शुक्रवार, फ़रवरी 21, 2020

टूरिस्ट गाइड


वृक्षों की छाया,
पत्तों पर बून्दें,
पत्थर के टुकड़े,
जीवन के रास्ते,
सब कुछ यहीं हैं,
बस यहीं लेकिन,
घाटी का मानव,
अजनबी लगता है,
अपने गाँव में,
पश्चिम की सभ्यता और लिबास,
आज छा गया है,
गाँव के पटल पर,
घोड़े हांकते दूध ढोते,
शहरी बाबूओं को रास्ता दिखाते,
ख़ुद भी खो जाते हैं,
भौतिकवादी विचारों में,
इस तरह ललक उठती है मन में,
शायद् ’मैं’ भी शहरी हो जाऊं,
वह लिबास में संस्कृति तलाशता है,
विचार में झाँकने की कोशिश नहीं करता,
शायद!
उसकी सोच को ग्रहण लग गया है,
चलचित्र का पर्दा नज़र आता है,
पीछे क्या कुछ छिपा है,
कोई नहीं जानता,
पर्वत मालाओं के पार भी,
समतल दरिया और पर्वत हैं,
लेकिन जो मुझे नज़र आते हैं,
वह हरियाली से हरे नहीं हैं,
वो भी संस्कृति के लिए,
बस टिके हैं कुछ दिन ओर।

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