बुधवार, फ़रवरी 12, 2020

कबीला

फटे हालात और ज़र-ज़र ज़िन्दगी,
एक ओर कबीला स्थानांतरित हुआ है,
दो जून की रोटी के लिए डाला डेरा,
ज़ज्बात सिमटते-सिमटते बिखर गये,
रह गयी है बस एक पुनर्वास कालोनी,
मेरी ज़िन्दगी के यौवन का उभार,
इन गलियों की आँखों में खटकता है,
एक रेंगते जीव की तरह .....,
रेंगती नज़र आती है जीवन लीला,
आशा कभी-कभी बहुत नज़दीक होती है,
दिल की चहारदीवारी को पार करना,
इन्सान की मानसिकता में विस्फोट होगा,
और झुलसकर रह जायेगी,
एक ओर कहानी ......।

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