गुरुवार, फ़रवरी 13, 2020

हारना और जीतना

झँड़ा, मुकुट और पगड़ियाँ,
रास्ता, सड़क और पगडंडियाँ,
बूँद, तालाब और नदियाँ,
तुम 'मैं' और बिरादरियाँ,
सब अपना रूप बदलते रहे,
वाहेगुरु के आकार के बिना,
ज़मीन को पाताल तक खोदना,
कब किसने जानी है गहराई,
समुन्दर और मन की,
दूसरों से लड़ना युद्ध होगा,
ख़ुद से अपनी लड़ाई,
पेट, दिल और दिमाग़,
कब एक दिशा में चलेंगे,
ख़ुद से भागते इन्सान का,
कभी ख़ुद से ख़ुद के लिए,
लड़ना होता है किसी बहाने से,
वरना........
लड़ना-लड़ाना अच्छा नहीं,
अपने से हारना और जीतना,
जीतकर फिर हार जाना,
क्या कभी किसी ने पूछा है,
इन्सान अपने द्वन्द में,
दूसरों को लपेटना कब छोड़ेगा।

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