गुरुवार, जनवरी 23, 2020

पुस्तक समीक्षा : कविताओं में भी छोटी-छोटी कवितायें छिपी हैं।

गुरमिन्दर सिंह जी की किताब “काग़ज़ की तलाश” एक बार सरसरी निगाह से पढ़ी और फिर एक बार तसल्ली से पढ़ी।
कवि मन का साहित्य के प्रति प्रेम तो इन के शीर्षकों से ही झलकता है जब ये “काग़ज़ की तलाश”  या “किताब खुली रहने दो” जैसे शीर्षक रखते हैं। 
मुझे लगता है , “काग़ज़” का प्रयोग कवि ने  “उम्मीद” या  “आशा” के अर्थ में किया है ।
गुरमिन्दर जी को पढ़ते हुए उनकी छटपटाहट पाठक तक भी आती है और पाठक भी इन्हीं के साथ साथ न केवल गाँव, खेत में घूमता है बल्कि उन्ही के साथ-साथ शहरों में आकर सरकारी तंत्र से, भ्रष्टाचार से .. रूह खोती कोमलता से भी दो-चार होता है ।
 “चमगादड़ की तरह 
उलटा लटका हुआ है 
आज का इंसान .....  
कविता में इंसान की लाचारी दिखती है तो....
“मैं बाज़ार की वस्तु 
फ़िल्म का किरदार 
सरकार की योजना हूँ ...”
कविता में बाज़ारवादी व्यवस्था के साथ-साथ सरकारी घोषणाओं के मायाजाल को इंगित किया है।
कवि केवल लिखने के लिये ही नही लिखता जैसा आजकल हो रहा है बल्कि जिन के लिए लिख रहा है उनकी सारी अपेक्षाओं, उपेक्षाओं व उम्मीदों को महसूस भी करता है ...
“....बाक़ी जो जनता बच गयी 
वो तो अवशेष है”  
कविता में राजनीति कैसे जनता के साथ खिलवाड़ कर पोषित हो रही है का “अच्छा हिसाब" लगाया है ।
“कविता मिली आज फटेहाल में 
शब्द पाये दिगम्बर स्थिति में ........,

साहित्य अकादमी के द्वार पर 
भीख माँगते देखा कविता को”

आज के लेखन में फैली राजनीति का कितना सटीक चित्रण है ।
“ कितना भी क्रूर हो ज़माना 
स्नेह धीरे से जाता है पनप 
लाख कीचड़ उछाले कोई 
आख़िर फूल तो जाता है खिल ....

.....सच जाता है बिखर 
अपने पिटारे से ....
कि अपनी ही खूशबू से 
अपनी गन्ध उड़ी है ।”
विश्वास से भरी कविता है जिसमें कवि कहता है कि बंधनों से ...
आज़ादी की खूशबू को बाँधना नामुमकिन है .. 

ये खूशबू है जो गन्ध की तरह फैल जाएगी। 
 “समर्पित” कविता में महानगरों में रहने वाले लोगों का डर व मकान मालिकों की साम्राज्यवादी मानसिकता का ज़िक्र है तो “तट तक आओ” एक मधुर सी प्रेमपगी कविता है तो “समाज” एक क्रांतिकारी कविता है जिसमें कवि की हुंकार सुनाई देती है। “रंग बिखेरना” भी एक अलग से भाव की कविता है।

“मैं वो पत्र हूँ जिसमें,
भार के अनुपात में,
कटौती कर लगे हैं टिकट,
न भेजने वाले को ग़म,
पाने वाले का इंतज़ार बाक़ी,
डाक घर की अभी रक़म बाक़ी,
छूटने को छटपटा रहा हूँ .....
एक कविता है जिसमें पत्र के माध्यम से अपनी विवशता दर्शायी है ।

गुरमिन्दर जी की जो बात मुझे सबसे ज़्यादा अच्छी लगी वो ये कि कविताओं में भी छोटी छोटी कवितायें छिपी हैं।
“सुरक्षा का बल ही, 
इंसान की असुरक्षा है”

“इंसान की जड़ें सूख रहीं,
तना न जाने हरा कैसे”

“आज बाहर निकल कर देखा, 
मेरी ज़िंदगी का सफ़ा ख़ाली”

“वह लिबास में संस्कृति तलाशता है,
विचारों में झाँकने की कोशिश नही करता” 

जैसी दो-दो पंक्तियों की कवितायें हैं जो आप को रुक कर सोचने पर मजबूर करती है।
“काग़ज़ की तलाश” की कुछ अन्य कवितायें .. अर्ज़ी, लड़की, फ़ाइल, शब्दावली, अर्थी के पास, शिशिर के शिविर भी काफ़ी अच्छी कवितायें हैं। 

कवि का मन भावुक भी है, दुःखी भी, उसमें ग़ुस्सा तो है पर सकारात्मक ग़ुस्सा है।

सबसे बड़ी बात कि कवि आशावादी है ...
उसे विश्वास है कि सही आवाज़ चीज़ों को बदल सकती है....
“लगा एक ज़ोर से आवाज़,
दुनियाँ के शोर से,
बड़ी हो,
तेरी वो आवाज़।”
कवि को अनन्त शुभकामनायें  🌹 🌹
श्रीमति सरोज पुनिया 
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