गुरुवार, फ़रवरी 13, 2020

महामारी

दर्द की उपज सामूहिक है,
आज वह रह गया है, व्यक्तिगत,
दर्द से पीड़ित इन्सान,
दुसरे इन्सानों से,
दूर क्यों जाना चाहता है,
असहाय सा निर्जीव में परिवर्तन,
क्यों होती है अभिलाषा,
सजीव न रहने की,
तन-मन से उपजी ज्वाला को,
क्योंकर कोई नहीं समझता,
तपिश के ताप से उठा धुँआ,
उन्हें क्यों नहीं समझता,
जो एक वेदना के शिकार हैं,
खूद पर पड़ी मार तो,
महामारी ......
वरना जलती आग पर,
वह पकाना चाहते हैं,
हसीन ख्यालों की बिरयानी,
मानवता अब मानव से बाहर,
हम पर हमीं की छाया,
शर्म हया न अब हम में रही,
जिसे पूर्वज संभालते आ रहे थे,
क्योंकि!
वह एक सामाजिक प्राणी थे,
और हम हो गये हैं व्यक्ति, व्यक्ति,
जिस चाँदनी को हम इतिहास में,
खोजते आयें हैं पुराणों और ग्रन्थों में,
वह अब ओझल हो गयी है,
बस रह गया है दर्द,
जो चाँदनी और रौशनी में भी,
स्पष्ट दिखाई नहीं देता,
आँखों के पटल पर अंकित,
उपस्थित मानवता की मूर्ति,
आज कुछ जर्जर हो चुकी है।

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