सोमवार, मार्च 02, 2020

जायज़

यहाँ सब जायज़ नहीं,
न किसी पर पाबंदी नहीं,
खुलकर न बोल सके,
मौन रहकर न जी सके,
बस ओर कोई क़ैद नहीं है,
बंधा अपने ही हाथों से,
क़दम क़दमों से बहार,
चैन नहीं चित में है,
वैसे तुम आज़ाद हो,
आशियां रहने को नहीं,
अवटी एकांत में नहीं,
सारा जहाँ अपना है,
मगर कोई घर है,
गमों में ख़ामोश भी,
ज़माना न रहने दे,
जलते को जलाते हैं,
आग कोई बाक़ी नहीं,
तन साथ भी रहे,
मन कहीं ओर रहे,
चित को चैन कहाँ है,
यहाँ मौन कौन है,
आबाद कौन पाया है,
मौज़ में कौन देखा है,
सब कुछ मुफ़्त है
बस!
यहाँ सब जायज़ नहीं। 

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