शुक्रवार, फ़रवरी 21, 2020

दीवार


क़लम से तूने,
चट्टान को कुरेदना चाहा,
क्या यादें ही काफ़ी नहीं हैं,
जख़्मों को कुरेदने के लिए,
काग़ज़ की नाव को तूने,
दरिया के पार ले जाना चाहा,
क्या एक रात काफ़ी नहीं है,
सपने देखने के लिए,
मन की उड़ान से,
इस जहाँ से पार जाना चाहा,
क्या कल्पनाऐं ही काफ़ी नहीं हैं,
मन को बहलाने के लिए,
समाज की इस दीवार से,
एक पत्थर निकालना चाहा,
क्या इस दीवार को,
देखना ही काफ़ी नहीं,
जीने के लिए,
इस दुनिया में तूने,
जीने का सहारा चाहा,
क्या मन में कोई जगह बाक़ी है,
ज़ख़्म बनाने के लिए,
पत्थरों कंकड़ों को बटोर कर,
एक आशियाना बनाना चाहा,
क्या क़लम काफ़ी नहीं है,
अपने दर्दों को लिखने के लिए।

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