मंगलवार, फ़रवरी 04, 2020

जागो बहनों

आज हमने शाह जाहनी पार्क देखा,
मुट्ठी भर लोगों को जुड़ते देखा,
एक ही माइक में ऊँची थी आवाज़,
बहनो जागो उठो,
बढ़ो लगाओ आवाज़़,
एक लम्बी लड़ाई,
हमें जो लड़नी है,
यह धर्म के ख़िलाफ़ नहीं है,
यह तो मानवता है,
मानव आज,
इन्सान बनने में महँगा हो गया है,
तुम्हारे पास जज़्बात तो बहुत है,
क्योंकि यह जज़्बात नहीं,
यह तो मानव देह पर झेला है,
लेकिन तुम्हारी आवाज़ में धार नहीं है,
जो जला सके तीली,
उठा सके धुँआ,
अभी तुम्हें बहुत दूर जाना है,
यह तो पहली सीढ़ी है,
जो पार्क के लिए,
दो क़दम नीचे को जाती हैं,
समाज को उठाने के लिए,
हर ओर लगायी है आवाज़़,
हम आपके साथ है आपके लिए,
आपको बोलना होगा,
हक़ माँगना होगा लेकिन,
पत्थर की सिला को,
रेत बनाने के लिए,
आपको हमारी ज़रूरत होगी,
और हम, आपके लिए
अप्सरा में पत्रकार सम्मेलन करेंगे,
माँग करेंगे,
उस क़ानून को बदला जाए,
जिसमें हमारी भूमिका ही नहीं हैं,
अध्याय और प्रस्तावना तो बाद की बातें।

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