रविवार, फ़रवरी 09, 2020

प्रेम बन्धन नहीं


प्रेम बन्धन नहीं,
ह्दय की मुक्ति है,
देह बंध जाती हैं,
बन्धन के बन्धनों से,
मुक्ति मिल जाती हैं,
कहीं किसी से,
चित्त की बात कह देने से,
मन क़ैद नहीं होता,
समाज की सलाख़ों में,
वह आज़ाद है,
देह के उस क़ैदख़ाने में भी,
उस देह में,
एक और देह,
जो प्रेम समुन्द्र में,
उछलती कुदती है,
जीवन की सार्थक प्रेरणा है,
ओर मुक्ति है ह्दय की,
शान्ति आत्मीयता की,
प्रेम एक विश्वास है।

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें

Please do not enter any span link in the comment box.