रविवार, फ़रवरी 09, 2020

संविधान संशोधन

हम क्या चाहते हैं,
वो क्या देते हैं,
देना कोई उनकी फ़ितरत में नहीं,
वो केवल हक़ पर हावी है,
हम केवल हक़ माँगते है,
उनसे नहीं
अपने संविधान से,
संविधान तो मुटठी भर लोगों ने लिखा है,
फिर क्यों इसे प्रजातंत्र की कुरान कहते हैं,
कुरान की आयतें हो या,
गीता के श्लोक,यह केवल,
मानने के लिए होते है,
शायद सोचने के लिए भी,
अगर जनता ने सोचना शुरू किया तो,
संविधान का संशोधन ज़रूरी है,
संशोधन काफ़ी मंहगा हो गया है,
क्योंकि सांसदों को टीए-डीए देना होगा,
वर्षों का रोज़़गार मिलेगा उन्हें,
नेता तो केवल राजनीति जानते हैं,
चाहते भी है कुछ करना,
बिल ओर संशोधन के लिए,
वक़्त ही नहीं है उनके पास,
उसे वह बदलने नहीं दे सकते,
किस उम्मीद को रखूँ मैं क़ायम,
कौन सी छोड़ दूँ आज,
आने वाले कल के लिये,
क्या हम छोड़ रहें हैं,
जो हमने बोया है,
उसको क्यूँ मेरे बच्चे काटेंगे,
उसको हम वह देना चाहते हैं,
जिसको वो कभी लेना नहीं चाहता,
ये कौन से समाज का निर्माण,
आजकल हम कर रहे हैं।

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें

Please do not enter any span link in the comment box.