शुक्रवार, फ़रवरी 14, 2020

प्यार और इन्तजार

आज फिर वही बैचेनी, वही उतावलापन, सांसों में भी किसी के आने का एहसास, हवा के झोके में कोई आता, कोई जाता मगर “मैं” वही पुस्तकालय की कुर्सी पर बैठा किताब खोलकर नज़रो में इंतजार हर पल आहट, बैचेनी सी हालत, आखिर बैठा नहीं गया और “मैं” उठकर बाहर आ गया, ठंड़ा पानी पिया, अपनी इंतजार की ज्वाला को शांत करना चाहा, फिर जाकर पुस्तक पढ़ने लग गया। समय जैसे चलने को ही नहीं कह रहा हो, सांसें भी इंतजार में रुक गयी, पूरा पुस्तकालय एक सुनसान जगह लग रही थी, बस पंखों की खटखट की आवाज़ जो सरकारी इमारत होने का अपना परिचय दे रहे थे। नज़रें कभी बाहर की तरफ देखती, तो कभी घड़ी की तरफ, जिस समय का इंतजार था वह भी दिल को हिला डुलाकर, बैठ बैठाकर, सहमा-सहमा सा लग रहा था कि कब आ जाए। तब “मैं” कैसे उसका सामना करूँगा। कुर्सी अपने आप हिल रही थी जैसे भूकम्प के आने से पृथ्वी में कम्पन सा आ जाता है। मौसम बसंत का और महीना फरवरी का था, फिर भी मुझे पसीने आ रहे थे, कि न जाने कौन सी बड़ी घटना घटने वाली है। आखिर यह ताप स्वयं ही हल्का होता गया, मन पर मानों कोई पहाड़ टूट पड़ा हो क्योंकि समय इंतजार को पार कर दूसरी ओर पहुँच चुका था, दिन के ढलने से सूर्य दूसरी ओर पहुँच जाता है और दिन के ढलने के साथ ही एकान्त मन में शाम की उदासी का आलम आ जाता है। शरीर कुछ भारी व थकापन महसूस करने लगता है और आराम की तलाश में मानव घर की ओर कदम रखता है। “मैं” उठकर जलपान गृह गया कुछ हल्का खाने के लिए, एक कॉफी का प्याला लिया और सोचते-सोचते ही “मैं” ने सब कुछ खाया पिया।

“मैं” चल दिया उस ही रास्ते से जिसमें उसके आने की आशा थी। मगर कदम और मन अब भी इंतजार के लिए आतुर था। “मैं” बार-बार मुड़कर देख रहा था। मन अपने को कोसता जा रहा था, कोई क्यों आयेगा? तुझे इंतजार क्यों है? किसका किस पर जोर है? कोई पागल है क्या? आखिर तू है क्या, तेरे पास क्या है बस् ये डिग्रियां जो कागज़ पर दो अक्षर है, कौन पूछता है? इनकी क्या कीमत है? यह आधुनिक युग है, यह राजधानी है, किसी से भी पूछो तो कहेगा बी. ए. की डिग्री ली है, मास्टर के लिए तैयारी है, इस सवालों में फसा मन मानों एक मोमबत्ती की तरह पिघलता गया और एक आखिरी ढेर सां रह गया जिसमें घागा नहीं होता और वह अब जल नहीं सकता वहीं हालत थी मेरी।
काश वह आ जाती बेशक दो पल के लिए ही सही, फोन पर क्यों उसने आने को था। क्या मजबूरी थी जो नहीं आयी, कौन सा लगाव था जो उसने मुझसे आने को कहा था, मना क्यों नहीं किया था। बस कुछ ही पल में मन अपने ठिकाने पर आ जाता, कम से कम उसमें उठे भूचाल और दर्द का तो इतना लम्बा सफर तय नहीं करना पड़ता।

“मैं” एक छोटा सा प्राणी और उसमें उठे इतने बड़े-बड़े गम के सागर, टुटते पहाड़, उठती आंधियां, सब कुछ तो बेगाना सा लग रहा था। बेजान से चलते इंसान, खिलौनो सी धूमती मोटर गाड़ियां, राहे सूनी-सूनी, पेड़ जैसे शोक में रो रहे हो, उन्हें भी इंतजार था मगर वह सब समय की बाढ़ के साथ बह गया है। शाम अब नजदीक थी। शाम ने मेरे मन की परतों को प्याज की तरह उतारना शुरू कर दिया। उस दिन ये तू ही था या कोई और जो दूसरे को अपनी और बुलाया था या खूद गया था उसकी और। तब तो गधे वाली कहावत नज़र नहीं आ रही थी कि वह सावन में कमजोर व ज्येष्ठ में मजबूत होता है, एक गधे से भी कम अक्ल, गधा अधिक हरियाली देखकर थक जाता हैं कि यह सब इतना कुछ मेरे लिए नहीं है, वह कम खाता है। काश “मैं” भी उसको अपनी और आता देखकर रूक गया होता कि इतनी खुशी जो मुझे उस वक्त मिल रही थी। वह मेरे लिए नहीं थी। जो “मैं” कम प्रसन्न रहा होता तो मन आज जो दु:ख महसूस कर रहा हूँ शायद बच जाता।

तब तो चमन मेरा था “मैं” चमन का, हर खुशी मेरी ही मेरी नज़र आ रही थी मगर “मैं” भूल गया था कि बहार के बाद पतझड़ भी आता है। जो बहार से कहीं ज्यादा डरावना और भयभीत करने वाला होता है। सब कुछ उजड़ जाता है, चमन आज मुझे आज उजड़ा उजड़ा सा लग रहा था। वह पहला पल जब उसने मुझे धीरे से आकर कहा था, क्या कर रहे हो! तब “मैं” स्तब्ध रह गया था कि यह हकीकत है या कोई सपना, अलौकिक शक्ति का किया आश्चर्य है। “मैं” अपनी जुबान को मुश्किल से संभाल  पाया था, मल्लाह नाव को संभालतें हुए कहता है कि साहब डरियें मत हलका-फुलका तो चलता रहता है पानी और नाव के बीच में। मेरी जुबान के बोल गले में लगभग फस गये थे, न बाहर आ रहे थे, न अंदर जा रहे थे। बस् “मैं” ने हाँ में अपनी गर्दन हिलायी और टकटकी लगाकर उसकी ओर देखता रहा।

हम दोनों एक ही कक्षा में पढ़ते थे। वह धीरे से फिर कहने लगी आज का लेक्चर कैसा था “मैं” ने पहले कुछ देर तक सोचा, उसकी तरफ ध्यान से देखा कि वह जवाब से ज्यादा मेरे मौन वृत को तोड़ने की कोशिश कि जा रही है। “मैं” बोला वह हमें पढ़ा नहीं रही थी बच्चे पालने सीखा रही थी। बच्चों को स्कूल भेजा करों, स्टेडियम भेजो, खिलाड़ी बनाओं, मेरा तो मन हुआ था। कहूँ आप हमें भाषा विज्ञान पढ़ा रही है या बच्चे पालने के तौर-तरीके सीखा रही है।
“मैडम हमें कुछ बातें परिवार के बारें में बता रही थी क्यों आप परिवार में विश्वास नहीं रखते? मेरी तरफ सवाल करते हुए पूछा। परिवार और “मैं”, अभी तक तो “मैं” ने परिवार की कल्पना नहीं की, हम है ना आप परिवार बना डालो कल्पना की बात छोड़ों।

खैर हम बातें करते करते ही हमनें बस पकड़ ली लेकिन न जाने क्यों मुझे बस में उस वक्त उसके अलावा कोई नज़र नहीं आ रहा था। देखते ही देखते, नज़रों में नज़रें डाले हमने बस का सफ़र पूरा किया। जब उसके उतरने का स्थान आ गया। “मैं” सोच ही रहा था कि उसने अपना हाथ आगे बढाया, अगले दो दिनों के बाद मिलनें के वादे के साथ। मगर मेरा मन था कि अलग होने को तैयार ही नहीं था लेकिन मन का क्या वो कब दिखता है कि उसकी तख्ती पर क्या लिखा है। “मैं” ने भी हाथ आगे किया और विदाई ली। “मैं” ने जीवन में हाथ तो बहुत बार, बहुत से लोगों से मिलाया था मगर उस दिन कुछ अलग सा एहसास था, अपनी आत्मा को किसी अपनी सी आत्मा में समा जाने का अनुभव महसूस किया।

“मैं” आन्नद लेते हुए, मन में उठे भावों में भीगता हुआ, कल्पनाओं में हिलारे लेता, अपने घर की ओर बढ़ा। घर मुझे उत्सव भवन सा लग रहा था, दिवारें भी हंसती नज़र आ रही थी, सारा आल्म उल्लास से भरा था, मेरे पैर ज़मीन कहीं-कहीं टिकते, सब कुछ अपना लग रही था, हर पल उसका चेहरा, उसकी बातें, उसकी हंसी और मजाक भरे शब्द मुझे बार-बार स्मरण हो रहे थे। “मैं” ने अब तक के जीवन में संगीत को न के बराबर ही सुना था मगर उन दिनों गीत, गज़ल, संगीत, ताल, लय, सब कुछ मधुर लक रहा था। संगीत बार-बार सुनने को दिल चाह रहा था। इसी उधेड़ बुन में एक दिन-रात गुजर गये। 

दूसरे दिन “मैं” ने उसको फोन करना चाहा या आप यूँ कह लें कि उसकी आवाज सुनने को “मैं” बेताब था बडी हिम्मत जुटा कर “मैं” ने फोन नम्बर जो मेरी डायरी में लिखा था निकाला और उसको बार-बार पढ़ा। उसकी आवाज इन सात अंको में से होकर मेरे कान से होती हुई मेरे मन तक पहुँच जाएगी। मूरत तो “मैं” सामने की ओर नज़रे बन्द करके बना लूँगा, नब्बे के दशक का प्यार। मगर फोन मिलाने से पहले की हालत बिल्ली के घंटी बांधने वाले चूहे जैसी थी। शरीर में कम्पन अनायास ही उत्पन हो रहा था, सामने कोई शेर, व्यक्ति या अन्य शक्ति तो थी नहीं, था तो फोन ही, मगर न जाने कौन सा डर था जो नम्बर मिलाने से पहले ही पसीने के छूटने को देख रहा था कि तू छूट, “मैं” देख रहा हूँ। फिर भी हिम्मत करके फोन का रिसीवर उठा ही लिया, नम्बर लगाया तो उधर से आ रही घंटी के साथ साथ हालत खराब होती जा रही थी। दिल की धड़कन लगभग सौ प्रति सैकेंड लग रही थी। न जाने फोन कौन उठाये, क्या कहूँगा? कौन हूँ? किससे बात करनी है? क्यों करनी है? क्यों  किया फोन, सवाल दर सवाल अपने आप लहरों की तरह मन के तट पर आकर टकराते जा रहे थे।
हैलो... खैर शुक्र है उधर से आवाज़ तो आयी।
’’हैलो...’’
’’जी...’’
’’आप कौन बोल रहे है...’’
’’अजी...’’
’’“मैं” बोल रहा हूँ... ’’
’’ओ... हो... कैसे याद आ गयी, “मैं” तो सोच रही थी कि आप के पास कहाँ समय होगा, जो मुझे फोन करोगे, आप ठहरे किताबी कीड़ा, खैर चलो!, हमारी याद तो आयी... कैसे हो, क्या कर रहे हो...’’
’’उधर से सवालो की बौछार, “मैं” अपना पसीना पोछने लगा, चलो सही वक्त पर फोन किया जो वह ही मिल गयी।’’
’’ हैलो..’’
’’कुछ देर पहले तक मन में बहुत बड़ी-बड़ी बातें करने की इच्छा थी। लेकिन अब मन कुछ हलका सा लग रही था।...’’
’’हाँ!... आप सुनाओ क्या कर रही हो, ’’
’’यार... कुछ भी नहीं घर में, बस् चूं-चूं में ही सारा वक्त निकल जाता है। कोई खास नहीं...’’
’’“मैं” यार शब्द सुनकर, जो “मैं” ने जीवन में किसी लड़की से पहली बार सुना था सुनकर सुन्न हो गया... “मैं” शहरी सभ्यता से कहीं दूर दराज में बसे एक गाँव का रहने वाला था। “मैं” जिस माहौल में पल कर आया था उसमें लड़की किसी लड़के को यार कहें मेरे लिए नयी बात थी। जो “मैं” सून रहा था...उधर से..’’
’’हैलो... हैलो... की आवाज़ आ रही थी, क्या कोई पास में है क्या?... फोन के पास ही हो या ... ’’
’’नहीं कोई, नहीं...’’
’’आखिर चुप क्यों हो गये...’’
’’यूं ही, सोच रहा था कि तुम भी...’’
’’“मैं” भी... ठीक है, हम भी’’
’’फिर कल आ रहे हो ना....’’
’’आप बुलाए और हम न आयें, ये हो सकता है क्या? ...’’
’’यार तुम भी... अजीब हो... मुझे पुस्तकालय में एक किताब वापिस करनी है और दूसरा कार्ड भी घर पर रखा है। उस पर भी किताब लेनी होगी... एक काम कर दो तो आपकी बड़़ी मेहरबानी होगी, आपको पुस्तकों की व्यवस्था का पता है, वही तो पडे रहते हो, कम से कम उसका तो फायदा उठाया जाए। मुझे गालिब पर कुछ काम करना है, दीवान-ए-गालिब को ढूढकर रखना, “मैं” ग्यारह बजे वहाँ पहुँच जाऊगी, पक्का “मैं” इंतजार करूंगी, भूल न जाना, अच्छा.., तो फिर कल... बाय...’’

’’मेरे कान में बाय बाय .. बार-बार गूंजती रही। वह अभी विदाई ले रही हो, “मैं” आने वाले कल की, होने वाली घटनाओं की विषय सूची तैयार करने लगा कि कब कैसे और क्या-क्या करेगें हम आपस में मिल कर.... आज बीस साल तक “मैं” उसका इंतजार कर रहा हूँ जो ग्यारह बजे से लेकर रात के ग्यारह बज चुके है।

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