मंगलवार, फ़रवरी 11, 2020

विश्व गुरु

जब आँख खुलती है,
प्रभुगान की आवाज़ नहीं आती,
जोर-जोर से उच्च स्वर में,
दहकती जलती आत्माओं की आवाज़,
किस तरह फैलती जा रही है,
अनुमान अब मानव को नहीं है,
पृथ्वी पर फैलते खण्डहरों की तरह,
आवाज़ें भी खण्ड़र हो गयी हैं,
कौन किसके क़िले को पुछेगा,
कौन गढ़ का गान गायेगा,
क्योंकि अब तो,
मैं, मैं..... में ही,
वक़्त निकला जा रहा है,
कब्रगाह और शमशान में,
फर्क़ कोई ज़्यादा नहीं है,
मानव की सोच की उपज ही,
उपस्थित होती है इनके दरमियांँ,
और मानव इंसानियत से बाहर,
हैवानियत पर हावी होता जा रहा है,
जीवन एक अनमोल धरोहर नहीं है,
न किसी की सेवा को समर्पित है,
सेवा में ......
आशीर्वाद रहा, न अब सेवाभाव,
क्योंकि भाव की तुलना अब,
भावनाएँ नहीं करती,
करता है एक बोल.....
जो विश्व माथे पर उभरा है,
बनकर एक कलंक।

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