शनिवार, फ़रवरी 08, 2020

एकान्त (Solitary)


एक बार फिर एकान्त उभरा,

मुद्दत के बाद तसव्वुर में कुछ उतरा,

पौथियाँ पढ़ते गये, 

आगे बढ़ते गये,

न जाने कौन सी गर्त में,

हम धसते चले गये,

दुनिया कहती है,

हम बढ़ रहे हैं,

लेकिन ख़ुद हम,

तिल-तिल कर मर रहे हैं,

मैंने भी ख़्वाब में देखी थी,

चाँदनी सी शांत ज़िन्दगी,

तौला-तौला करके,

ज़मीर को बेचती जा रही,

ये ज़िन्दगी,

यूँ ही मुद्दतें गुज़र गयी, 

तेरा ख़्याल भी नहीं,

ज़िन्दगी किस रास्ते पर,

कोई मंज़िल ही नहीं,

कीट पंतगों की सरसराहट,

झींगुर के चीख़ने की आवाज़़,

दूर तक फैला अधियारा,

और बाढ़ का मंज़र,

न जाने किस मंज़िल पर ले आया है,

जहाँ केवल एकान्त...

एकान्त... एकान्त... एकान्त।

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें

Please do not enter any span link in the comment box.