शनिवार, फ़रवरी 15, 2020

कलेंडर


कलेंडर की तारीखें रेंगती हुई फिर उसी बिन्दु पर पहुँच गई। जहाँ से दर्द का न ख़त्म होने वाला सिलसिला शुरू हुआ। हाँ! चौथाई सदी गुजर जाने के बाद भी मन का बोझ कम नहीं हुआ।
दर्द से निजात नहीं मिली है।”
दर्द!”
कौन सा दर्द! “
कैसा दर्द!”
कुछ कर पाने या न कर पाने का दर्द!!”
कैसा था वह क्षण जब सब कुछ फिसल गया था मेरे हाथों से, तब, यदि “मैं” चाहती तो बचा सकती थी कलेंडर की तारीख़ को, इस बिन्दु पर रुकने से। बस् एक बार फिर लहू लुहान होना था और बच जाता, हाँ! शायद बच जाता एक टुकड़ा आसमान सांस लेने के लिए और लहुलुहान तो वैसे भी होती रही....।”

उस दिन हमेशा की तरह सुवह-सवेरे घर बाहर के पुरुषों के जागने से पहले शौच के लिए खेतों में गई थी। बस् अन्तर इतना था कि हमेशा घर-गाँव की अन्य महिलाओं के साथ झुण्ड में शौच के लिए जाया करती थी। परन्तु उस दिन पेट में पीड़़ा कुछ अधिक हुई सो अकेली ही निकल पड़ी। उपयुक्त स्थान तलाष कर ही रही थी कि जकड़ लिया था कक्लू चौधरी के आवारा लड़के बल्ली ने अपनी बाहों में और पटकना चाहता था बीच खेत में। तब आत्मरक्षा के लिए जाने कहाँ से शक्ति आ गयी थी। एक झटके के साथ स्वयं को आज़ाद कर सरपट भाग खड़ी हुई। लहूलुहान हो गए नंगें पैर, गिरते पड़ते घर पहुँची, तो उलटे मुझे ही फटकारा गया।
 क्यों गई थी तन्हा खेत में, चौधरी का दबदवा है गाँव में। उसके ख़िलाफ़ कौन मुँह खोल सकता है।” माँ ने मुँह बन्द रखने की सलाह दी।  इस सलाह में उनकी दुर्बल स्थिति का अहसास ज्यादा था।

पिता बिस्तर पर चिपक चुके थे बस् स्मृति मात्र ही नज़र आते थे, लगता था न जाने कब उनकी अर्थी की तैयारी करनी पड़ जाये। आधुनिक युग के दो भाई पत्नियाँ के आते ही, माँ-बाप को छोड़कर अलग-अलग शहरां में रहने लगे। बस्! साथ थे दो मरे समान जीव,  मेरी विवषता, अन्धकार मय् जीवन। तब कौन आवाज़ उठाता चौधरी के खिलाफ़?

पहला साक्षात्कार था इस दुनिया की कमीनगी से, तब बच गयी थी, मैं! मगर वह भेड़िया बेखौफ होकर घूम रहा था मेरे आसपास। माँ को एक ही रास्ता सूझा था मुझे सुरक्षित रखने का।
गाँव से दूर भेजकर”,
निश्चित हो गयी थी माँ!”,
कितना भोलापन था माँ में, बीस साल की मासल देह वाली बेसहारा लड़की,”
भेड़िये कहाँ नहीं होते”,
खेत से भागकर बचा लिया था अपने आपको।”
मगर बंद कमरे की चहारदीवारी से कहाँ भाग कर जाती। वह पिता के पुराने मित्र का घर था। बहुत सज्जन व्यक्ति थे पिता जी के मित्र। पिता जी ने कभी उनके साथ कुछ ऐसा उपकार किया था कि वह अपने आपको सदैव ऋणी मानते थे। तभी तो पिता जी ने स्वीकृति दी थी उनके घर रहने की। परन्तु बाप के गुण संतान में पूरे के पूरे कहाँ आते है। उनका लड़का अपने बाप के स्वभाव से बिलकुल अलग था। मेरा दुख यह था कि “मैं” पिता तुल्य चाचा को अपने शरीर से बहता खून दिखाकर शर्मसार नहीं करना चाहती थी। सो झेलती रही, गर्म सलाखों के दाग नंगे शरीर पर।

एक सपना दिया था मुकेश ने, सुन्दर भविष्य का सपना, घर की बहू बनाने का सपना। लेकिन इस घर में आने के लिए चाँदी-सोने से लदी लड़कियों की लम्बी कतार थी। चार पहिये युक्त सुन्दर विज्ञापन वाली लड़कियाँ। मेरा आग्रह, अनुमय, विनय सब व्यर्थ था।

तब तक मैंने घिसटते-घिसटते बी. ए. कर लिया था। पिता जी स्वर्ग सिधार गए थे। लोक लाज के लिए बड़े भैया गाँव से माँ को अपने साथ ले गए। मुझे मान लिया गया था कि “मैं” नारी समानता के युग में लड़की नहीं लड़के के समान हूँ। अपना भविष्य स्वयं बनाने लिए सक्षम हूँ। अतः भाईयों का कोई दायित्व नहीं है। स्वार्थी बुद्धि कैसे नये-नये बहाने तलाश कर लेती है।

मुझे लगा कि बुढें अंकल मजबूर आंखों से जिल्लत के साथ मुझे घर से निकलते हुए देखें इससे पहले “मैं” उन्हें अपने पिता के ऋण से मुक्त करने हुए स्वयं अपना वसेरा कहीं ओर देख लूं। मुझे काम मिल गया एक मोटे थूलथूल से इन्सान की पी.ए. बन गयी, वेतन कोई ज्यादा नहीं था, काम भी ज्यादा नहीं। बस् कुछ कपड़ों में बदलाव आना शुरू हुआ, कुछ जानकारी हुई आज के समाज की, इन्सान के भीतर बैठे भूत को देखने का भी मौका मिला। और मालूम हुआ इन्सान, इन्सान का शोषण कैसे करता है, कितना गिर जाता है अपने आप से, इन्सानियत से, दूसरे की लाचारी का किस तरह भोग करता है, मजबूरी का फ़ायदा आख़िर कहाँ तक उठाया जा सकता है, ये सब मालूम हुआ मुझे नौकरी के दौरान।
पहली बार एहसास हुआ नारी पर दुर्बल, अबला, कमजोर, लाचार, बदचलन, वेश्या, रन्ड़ी, आदि शब्द किस प्रकार बड़े ही साधारण ढंग थोप देता है ये समाज, नारी की मजबूरी पर, ये असामाजिक शब्द मुझे भी झेलने पड़े लेकिन समाज इन्हें सामाजिक शब्द कहता है।

आखिर नौकरी छोड़ देनी पड़ी और फिर वहीं बेरोजगारी। नौकरी के दौरान दो चार मित्र सखा भी बने। अब उनके लिए “मैं” सार्वजनिक सम्पति समझी जाने लगी। जिसका जी आये वह ही मुझे उपयोग (नौकरी दिलाने के नाम पर) करने की कोशिश  करने लगा। मुझे वह ही भगवान का दूत नजर आता था क्योंकि वह मुझे काम और काम के बदले दाम दिलाने का सहारा देता था कि आज कम्पनी मैंनेजर, कभी डायरेक्टर से, कभी मालिक से.... बात करके आया हूँ। हो सके तो कॉफी होम आ जाना, वहाँ बात करवा दूंगा आमने-सामने।  आना तो किसे होता था बस वह मुझे उपयोग करने लिए, मोहरा बनाने के लिए या एक लड़की को एक औरत तक का सफर दिखाने के लिए बुलाया जाता था सब सहना पड़ता है भूख के आगे, हाथ, मन और तन सब फैलाना पड़ता है, यही दस्तूर है जीवन के जीने का, ज़िन्दगी  से लड़ने का.......।

मेरे मित्रों में रमेश भी था जिसने मुझे वाकई समझने की कोशिश की और उसने काफ़ी हद तक उबारा भी उस दयनीय स्थिति से, नौकरी भी दिलायी फिर उसने मुझे अपने घर में रहने के लिए बुला लिया, जहाँ वह अकेला रहता था। परिवार कहीं दूसरी जगह रहता था मगर दिल्ली में ही। दिन कुछ सुगन्धि व राते रंगीन लगने लगी थी। “मैं” जीवन भर की प्यासी, रेत की ढेर थी जिसने कभी पानी व स्नेह नहीं देखा था, लेकिन ज़िन्दगी  अब कुछ रंगीन सी नजर आने लगी थी, कुछ परिवर्तन लग रहा था, “मैं” आशा कर रही थी अपने जीवन में किसी परिर्वतन की। रमेश  के आत्मीय व्यवहार ने नई आषाएं जगाई थीं मन में, परन्तु कभी-कभी सपने सच होते ही होते बिखर जाते है।

एक दिन अचानक रमेश  का एक्सीडैंड हो गया। गंभीर हालत में अस्पताल पहुँचाया गया। रमेश  की हालत देखकर डॉक्टरों ने ऑपरेशन  का फरमान सुना दिया, दस हज़ार का ख़र्च! “मैं” खाली हाथ, रमेश  की कुल जमा पूंजी न के बराबर। कहाँ से हो पैसो का जुगाड़? परिचित चेहरों पर नजर डाली, कभी गोपाल सम्पर्क में आया था। बीमा कम्पनी में एजेंट था, ऐसे ही किसी के घर पर में भेट हुई थी उससे, बहुत शालीन व भोला लगा था मुझे। कभी कहा था उसने मुझसे- “प्रीति जी “मैं” आपको कोई जॉब दिलाने का प्रयास करुँगा, फिर भी मेरी आवश्यकता पड़े तो निःसंकोच कहना, हिचकना नहीं...”

इस संकट के समय में उसकी याद हो आई मुझे, “मैं” उसके पास पहुँच गयी- भारीमन से रमेश के एक्सीडैंड का जिक्र करते हुए मैंने उससे कहा “मुझे पैसो की सख्त ज़रूरत है। प्लीज! कैसे भी कर दो, “मैं” आपका एहसान ज़िन्दगी भर नहीं भूलूंगी ......।”
उसने मेरी बात गंभीरता से सुनी फिर उसके चेहरे पर एक मुस्कान उभरी, बोला! तो ठीक है रमेश बच जायेगा, “मैं” दूगां ऑपरेशन का पूरा खर्च, मगर एक शर्त है।”
क्या?”
बस् एक रात मेरे साथ गुजार लो!”
सुनकर “मैं” स्तब्ध रह गयी। यह गोपाल ही है क्या?.....
शराफत का चौला उतार फैंका था उसने ....किसी मर्द के साथ एक रात गुजारना मेरे लिए कुछ नया नहीं था। लेकिन फिर एक नये मर्द का स्पर्श, मेरी मानसिकता और “मैं” इसे कबूल नहीं कर सके!”
लेकिन  - हाँ! कलेंडर की रुकी हुई तारीख पर मेरी निगाहें टिकी थी।”
वह फैसले की घड़ी थी।”
रमेश बच सकता है डॉक्टर ने कहाँ था”
अगर ऑपरेशन के खर्च की व्यवस्था हो जाए तो रमेश बच सकता है।”
लेकिन, ..... रमेश सब कुछ जानता था मेरे बारें में, मेरा अतीत उससे छिपा नहीं था। शायद, उसने मेरा हाथ पकड़कर कहाँ था मुझसे ...”
प्रीति ...वादा करो, अब से तुम्हारा शरीर, तुम्हारी आत्म सिर्फ़ मेरी है .....”
मैंने अपने आंसुओं को आँखों में रोक कर, उसके गले में बाहें डाल कर कहाँ था, हाँ! मूझे कबूल है।”
“मुसलमान लड़कियाँ, निकाह के समय यहीं तो कहती है सुना था मैंने?”
गोपाल कह रहा था... “बोलो प्रीति, मेरी शर्त मंजूर है तुम्हें?...”
ज़िन्दगी में “मैं” पहली बार किसी बात की चुभन महसूस हुई मुझे”
न जाने कैसे मेरा हाथ हवा में लहराया और जोरदार थप्पड़ की आवाज़ के साथ जड़ गया गोपाल के गाल पर... और “मैं” पलट कर भागी अस्पताल की ओर..... “
कहाँ गिरी थी बेहोश होकर, अस्पताल की सीड़ियों पर या डॉक्टर के पैरो पर या रमेश  की देह पर... पता नहीं...।
बस् कलेंडर में एक तारीख अंकित हो गई थी। “मैं” रोक सकती थी इस तारीख को....
वर्षों गुजरने के बाद भी फैसला नहीं कर सकी हूँ कि गोपाल की बात न मान कर रमेश को मौत में ढकेल दिया है या गोपाल के गाल पर तमाचा मार कर रमेश के विश्वास की लाज रखी है।”
फैसला नहीं कर पाने का दर्द है सीने में, सांसे रुकने लगती है जब यह तारीख... रमेश की मौत की तारीख बनकर उभर आती है कलेंडर के विशेष पन्ने पर...”

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