रविवार, मार्च 29, 2020

कर्मकाण्ड़

एक लड्डू,
एक दूब,
एक मैं,
तैयार हैं लगाने को,
कुछ हल्दी,
कुछ चावल,
कुछ आटा,
तैयार हैं लगाने को,
एक थाल,
एक साथ,
एक लौटा,
तैयार हैं लगाने को,
एक पंड़ित,
एक कथा,
एक श्रोता,
तैयार हैं लगाने को,





















भोग विलासिता का,
तिलक संस्कृति का,
अपने कर्मकाण्ड़ों का,
लेकिन ’मैं’,
अपनी काया,
अपना माथा,
अपना सिर,
रख आया हूँ,
एक ढाबे वाले के यहाँ,
क्योंकि मैंने उधार में,
पेट को संतृप्त किया,
भूख कृति है,
संस्कार विकृति का फल,



















इसीलिए ’मैं’,
अयोग्य हूँ,
यज्ञ के लिए।

भूख


चमगादड़ की तरह,
उलटा लटका हुआ है,
आज का इन्सान,
मात्र रोटी के टुकड़े के लिए,
दर-दर की ठोकरें झेलता है,
मात्र दो जून रोटी के लिए,
वह पहाड़ से दरिया तक,
खदान से मंज़िल तक,
घर से श्मशान तक,
करता है सफ़र,
मात्र दो टूक रोटी के लिए,


















वैसे भूख कोई पाप नहीं,
आदर्शों को भूल कर,
अस्तित्व को खोकर,
इन्सान पेट के बल लेट रहा है,
शायद, दब जाये भूख,
इस तरह औंधे पसरने से,
लेटने से,
भूख इन्सान को खा जाती है। 

बुधवार, मार्च 25, 2020

लॉकडाउन

इन्सान ने जंगलों में पहले घर क्या बनाया,
फ़िर कुटुंब को मिलकर एक मोहल्ला बसाया,
सबने मिलकर गाँव खड़ा किया अपने तरीक़े से,
गाँव तक तो गनीमत थी इन्सान के विकास की,
इन्सान, जानवर और कुत्ते एक साथ रह सकते है।  



इंसानों ने सभ्य होने के लिए एक शहर क्या बसाया,
सब कुछ बदल डाला मशीन के हवाले कर दी ज़िन्दगी,
इन्सान ने खूद को खूद से आज कितना दूर कर किया,
जंगल में भी कुदरत का खेल इन्सान ने कई बार देखा है,  
शहर ने तो कई बार इन्सान की तक़दीर बदलकर रख दी है।  

लोगों ने शहर में इलाज़ का दवाखाना क्या बनाया,
अब गाँव जा रहें हैं भीड़ से अलग-थलग होने के लिए,
सवाल उनकी ज़िन्दगी का है आखिर हम बचें तो कैसे,
किसको छू सकता हूँ मैं आज बिना डर और भय के,
लालच ने इंसानियत की सारी हदों को पार कर दिया है।

कुत्ते, बिल्लियाँ, गधे, घोड़े, गाय, भैस जाने कौन-कौन,
जंगल से बस्ती फ़िर बस्ती से गाँव और शहर चले आये,
यह बेचारे जीव अब लॉकडाउन की स्थिति में क्या करें,
क्या कोई इनके खाने के बारें में भी विचार करेगा आज,
जंगली मित्रों पर इन्सान सदियों से निर्भर रहा हैं और रहेगा।

बुधवार, मार्च 18, 2020

समाधान


किस का समाधान है,
कौन सी है समस्या,
यहाँ तो हर ओर उठा है,
एक ही सवाल या बवाल,
समस्या का समाधान नहीं,
केवल साधन है यहाँ तो,
साध्य को खाता ही समाधान है,
नये पैतरे ओर नये दाँव लगाने हैं,
मुझे भी कुछ नयी आज़माइशें करनी है,














हर ओर उठे है हाथ,
हाथों के लिए, लेकिन,
जिस के लिए उठे है,
उसे अपाहिज कर दिया है,
समाधानों ने उसे लकवा कर दिया है,
वह चाहता भी है बोलना लेकिन,
नेताओं ने उसकी आवाज़ छीन ली है,
तुम तो ग़रीब हो,
हम तुम्हारी सहायता करेंगे,
तुम्हारे नाम से एक संगठन जो बनाया है,
वही समाधान है जो हम करेंगे,
वरना् देश में समस्याओं का बाज़ार गर्म है,
समाधान समस्या का नहीं है,
समाधान तो केवल जनता का है,
जो परेड ग्राउड़ में तुम देखोगे,
जो हम करेंगे वो तुम देखोगे,
इस दुनिया को बदलेगें,
तुम को भी बदलेंगे,
लेकिन हम नहीं बदलेंगे,
क्योंकि हम संभ्रांत है,
समस्याएँ हल करते हैं,
पैदा नहीं।

शुक्रवार, मार्च 13, 2020

बस्तियाँ और संगठनकर्ता

हमारी बस्ती में,
क्यूँ खलबली मची है,
एक बूँद पानी के लिए,
रात यहाँ गोली चली है,















कल फिर मंथन होगा,
उस के लिए रखी है बैठक,
हर किसी को अपना अस्तित्व,
अपनी हिस्सेदारी को तलाशना है,
वह बोलना ज़रूर चाहता है,
अनुभव से लेकर अनुमान तक,
लेकिन वह किस का अनुसरण करेगा,
बस यही एक सवाल है,
मेरी संगठन में ज़िम्मेदारी है,
उसकी जनता में पहुँच है,
कुछ काम तो बहुत करना चाहते हैं,
नये अंकुर को कौन सींचना चाहता है,
’मैं’ केवल देखना चाहता हूँ,
लोग कर क्या रहे हैं,
हर बैठक का ’मैं’ भी हिस्सा हूँ,
भागीदार हूँ इस भागीदारी में,
प्रजातंत्र के अर्थ को खोजता हूँ,
हर सभा और सेमिनार में,
क्योंकि काफ़ी लम्बी चर्चा रखी गयी है,
पिछले दो सत्रों से कुछ मिला नहीं,
जो मिला वह प्रजातांत्रिक मुझे तो नहीं लगा,
यहाँ प्रजा भी है तंत्र भी है,
सवाल भी है जवाब भी है,
लेकिन मान्यता किसकी होगी,
कल इसी के लिए ही तो चर्चा रखी है। 

रविवार, मार्च 08, 2020

Happy Women's Day

The Gurus actively encouraged the participation of women as equals in worship, in society, and on the battlefield. They encouraged freedom of speech and women were allowed to participate in any and all religious activities including reading of the Guru Granth Sahib, Guru Nanak, Raag Aasaa, Page 473- 
ਸੋ ਕਿਉ ਮੰਦਾ ਆਖੀਐ ਜਿਤੁ ਜੰਮਹਿ ਰਾਜਾਨ ॥
“why call ‘her’ inferior? From her, the Kings are born”  ~ Guru Nanak dev

From woman, man is born;
within woman, man is conceived;
to woman he is engaged and married.
Woman becomes his friend;
through woman,
 the future generations come.
When his woman dies, 
he seeks another woman;
to woman he is bound.
So why call her bad?
From her, kings are born.
From woman, woman is born; 
without woman, 
there would be no one at all.

शुक्रवार, मार्च 06, 2020

गाँव और होली

वहाँ मेरे बचपन के दिन,
धूल और रेत मे उड़ता मेरा यौवन,
स्मृति सी मातृभूमि मेरी,
एक अचल पावन सा पिता मेरा,
अबुझ सी बहती माँ मेरी,
उस टूटी-टटर झोपड़ी में,
मेरे बचपन के सिक्के छिपे हैं,
जो इतिहास की तरह,
मेरा मेहमान दे गया था,
कुछ पल,
कुछ दिन गुज़ारूंगा ’मैं’,
एक दशक हो गया,
गाँव की सुगन्ध लिए,
पगड़ंड़ियों में घूमती,
दोस्तों की टोलियाँं,

























आख़िर कुछ तो,
चैन से वक़्त गुज़ारूंगा,
नहीं तो कह देंगे,
हो गया शहरी बाबू तू,
वो फ़ाग की चाँदनी,
गाँव से दूर होते हम,
आधी रात गये देर रात गये,
घूमते उन खुली वादियों में,
जिसमें मित्र चाँदनी,
सितारे और ’मैं’,
उठा लेते हैं लक्कड़,
रख देते होली पर,
आने ही वाला है दिन,
रंग और रंगीलियों का,
इस बार ’मैं’ मित्रों के साथ पिऊँगा,
बार में बार-बार पीकर थक गया हूँ,
आज ’मैं’ गाँव में आकर,
अपनी सी सुगन्ध में खो गया हूँ,
ज़रा जोर से नगाड़े बजाओ,
’मैं’ दो चार होलियाँ,























गाने के मूड़ में हूँ,
’मैं’ अपनों से मिलकर,
गाने के मूड़ में हूँ।

अदृश्य ऋतु

ओ री!
अदृश्य ऋतु,
आच्छादित ऋतु,
कब उजागर होगी,
तू पार क्षितिज के,
विस्तृति होगी,
कौन दिवस होगा,
जो बढ़ती-बढ़ती,
बहके क़दमों से,
शिथिल जीवन को,
तू दे पायेगी,
अपार संचित वो मुद्रा,
कितना जोड़ा होगा,
क्या-क्या संजोया होगा,
एक तेरे जीवन का,
मधुरस रस मधु होगा,
किस अम्बर में,
फैली होगी निर्मल छाया,
कौन दिशा की तुम वासी,
कौन है तेरी प्रिय सखी,
ओ री अद्रश्य ऋतु,
आच्छादित ऋतु।

सोमवार, मार्च 02, 2020

जायज़

यहाँ सब जायज़ नहीं,
न किसी पर पाबंदी नहीं,
खुलकर न बोल सके,
मौन रहकर न जी सके,
बस ओर कोई क़ैद नहीं है,
बंधा अपने ही हाथों से,
क़दम क़दमों से बहार,
चैन नहीं चित में है,
वैसे तुम आज़ाद हो,
आशियां रहने को नहीं,
अवटी एकांत में नहीं,
सारा जहाँ अपना है,
मगर कोई घर है,
गमों में ख़ामोश भी,
ज़माना न रहने दे,
जलते को जलाते हैं,
आग कोई बाक़ी नहीं,
तन साथ भी रहे,
मन कहीं ओर रहे,
चित को चैन कहाँ है,
यहाँ मौन कौन है,
आबाद कौन पाया है,
मौज़ में कौन देखा है,
सब कुछ मुफ़्त है
बस!
यहाँ सब जायज़ नहीं।