शुक्रवार, मार्च 06, 2020

गाँव और होली

वहाँ मेरे बचपन के दिन,
धूल और रेत मे उड़ता मेरा यौवन,
स्मृति सी मातृभूमि मेरी,
एक अचल पावन सा पिता मेरा,
अबुझ सी बहती माँ मेरी,
उस टूटी-टटर झोपड़ी में,
मेरे बचपन के सिक्के छिपे हैं,
जो इतिहास की तरह,
मेरा मेहमान दे गया था,
कुछ पल,
कुछ दिन गुज़ारूंगा ’मैं’,
एक दशक हो गया,
गाँव की सुगन्ध लिए,
पगड़ंड़ियों में घूमती,
दोस्तों की टोलियाँं,

























आख़िर कुछ तो,
चैन से वक़्त गुज़ारूंगा,
नहीं तो कह देंगे,
हो गया शहरी बाबू तू,
वो फ़ाग की चाँदनी,
गाँव से दूर होते हम,
आधी रात गये देर रात गये,
घूमते उन खुली वादियों में,
जिसमें मित्र चाँदनी,
सितारे और ’मैं’,
उठा लेते हैं लक्कड़,
रख देते होली पर,
आने ही वाला है दिन,
रंग और रंगीलियों का,
इस बार ’मैं’ मित्रों के साथ पिऊँगा,
बार में बार-बार पीकर थक गया हूँ,
आज ’मैं’ गाँव में आकर,
अपनी सी सुगन्ध में खो गया हूँ,
ज़रा जोर से नगाड़े बजाओ,
’मैं’ दो चार होलियाँ,























गाने के मूड़ में हूँ,
’मैं’ अपनों से मिलकर,
गाने के मूड़ में हूँ।

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