रविवार, फ़रवरी 09, 2020

धर्म


धर्म को बेच रहे हैं,
धर्म को मनाने वाले,
इन्सान को बेच रहे हैं,
इन्सानियत के रखवाले,
धर्म अब मुद्रा संचय का माध्यम,
चित, चैन और मोक्ष का द्वार,
फूलों की महक में रहते हैं,
मुद्रा के घेरे में बसने वाले,
क्या वह ही हैं,
भारत के सन्यासी जन,
धर्म दार्शनिकता की सीढ़ी, 
और, संस्कृति का एक हिस्सा है,
अब धर्म केवल धर्म नहीं,
दिखावे और फैशन का हिस्सा नहीं,
मैं उस धर्म का मानने वाला हूँ,
जिसमें पैसे वालों की संख्या,
कुछ ज़्यादा है,
वो मेरा ही ख़ुदा है,
जिसने आज तक,
इस ज़मीन को रखा हैं थामकर,
वरना धर्म को गाली देना,
अनर्थ का भागीदार होना है,
पानी को कुछ जल कहते हैं,
कुछ अमृत, वारी आदि कहकर,
घूट भर लेते हैं,
और धर्म की तरह,
उसे भी पचा जाते हैं।

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