शुक्रवार, फ़रवरी 28, 2020

विचारों की फ़कीरी कब तक चलेंगी


शाम-सुबह के खेल की पारी कब तक चलेंगी,
इस रफ़्तार में ज़िन्दगी हमारी कब तक चलेंगी।

शुरूआत से अब तक वफ़ादारी के क़िस्से चले,
सियासत में उठापटक की बारी कब तक चलेंगी।

ओहदे के  साथ-साथ लोगों ने इलाक़े बदल डाले,
कतारों में खड़े करने की अमीरी कब तक चलेंगी।

शिकायत और शिकवे अब करें तो किससे करें,
बाज़ार में क़ीमत पर होशियारी कब तक चलेंगी।

गुटबाज़ी और गोलबंदी में सारा वक़्त ज़ाया किया,
तेरी महफ़िल में विचारों की फ़कीरी कब तक चलेंगी।



शनिवार, फ़रवरी 22, 2020

कल फिर मंथन होगा


आज हमारी बस्ती में,
क्यूँ खलबली मची है,
एक बूँद पानी के लिए,
रात यहाँ गोली चली है,
कल फिर मंथन होगा,
उस के लिए रखी है बैठक,
हर किसी को अपना अस्तित्व,
अपनी हिस्सेदारी को तलाशना है,
वह बोलना ज़रूर चाहता है,
अनुभव से लेकर अनुमान तक,
लेकिन वह किस का अनुसरण करेगा,
बस यही एक सवाल है,
मेरी संगठन में ज़िम्मेदारी है,
उसकी जनता में पहुँच है,
कुछ काम तो बहुत करना चाहते हैं,
नये अंकुर को कौन सींचना चाहता है,
मैं’ केवल देखना चाहता हूँ,
लोग कर क्या रहे हैं,
हर बैठक का ’मैं’ भी हिस्सा हूँ,
भागीदार हूँ इस भागीदारी में,
प्रजातंत्र के अर्थ को खोजता हूँ,
हर सभा और सेमिनार में,
क्योंकि काफ़ी लम्बी चर्चा रखी गयी है,
पिछले दो सत्रों से कुछ मिला नहीं,
जो मिला वह प्रजातांत्रिक मुझे तो नहीं लगा,
यहाँ प्रजा भी है तंत्र भी है,
सवाल भी है जवाब भी है,
लेकिन मान्यता किसकी होगी,
कल इसी के लिए ही तो चर्चा रखी है।


Backstage: The Story Behind India’s High Growth Years by Montek Singh Ahluwalia

भारत के उच्च विकास के पीछे वर्षों की कहानी है 



भारत की कहानी को कैसे आकार दिया गया और इस स्क्रिप्ट को लिखने में मोंटेक सिंह अहलूवालिया ने भारत के परिवर्तन से एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है । बाजार आधारित अर्थव्यवस्था के लिए राज्य-संचालित, तीन दशकों की अभूतपूर्व अवधि के लिए भारत की आर्थिक नीति की स्थापना के शीर्ष पर लगातार स्थिरता बनी रही। 


भारत के हालिया इतिहास की राजनीति, व्यक्तित्व, घटनाओं और संकटों का पता लगाती है यह पुस्तक।  सुधार की राजनीति को जीवित करने के लिए नंबरों के पीछे चला जाता है, और कैसे नीतिगत बदलाव को पहले, धीरे-धीरे, प्रधान मंत्री राजीव गांधी के तहत, और फिर 1991 में और अधिक साहसपूर्वक धकेल दिया गया, जब अवसर भुगतान के गंभीर संतुलन द्वारा प्रदान किया गया व्यापक सुधार के लिए जब्त कर लिया गया। अहलूवालिया, जिन्होंने इस महत्वपूर्ण अवधि के दौरान वाणिज्य सचिव और वित्त सचिव के रूप में कार्य किया, उस समय के आरोपों के विपरीत एक ठोस मामला बनाता है, जो सुधार 1991 में अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ) के कार्यक्रम की स्थिति का हिस्सा बना। 

आईएमएफ द्वारा एक अनिच्छुक भारत पर घर-विकसित और जोर नहीं दिया गया था। अहलूवालिया एक शासन की सफलताओं और विफलताओं की चर्चा करते हैं कि किस अवधि के दौरान उन्होंने योजना आयोग के उपाध्यक्ष के रूप में कार्य किया, एक कैबिनेट-स्तर की स्थिति। वह भारत के शानदार आर्थिक विकास के पीछे की कहानी को अपा के कार्यकाल के पहले भाग के साथ-साथ गरीबी उन्मूलन में अपनी ऐतिहासिक उपलब्धियों के साथ प्रस्तुत करता है। उन्होंने नीतिगत पक्षाघात और भ्रष्टाचार के आरोपों पर भी खुलकर चर्चा की, जो कि पिछले 2 वर्षों में चिह्नित किए गए थे। बुद्धि, हास्य और उल्लेखनीय बुद्धि के साथ नरेट, बैकस्टेज एक विशिष्ट पद के लिए भारत के आर्थिक और राजनीतिक इतिहास में एक निश्चित योगदान है। मोंटेक सिंह अहलूवालिया के जीवन के शानदार प्रक्षेपवक्र का पता लगाती एक शानदार और दमदार पुस्तक है । 

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अख़वार और पत्रिका


क्या लिख छोड़ू इन पन्नों पर,
कौन पढ़ेगा क्यूँ पढ़ेगा,
इन पन्नों को,
कोई युग पुरुष तो हूँ नहीं,
न जन्मा हूँ,
कुलीनों की बस्ती में,
फिर क्योंकर कोई आकर्षित होगा,
कुछ विचारों से आच्छादित,
ये शब्दों की माला,
जिन दर्दों को लिखता हूँ ’मैं,
उन दर्दों को सहने वाले,
नहीं ख़रीद पाते अख़वार और पत्रिका,
सारा वक़्त भुँजा और दाल-भात के लिए,
दिन भर भागता हूँ ’मैं’,
जॉब कार्ड के लिए,
जब से कार्ड मिला है,
लगता हूँ सरकारी आदमी,
वो बात अलग है,
पेट भुँजे को भी तरस गया है,
धन्य हो,
इन क़ानूनों के बनाने वालों,
तुम अपना पेट भरते गये,
विचार लिखते गये,
क्या कभी किसी ने आकर देखा है,
संविधान और बारह सौ क़ानूनों बाद भी,
चालीस करोड़ लोग भूखमरी के द्वार पर।

शुक्रवार, फ़रवरी 21, 2020

दीवार


क़लम से तूने,
चट्टान को कुरेदना चाहा,
क्या यादें ही काफ़ी नहीं हैं,
जख़्मों को कुरेदने के लिए,
काग़ज़ की नाव को तूने,
दरिया के पार ले जाना चाहा,
क्या एक रात काफ़ी नहीं है,
सपने देखने के लिए,
मन की उड़ान से,
इस जहाँ से पार जाना चाहा,
क्या कल्पनाऐं ही काफ़ी नहीं हैं,
मन को बहलाने के लिए,
समाज की इस दीवार से,
एक पत्थर निकालना चाहा,
क्या इस दीवार को,
देखना ही काफ़ी नहीं,
जीने के लिए,
इस दुनिया में तूने,
जीने का सहारा चाहा,
क्या मन में कोई जगह बाक़ी है,
ज़ख़्म बनाने के लिए,
पत्थरों कंकड़ों को बटोर कर,
एक आशियाना बनाना चाहा,
क्या क़लम काफ़ी नहीं है,
अपने दर्दों को लिखने के लिए।

टूरिस्ट गाइड


वृक्षों की छाया,
पत्तों पर बून्दें,
पत्थर के टुकड़े,
जीवन के रास्ते,
सब कुछ यहीं हैं,
बस यहीं लेकिन,
घाटी का मानव,
अजनबी लगता है,
अपने गाँव में,
पश्चिम की सभ्यता और लिबास,
आज छा गया है,
गाँव के पटल पर,
घोड़े हांकते दूध ढोते,
शहरी बाबूओं को रास्ता दिखाते,
ख़ुद भी खो जाते हैं,
भौतिकवादी विचारों में,
इस तरह ललक उठती है मन में,
शायद् ’मैं’ भी शहरी हो जाऊं,
वह लिबास में संस्कृति तलाशता है,
विचार में झाँकने की कोशिश नहीं करता,
शायद!
उसकी सोच को ग्रहण लग गया है,
चलचित्र का पर्दा नज़र आता है,
पीछे क्या कुछ छिपा है,
कोई नहीं जानता,
पर्वत मालाओं के पार भी,
समतल दरिया और पर्वत हैं,
लेकिन जो मुझे नज़र आते हैं,
वह हरियाली से हरे नहीं हैं,
वो भी संस्कृति के लिए,
बस टिके हैं कुछ दिन ओर।

सोमवार, फ़रवरी 17, 2020

नीम

तुम पढ़े तो नहीं नीम,
फिर ये गुण कहाँ पाये,
कौन सा विश्वविद्यालय है,
जहाँ से तूने,
गट्ठर बाँधा औषधियों का,
मगर तूने ये कड़वाहट,
क्यों है पायी,
सीमित रखता तू अपने को,
अच्छा तरहा पल रहा था,
नदी के तट के किनारे,
हाँ! तू अभी इतना तो नहीं,
जाना होगा कि,
तेरी रगों में कौन सा ख़ून है,
हाँ! ख़ून, ख़ून है,
तू सिमट कर,
रह क्यों नहीं जाता,
अपनी ही परिधि में,
तुझे न क्यों पतझड़ आया,
न बहार की मंज़िल तू हो सका,
हाँ ! तू बस अपने में ही,
क्रोधित है क्रोध से।

रविवार, फ़रवरी 16, 2020

किताब खुली रहने दो

समानता इन्सान के लिये ईश्वर का दिया एक नायाब तोहफा है, जन्म के समय हम सब बराबरी लिये पैदा होते है लेकिन जैसे ही हम समाज की गोद में आते है, हमें जाति, धर्म, समुदाय, कबीला, कुटंम्ब, आदि न जाने क्या-क्या नाम मिल जाते हैं जिनको हम जीवन भर अपने से अलग नहीं कर पाते हैं।  
 ’मानस की जात सबै ऐकै पहचानबो’ की बुलन्दी क्यूँ नहीं हो सकती, हो तो सकती है लेकिन अदालतों और इबादतगाहों में जो फ़ैसले होते है वो कभी-कभी अमानवीय लगते हैं, लगें भी क्यूँ ना हम एक बीमारी से ग्रस्त हैं कि ’समाज क्या कहेगा’ इसी से बचने के लिये दिन-रात हम झूठ-सच का सहारा लेकर एक दूसरे से आगे निकलने में लगे रहते हैं। यहीं से शुरूआत होती है ज़िन्दगी के पहले द्वन्द्व की, जो जीवनभर इन्सान का पीछा नहीं छोड़ता है।
भारतीय संविधान इन्सान को बराबरी का हक़ देता है फिर भी अधिकारों को इन्सान तक पहुँचने से कौन रोकता है। यह ऐसा सवाल है जो हमेशा इन्सान की समझ से बाहर ही रहा और समाज में हो रहे भेदभाव और अन्याय से वह रोज़ रूबरू होता है, लेकिन न जाने वह चुप क्यूँ है? यह चुप्पी समाज को नियंत्रित रहती है, वह जानता तो है कि उसे आँखें खुली रखनी होगी अन्यथा लोग उस पर उंगली उठायेंगे परन्तु सत्ता मज़दूरों को कभी एक साथ चलने ही नहीं देना चाहती है।
 ऐसा नहीं की दुनिया में घट रही घटनाऐं हम तक नहीं पहुँचती, ख़बरें आती है इन्सानों के मरने की परन्तु हमारा यकीन न जाने कहाँ खो जाता है, हम ख़्यालों से बाहर आना भी चाहें तो राजनीति हमें ’हम’ होने ही नहीं देती, हर बार एक नया शगूफ़ा आता है इन्सान उसमें उलझकर रह जाता है। इन लोगों को लगता है कि शहर में गंदगी बढ़ गयी है इन जाहिलों के आने से नहीं तो मेरे शहर का हर शख़्स तो जन्नत से आता है भला ये भी कोई बात हुई, मेरी समझ ’मैं’ क्यूँ नहीं आती है।
गाँव-शहर की जद्दोजहद से जो उपजा उसमें इन्सान उलझकर रह गया है, उसकी समझ में नहीं आ रहा है कि वो क्या करे और क्या ना करे, किसकी माने और किसे वह मना करे उसकी समझ में कुछ भी नहीं आ रहा है। इन्सान की समझ में नहीं आ रहा वह पुराने और नये के मध्य तारतम्य कैसे बैठाये, कहाँ जाये उसे तो हर तरफ़़ मायूसी ही नज़र आती है, उम्मीद क़ायम है तभी तो ज़िन्दगी भर भाग दौड़ में लगा रहता है।
मौसम और सियासत रोज़ रंग बदलते हैं इन्सान कौन से मौसम में ख़ुश रहे और किसे अपने जीवन का हिस्सा माने, तय करना मुश्किल है, अब उसके बस की बात नज़र नहीं आती है। ग़म के भरें पलों को भूला के हम जी भी ले, परन्तु न जाने क्यों जीवन का तार टूटने सा लगा है उसे सम्भालने में ही पूरा का पूरा जीवन लग जाता है।
ग़रीब को जम्हूरियत से उम्मीद अच्छी रहती है लेकिन इस जम्हूरियत का खेल भी बड़ा उमदा है जिसमें लाखों लोग लगते हैं किसी एक की ताज़पोशी करने में। वह जानता भी नहीं जिसकी ताज़पोशी होगी क्या उसके विचार में कहीं इन्सान है भी की नहीं, वो मेरे देश की जनता के लिये कुछ करना भी चाहता है या केवल जम्हूरियत के नाम पर जो मरे सो मरे, यहाँ तो आला हुकमरान बुलेटप्रूफ चाहते हैं।  
आज देश के हालात इस तरहा के हो रहे हैं कि लोग आपस में भी किसी पर एतवार नहीं कर पा रहे हैं जो कि सामाजिक के ताने-बाने के लिये एक आपातकालीन स्थिति हैं।  देश के लोग डरते हैं कि हर आने-जाने वाले के हाथ में हथियार तो नहीं हैं, बहू-बेटियाँ घर से निकलती तो है परन्तु परिवार डरता है जब तक वो घर वापस नहीं आ जाती है। जब भी कहीं पर दंगा होता है तो ग़रीब सबसे पहले उसकी चपेट में आता है इसमें ग़रीब की अस्मत लूटती है, उसके घर जलाये जाते है लेकिन उनकी मौत पर निज़ाम का भाषण कुछ ओर ही कहता है। एक ओर बात जो समझ से परे हैं, वह है कि दूसरे देश से आने वाले लोगों को शरणार्थीं कह सकते है परन्तु भाई और पड़ोसी को भी अख़बार कुछ ओर  ही कहने लगता है। जिस शब्दावली का उपयोग मीडिया द्वारा किया जा रहा है वह कहीं से भी भारतीय लोकतंत्र और संविधानिक भाषा तो नहीं लगती है।
हर चुनाव के बाद वह वैसा ही महसूस करता है जैसा ख़ुद की बर्बादी पर करता है। प्रत्येक वर्ष आँधी-तुफ़ान से हमारी फ़सल बर्बाद हो जाती है लेकिन सरकार उस पर भी अपनी वोट की राजनीति करती है पर क्यूँ? किसकी कितनी भागीदारी रही है विकास में यह आम आदमी की समझ से परे हैं, हाँ, वो यह तो जानता है कि चुनाव में महिलाओं, दलितों और अल्पसंख्यकों को ध्यान में रखकर सत्ता का गलियारा अपनी रणनीति बनाने लगता है। इन्सान को केवल तब तक याद किया जाता है जब तक कि दलगत राजनीति के लिये वोट नहीं करता है। आदमी ने जब बटन दबाया तो इन्सान था और मतदान पेटी में बन्द आदमी अब आँकड़ा होकर रह गया है।
ज़िन्दगी जीने के लिए इन्सान दिन-रात मेहनत करता है, सच्चाई, ईमानदारी और मेहनत को वह साथ लिये चलता है और वह यही सोचता है कि फ़ैसला ख़ुदा करेगा इसलिये वह अपना सीना तानकर चलता है। गाँव से हर रोज़ मज़दूर, महिलाऐं और बाल मज़दूर शहर में चले आते हैं।  वह यह भी नहीं जानते कि शहर उनके साथ कैसा व्यवहार करेगा लेकिन शहर की चमक और काम मिलने की उम्मीदभर उसे शहर की ओर आकर्षित करती है, दुनिया का तो पता नहीं पर मेरे देश की यह सच्चाई है कि मज़दूरों का बड़े नाटकीय ढंग से पलायन कराया जाता है।
कठोर परिश्रम से आमदनी, जीविका, प्रेम, कटुता और थकावट, आदि न जाने क्या-क्या प्राप्त करता है जो कुछ भी मिला या नहीं मिला उसके लिये किसे दोषी समझे, उसकी समझ में कुछ भी नहीं आता है लेकिन उसकी नाज़ुक आँखों में भी आँसू आ जाते हैं। वह रोज़़ सोचता है कोई अपना काम करे और वह किस-किस की माने किसे मना करे, वह रोज़़ सुनता है कि अपने मन की सुनो परन्तु भूख के द्वन्द्व में दिमाग़़ का क्या करे।
इन्सान सदियों से मिट्टी को माँ कहते आया है, शहरीकरण उसके खेतों को चन्द सिक्कों से ख़रीदना चाहता है जिसके फलस्वरूप समाज का एक बड़ा हिस्सा हाशिये पर चला गया है उसे रोज़ी-रोटी जुटाना मुश्किल हो रहा है। किसान मिट्टी की नमी में आज़माइश करके देखना चाहता है तब ही तो वह मुटठीभर बीज खेत में डालकर एक अच्छी फ़सल की उम्मीद करता है।
उसमें सत्ता सौंपने की छटपटाहट अच्छी लगती है, और वह दौलत की अदला-बदली अच्छी तरह से करना चाहता है जिसके लिये वंशवाद में उनको एतवार है की नहीं लेकिन उसकी संसाधन जुटाने की कवायत अच्छी रहती है। यूँ तो सदियों से लोग सत्ता में आते-जाते रहे हैं फिर भी राजनीति में लोग अपनी ज़ुबान से अपने नाम वो हवा में लिखना चाहते है, उसे मालूम है कि सत्ता एक बार हाथ से खिसकी तो फिर दोबारा मिलने में न जाने कितने वर्षों का इंतज़ार करना पडे़गा।
सामाजिक घटनाओं और समाज में व्याप्त वैचारिक द्वन्द्व से अजीब सी उलझन पैदा हुई, इसी उधेड़बुन में पिछले छः वर्षों में जो कुछ भी समाज से मिला और घटनाओं ने दिया वह ही है किताब खुली रहने दो!


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सामंती विचारधारा

कौन कहता है सामंती विचारधारा मर गयी है,
कुर्सियाँ आज भी ओहदों के क्रम में लगती हैं

समाज में झुठ बोलने की गुंजाइश है, वरना,
वर्षों से अदालतें यूँ ही क्यों लगा करती हैं

इन्सान का तो ख़ुदा से एतवार उठ गया है,
अदालत में गीता-क़ुरान की क़सम लगती है

इन्सान का इन्सान पर भरोसा हो भी कैसे,
कागज़ी सबूतों के आधार पर फाँसी लगती है

बाज़ार की शक्ल हमें घिनौनी क्यूँ लगती है,
कहीं रोटी, कहीं ज़िस्म की नुमाइश लगती है

संविधान सबको बराबरी का हक़ देता भी है,
मोहर हर बार दलगत राजनीति पर लगती है

किसी ने बहुत ख़ूब कहा ऊर्जा मरती नहीं है,
लोकतंत्र में भी सामंतियों की चैपालें लगती हैं

पार्टियों के अहम से मैं को कैसे निकाला जाय,
हर वादे में दिल्ली में उनकी सल्तनत लगती है

आम जनता भाषण सुनते हुए हर बार सोचती है,
दिल्ली में रोज़़ राजशाही अपना दरबार लगाती है।


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तानाशाही कब जनता की माँग बनी...

किताब खुली रहने दो की प्रस्तावना:  डॉ. अजय कुमार सिंह 

किताब की प्रस्तावना लिखने के लिए शायद मैं उपयुक्त व्यक्ति नहीं, मैं कोई साहित्यकार या कवि नहीं हूँ, पर लिखने की दो वजह रहीं एक तो गुरमिन्दर सिंह कोई पेशेवर कवियों की तरह इरादतन नहीं लिखते बल्कि जब-जब विचार का दबाव बढ़ता है वो कविता लिखतें हैं, एक मायने में ये कवितायें ज़िन्दगी की उस छटपटाहट से निकली हैं, जिसे हम रोज़ जीतें हैं, पर ना तो उन पर ठहर पातें हैं ना ही उन्हें शब्द दे पाते हैं, ऐसी कविता की प्रस्तावना लिखने के लिए जीवन की थोड़ी बहुत समझ भी मदद कर सकती है। दूसरी बात यह है कि गुरमिन्दर सिंह की ये कवितायें बदलाव का कोई दावा नहीं करतीं बल्कि उनको समझने-समझाने की कोशिश करती है, जिनको बदलने की ज़रूरत है। उनकी कवितायें किसी मानक सिद्धांत की बात तो नहीं करतीं हैं पर अपने पीछे एक विचार लिए चलती हैं, वो विचार जो ठहर कर देखने की गुज़ारिश करते हैं। 


ऐसा लगता है कि वर्तमान को लेकर छटपटाहट ने ही गुरमिन्दर सिंह को इन कविताओं को लिखने के निर्णायक फै़सले को पूरा कराया और अपनी बेचैनी को व्यक्त करने के लिए उन्होंने कविता का सहारा लिया।

कविताओं की ये नई कड़ी शायद हमें यह समझने में मदद करे कि दिन-ब-दिन द्वन्द कैसे हो गये हैं, वो क्या चीज़ है जो हावी हो गयी है, और वो क्या हैं, जिसको हम समझने से कतराते हैं। कहीं ऐसा तो नहीं की हमने ऐसे विचारों को ही हावी कर लिया है, वो हमारी ज़रूरत के बजाय हमारी राजनैतिक और बाज़ारू मजबूरियाँ हैं। ये कवितायें ज़रूरत और मजबूरी के इस फ़ासले को बड़ी आसानी से दिखाती हैं-
यूँ तो इतिहास में मेरा बड़ा ही नाम है,
इलाक़े की जनता क्यूँ ग़रीब होती गयी।

सिर्फ़ बोलने और सुनने के लिए शब्दों कि ज़रूरत नहीं होती बल्कि देखने और महसूस करने के लिए भी शब्दों की ज़रूरत होती है। गुरमिन्दर सिंह ने पाठकों को इन कविताओं के माध्यम से कई ऐसे शब्द और लय दिये हैं। हमारे नारीवादी दोस्तों को शायद ये पंक्तियाँ मदद करें-
मेरी देह पर वक़्त की बहुत सी खरोचें हैं,
तुम केवल होठों की लाली पर रूक जाना।

स्थितियाँ जब-जब असहज होती हैं तब-तब ऐसी कविताओं की ज़रूरत पड़ती है, व्यक्तिगत तौर पर मुझे जब-जब ज़रूरत पड़ी तब-तब उनकी कविता याद आयी। उन्होंने जिस आवाज़ को उठाया वो हमारे आसपास की ही आवाज़ है, कभी ये आवाज़ नौकरियों की खोज में सुनते हैं तो कभी उन आंदोलनों के भीतर जहाँ हम बदलाव के लिए जूझ रहे होते हैं-
न जाने क्यूँ साँस रूक-रूककर आयी है,
कोशिश हर बार लम्बी साँस की रखता है।
वो क्या चीज़ है जो ज़िन्दगी के साधारण होने के विचार पर हावी हो गई है और रोज़-ब-रोज़ हमें एक दूसरे पर बढ़त बनाने को प्रेरित करती है। कहीं ऐसा तो नहीं कि हमने इन विचारों को जानबूझकर अपने स्वार्थ के लिए अपनी ज़िन्दगी में जगह दे रखी हो। ज़िन्दगी के लिए सिद्धांत होना एक बात है और उन सिद्धांतों के आधार पर ज़िन्दगी जीना दूसरी बात, हमेशा ही इन दोनों के बीच में एक फ़ासला रहा है। साहित्य और कविताऐं हमें इन फ़ासलों को समझने में और कुछ हद तक पाटने में भी मदद करती हैं। मुझे ऐसा लगता है कि ये कविताऐं सिद्धांत की समझ और सिद्धांत को बरतने के बीच के फ़ासले को समझा पाती हैं.

“तानाशाही कब जनता की माँग बनी” - यही तो द्वन्द्व है।
वरना हम गाहे-बगाहे अपने वर्षों के लोकतांत्रिक जद्दोजहद को इस कदर नज़रअंदाज नहीं कर पाते।
डॉ. अजय कुमार सिंह, 
टाटा सामाजिक विज्ञान संस्थान,  
मुम्बई

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