रविवार, फ़रवरी 16, 2020

किताब खुली रहने दो

समानता इन्सान के लिये ईश्वर का दिया एक नायाब तोहफा है, जन्म के समय हम सब बराबरी लिये पैदा होते है लेकिन जैसे ही हम समाज की गोद में आते है, हमें जाति, धर्म, समुदाय, कबीला, कुटंम्ब, आदि न जाने क्या-क्या नाम मिल जाते हैं जिनको हम जीवन भर अपने से अलग नहीं कर पाते हैं।  
 ’मानस की जात सबै ऐकै पहचानबो’ की बुलन्दी क्यूँ नहीं हो सकती, हो तो सकती है लेकिन अदालतों और इबादतगाहों में जो फ़ैसले होते है वो कभी-कभी अमानवीय लगते हैं, लगें भी क्यूँ ना हम एक बीमारी से ग्रस्त हैं कि ’समाज क्या कहेगा’ इसी से बचने के लिये दिन-रात हम झूठ-सच का सहारा लेकर एक दूसरे से आगे निकलने में लगे रहते हैं। यहीं से शुरूआत होती है ज़िन्दगी के पहले द्वन्द्व की, जो जीवनभर इन्सान का पीछा नहीं छोड़ता है।
भारतीय संविधान इन्सान को बराबरी का हक़ देता है फिर भी अधिकारों को इन्सान तक पहुँचने से कौन रोकता है। यह ऐसा सवाल है जो हमेशा इन्सान की समझ से बाहर ही रहा और समाज में हो रहे भेदभाव और अन्याय से वह रोज़ रूबरू होता है, लेकिन न जाने वह चुप क्यूँ है? यह चुप्पी समाज को नियंत्रित रहती है, वह जानता तो है कि उसे आँखें खुली रखनी होगी अन्यथा लोग उस पर उंगली उठायेंगे परन्तु सत्ता मज़दूरों को कभी एक साथ चलने ही नहीं देना चाहती है।
 ऐसा नहीं की दुनिया में घट रही घटनाऐं हम तक नहीं पहुँचती, ख़बरें आती है इन्सानों के मरने की परन्तु हमारा यकीन न जाने कहाँ खो जाता है, हम ख़्यालों से बाहर आना भी चाहें तो राजनीति हमें ’हम’ होने ही नहीं देती, हर बार एक नया शगूफ़ा आता है इन्सान उसमें उलझकर रह जाता है। इन लोगों को लगता है कि शहर में गंदगी बढ़ गयी है इन जाहिलों के आने से नहीं तो मेरे शहर का हर शख़्स तो जन्नत से आता है भला ये भी कोई बात हुई, मेरी समझ ’मैं’ क्यूँ नहीं आती है।
गाँव-शहर की जद्दोजहद से जो उपजा उसमें इन्सान उलझकर रह गया है, उसकी समझ में नहीं आ रहा है कि वो क्या करे और क्या ना करे, किसकी माने और किसे वह मना करे उसकी समझ में कुछ भी नहीं आ रहा है। इन्सान की समझ में नहीं आ रहा वह पुराने और नये के मध्य तारतम्य कैसे बैठाये, कहाँ जाये उसे तो हर तरफ़़ मायूसी ही नज़र आती है, उम्मीद क़ायम है तभी तो ज़िन्दगी भर भाग दौड़ में लगा रहता है।
मौसम और सियासत रोज़ रंग बदलते हैं इन्सान कौन से मौसम में ख़ुश रहे और किसे अपने जीवन का हिस्सा माने, तय करना मुश्किल है, अब उसके बस की बात नज़र नहीं आती है। ग़म के भरें पलों को भूला के हम जी भी ले, परन्तु न जाने क्यों जीवन का तार टूटने सा लगा है उसे सम्भालने में ही पूरा का पूरा जीवन लग जाता है।
ग़रीब को जम्हूरियत से उम्मीद अच्छी रहती है लेकिन इस जम्हूरियत का खेल भी बड़ा उमदा है जिसमें लाखों लोग लगते हैं किसी एक की ताज़पोशी करने में। वह जानता भी नहीं जिसकी ताज़पोशी होगी क्या उसके विचार में कहीं इन्सान है भी की नहीं, वो मेरे देश की जनता के लिये कुछ करना भी चाहता है या केवल जम्हूरियत के नाम पर जो मरे सो मरे, यहाँ तो आला हुकमरान बुलेटप्रूफ चाहते हैं।  
आज देश के हालात इस तरहा के हो रहे हैं कि लोग आपस में भी किसी पर एतवार नहीं कर पा रहे हैं जो कि सामाजिक के ताने-बाने के लिये एक आपातकालीन स्थिति हैं।  देश के लोग डरते हैं कि हर आने-जाने वाले के हाथ में हथियार तो नहीं हैं, बहू-बेटियाँ घर से निकलती तो है परन्तु परिवार डरता है जब तक वो घर वापस नहीं आ जाती है। जब भी कहीं पर दंगा होता है तो ग़रीब सबसे पहले उसकी चपेट में आता है इसमें ग़रीब की अस्मत लूटती है, उसके घर जलाये जाते है लेकिन उनकी मौत पर निज़ाम का भाषण कुछ ओर ही कहता है। एक ओर बात जो समझ से परे हैं, वह है कि दूसरे देश से आने वाले लोगों को शरणार्थीं कह सकते है परन्तु भाई और पड़ोसी को भी अख़बार कुछ ओर  ही कहने लगता है। जिस शब्दावली का उपयोग मीडिया द्वारा किया जा रहा है वह कहीं से भी भारतीय लोकतंत्र और संविधानिक भाषा तो नहीं लगती है।
हर चुनाव के बाद वह वैसा ही महसूस करता है जैसा ख़ुद की बर्बादी पर करता है। प्रत्येक वर्ष आँधी-तुफ़ान से हमारी फ़सल बर्बाद हो जाती है लेकिन सरकार उस पर भी अपनी वोट की राजनीति करती है पर क्यूँ? किसकी कितनी भागीदारी रही है विकास में यह आम आदमी की समझ से परे हैं, हाँ, वो यह तो जानता है कि चुनाव में महिलाओं, दलितों और अल्पसंख्यकों को ध्यान में रखकर सत्ता का गलियारा अपनी रणनीति बनाने लगता है। इन्सान को केवल तब तक याद किया जाता है जब तक कि दलगत राजनीति के लिये वोट नहीं करता है। आदमी ने जब बटन दबाया तो इन्सान था और मतदान पेटी में बन्द आदमी अब आँकड़ा होकर रह गया है।
ज़िन्दगी जीने के लिए इन्सान दिन-रात मेहनत करता है, सच्चाई, ईमानदारी और मेहनत को वह साथ लिये चलता है और वह यही सोचता है कि फ़ैसला ख़ुदा करेगा इसलिये वह अपना सीना तानकर चलता है। गाँव से हर रोज़ मज़दूर, महिलाऐं और बाल मज़दूर शहर में चले आते हैं।  वह यह भी नहीं जानते कि शहर उनके साथ कैसा व्यवहार करेगा लेकिन शहर की चमक और काम मिलने की उम्मीदभर उसे शहर की ओर आकर्षित करती है, दुनिया का तो पता नहीं पर मेरे देश की यह सच्चाई है कि मज़दूरों का बड़े नाटकीय ढंग से पलायन कराया जाता है।
कठोर परिश्रम से आमदनी, जीविका, प्रेम, कटुता और थकावट, आदि न जाने क्या-क्या प्राप्त करता है जो कुछ भी मिला या नहीं मिला उसके लिये किसे दोषी समझे, उसकी समझ में कुछ भी नहीं आता है लेकिन उसकी नाज़ुक आँखों में भी आँसू आ जाते हैं। वह रोज़़ सोचता है कोई अपना काम करे और वह किस-किस की माने किसे मना करे, वह रोज़़ सुनता है कि अपने मन की सुनो परन्तु भूख के द्वन्द्व में दिमाग़़ का क्या करे।
इन्सान सदियों से मिट्टी को माँ कहते आया है, शहरीकरण उसके खेतों को चन्द सिक्कों से ख़रीदना चाहता है जिसके फलस्वरूप समाज का एक बड़ा हिस्सा हाशिये पर चला गया है उसे रोज़ी-रोटी जुटाना मुश्किल हो रहा है। किसान मिट्टी की नमी में आज़माइश करके देखना चाहता है तब ही तो वह मुटठीभर बीज खेत में डालकर एक अच्छी फ़सल की उम्मीद करता है।
उसमें सत्ता सौंपने की छटपटाहट अच्छी लगती है, और वह दौलत की अदला-बदली अच्छी तरह से करना चाहता है जिसके लिये वंशवाद में उनको एतवार है की नहीं लेकिन उसकी संसाधन जुटाने की कवायत अच्छी रहती है। यूँ तो सदियों से लोग सत्ता में आते-जाते रहे हैं फिर भी राजनीति में लोग अपनी ज़ुबान से अपने नाम वो हवा में लिखना चाहते है, उसे मालूम है कि सत्ता एक बार हाथ से खिसकी तो फिर दोबारा मिलने में न जाने कितने वर्षों का इंतज़ार करना पडे़गा।
सामाजिक घटनाओं और समाज में व्याप्त वैचारिक द्वन्द्व से अजीब सी उलझन पैदा हुई, इसी उधेड़बुन में पिछले छः वर्षों में जो कुछ भी समाज से मिला और घटनाओं ने दिया वह ही है किताब खुली रहने दो!


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