शनिवार, फ़रवरी 22, 2020

अख़वार और पत्रिका


क्या लिख छोड़ू इन पन्नों पर,
कौन पढ़ेगा क्यूँ पढ़ेगा,
इन पन्नों को,
कोई युग पुरुष तो हूँ नहीं,
न जन्मा हूँ,
कुलीनों की बस्ती में,
फिर क्योंकर कोई आकर्षित होगा,
कुछ विचारों से आच्छादित,
ये शब्दों की माला,
जिन दर्दों को लिखता हूँ ’मैं,
उन दर्दों को सहने वाले,
नहीं ख़रीद पाते अख़वार और पत्रिका,
सारा वक़्त भुँजा और दाल-भात के लिए,
दिन भर भागता हूँ ’मैं’,
जॉब कार्ड के लिए,
जब से कार्ड मिला है,
लगता हूँ सरकारी आदमी,
वो बात अलग है,
पेट भुँजे को भी तरस गया है,
धन्य हो,
इन क़ानूनों के बनाने वालों,
तुम अपना पेट भरते गये,
विचार लिखते गये,
क्या कभी किसी ने आकर देखा है,
संविधान और बारह सौ क़ानूनों बाद भी,
चालीस करोड़ लोग भूखमरी के द्वार पर।

2 टिप्‍पणियां:

  1. आपकी लिखी रचना "सांध्य दैनिक मुखरित मौन में" आज शनिवार 22 फरवरी 2020 को साझा की गई है...... "सांध्य दैनिक मुखरित मौन में" पर आप भी आइएगा....धन्यवाद!

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  2. शुक्रिया यशोदा जी।

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