मंगलवार, फ़रवरी 04, 2020

फिर क्या होगा


फिर क्या होगा,

जब गौरैयाओं के झुण्ड,

विचलित कौओं के झुण्ड,

चले जायेंगे क्षितिज के पार,

मोतियों की तलाश में,

ये ख़ुद गुम हो जायेंगे,

तब फिर क्या होगा,

इस उथल-पुथल के दौर में,

ग्रंथों और पन्नों के द्वार,

अगर सिमट भी जाये,

मुड़कर नहीं आयेंगे,

किताबों और कक्षाओं के दिन, 

मगर आयेंगे बदलते दिन,

आर्थिक सामाजिक और राजनीति के,

समाज फैलता ही रहेगा,

मन सिमटते रहेंगे,

कल्पनाऐं भी शायद,

बिखरना छोड़ दें,

मगर फिर क्या होगा,

धुँआ घरों से नहीं,

देह से उठा करेगा,

शोर मुँख से नहीं,

दिलो-दिमाग़ को फाड़कर,

आत्मा की परिधि से निकलेगा,

फिर क्या होगा।

3 टिप्‍पणियां:

  1. आपकी लिखी रचना "सांध्य दैनिक मुखरित मौन में" आज बुधवार 05 फरवरी 2020 को साझा की गई है...... "सांध्य दैनिक मुखरित मौन में" पर आप भी आइएगा....धन्यवाद!

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  2. तहेदिल से शुक्रिया अदा करता हूँ। सभी साथियों का आभारी हूँ, जिन्होने मेरी कविता को पढ़ा है और उस पर अपने विचार व्यक्त किये हैं।

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