, ताकि ज़िन्दगी और समाज के आपसी द्वन्द से नयी-नयी रचनाएँ सामने आती रहें। 

शुभकामनाओं के साथ!

 डॉ वीणा गुप्ता

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