रविवार, फ़रवरी 16, 2020

सामंती विचारधारा

कौन कहता है सामंती विचारधारा मर गयी है,
कुर्सियाँ आज भी ओहदों के क्रम में लगती हैं

समाज में झुठ बोलने की गुंजाइश है, वरना,
वर्षों से अदालतें यूँ ही क्यों लगा करती हैं

इन्सान का तो ख़ुदा से एतवार उठ गया है,
अदालत में गीता-क़ुरान की क़सम लगती है

इन्सान का इन्सान पर भरोसा हो भी कैसे,
कागज़ी सबूतों के आधार पर फाँसी लगती है

बाज़ार की शक्ल हमें घिनौनी क्यूँ लगती है,
कहीं रोटी, कहीं ज़िस्म की नुमाइश लगती है

संविधान सबको बराबरी का हक़ देता भी है,
मोहर हर बार दलगत राजनीति पर लगती है

किसी ने बहुत ख़ूब कहा ऊर्जा मरती नहीं है,
लोकतंत्र में भी सामंतियों की चैपालें लगती हैं

पार्टियों के अहम से मैं को कैसे निकाला जाय,
हर वादे में दिल्ली में उनकी सल्तनत लगती है

आम जनता भाषण सुनते हुए हर बार सोचती है,
दिल्ली में रोज़़ राजशाही अपना दरबार लगाती है।


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