रविवार, फ़रवरी 16, 2020

तानाशाही कब जनता की माँग बनी...

किताब खुली रहने दो की प्रस्तावना:  डॉ. अजय कुमार सिंह 

किताब की प्रस्तावना लिखने के लिए शायद मैं उपयुक्त व्यक्ति नहीं, मैं कोई साहित्यकार या कवि नहीं हूँ, पर लिखने की दो वजह रहीं एक तो गुरमिन्दर सिंह कोई पेशेवर कवियों की तरह इरादतन नहीं लिखते बल्कि जब-जब विचार का दबाव बढ़ता है वो कविता लिखतें हैं, एक मायने में ये कवितायें ज़िन्दगी की उस छटपटाहट से निकली हैं, जिसे हम रोज़ जीतें हैं, पर ना तो उन पर ठहर पातें हैं ना ही उन्हें शब्द दे पाते हैं, ऐसी कविता की प्रस्तावना लिखने के लिए जीवन की थोड़ी बहुत समझ भी मदद कर सकती है। दूसरी बात यह है कि गुरमिन्दर सिंह की ये कवितायें बदलाव का कोई दावा नहीं करतीं बल्कि उनको समझने-समझाने की कोशिश करती है, जिनको बदलने की ज़रूरत है। उनकी कवितायें किसी मानक सिद्धांत की बात तो नहीं करतीं हैं पर अपने पीछे एक विचार लिए चलती हैं, वो विचार जो ठहर कर देखने की गुज़ारिश करते हैं। 


ऐसा लगता है कि वर्तमान को लेकर छटपटाहट ने ही गुरमिन्दर सिंह को इन कविताओं को लिखने के निर्णायक फै़सले को पूरा कराया और अपनी बेचैनी को व्यक्त करने के लिए उन्होंने कविता का सहारा लिया।

कविताओं की ये नई कड़ी शायद हमें यह समझने में मदद करे कि दिन-ब-दिन द्वन्द कैसे हो गये हैं, वो क्या चीज़ है जो हावी हो गयी है, और वो क्या हैं, जिसको हम समझने से कतराते हैं। कहीं ऐसा तो नहीं की हमने ऐसे विचारों को ही हावी कर लिया है, वो हमारी ज़रूरत के बजाय हमारी राजनैतिक और बाज़ारू मजबूरियाँ हैं। ये कवितायें ज़रूरत और मजबूरी के इस फ़ासले को बड़ी आसानी से दिखाती हैं-
यूँ तो इतिहास में मेरा बड़ा ही नाम है,
इलाक़े की जनता क्यूँ ग़रीब होती गयी।

सिर्फ़ बोलने और सुनने के लिए शब्दों कि ज़रूरत नहीं होती बल्कि देखने और महसूस करने के लिए भी शब्दों की ज़रूरत होती है। गुरमिन्दर सिंह ने पाठकों को इन कविताओं के माध्यम से कई ऐसे शब्द और लय दिये हैं। हमारे नारीवादी दोस्तों को शायद ये पंक्तियाँ मदद करें-
मेरी देह पर वक़्त की बहुत सी खरोचें हैं,
तुम केवल होठों की लाली पर रूक जाना।

स्थितियाँ जब-जब असहज होती हैं तब-तब ऐसी कविताओं की ज़रूरत पड़ती है, व्यक्तिगत तौर पर मुझे जब-जब ज़रूरत पड़ी तब-तब उनकी कविता याद आयी। उन्होंने जिस आवाज़ को उठाया वो हमारे आसपास की ही आवाज़ है, कभी ये आवाज़ नौकरियों की खोज में सुनते हैं तो कभी उन आंदोलनों के भीतर जहाँ हम बदलाव के लिए जूझ रहे होते हैं-
न जाने क्यूँ साँस रूक-रूककर आयी है,
कोशिश हर बार लम्बी साँस की रखता है।
वो क्या चीज़ है जो ज़िन्दगी के साधारण होने के विचार पर हावी हो गई है और रोज़-ब-रोज़ हमें एक दूसरे पर बढ़त बनाने को प्रेरित करती है। कहीं ऐसा तो नहीं कि हमने इन विचारों को जानबूझकर अपने स्वार्थ के लिए अपनी ज़िन्दगी में जगह दे रखी हो। ज़िन्दगी के लिए सिद्धांत होना एक बात है और उन सिद्धांतों के आधार पर ज़िन्दगी जीना दूसरी बात, हमेशा ही इन दोनों के बीच में एक फ़ासला रहा है। साहित्य और कविताऐं हमें इन फ़ासलों को समझने में और कुछ हद तक पाटने में भी मदद करती हैं। मुझे ऐसा लगता है कि ये कविताऐं सिद्धांत की समझ और सिद्धांत को बरतने के बीच के फ़ासले को समझा पाती हैं.

“तानाशाही कब जनता की माँग बनी” - यही तो द्वन्द्व है।
वरना हम गाहे-बगाहे अपने वर्षों के लोकतांत्रिक जद्दोजहद को इस कदर नज़रअंदाज नहीं कर पाते।
डॉ. अजय कुमार सिंह, 
टाटा सामाजिक विज्ञान संस्थान,  
मुम्बई

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