शुक्रवार, मार्च 13, 2020

बस्तियाँ और संगठनकर्ता

हमारी बस्ती में,
क्यूँ खलबली मची है,
एक बूँद पानी के लिए,
रात यहाँ गोली चली है,















कल फिर मंथन होगा,
उस के लिए रखी है बैठक,
हर किसी को अपना अस्तित्व,
अपनी हिस्सेदारी को तलाशना है,
वह बोलना ज़रूर चाहता है,
अनुभव से लेकर अनुमान तक,
लेकिन वह किस का अनुसरण करेगा,
बस यही एक सवाल है,
मेरी संगठन में ज़िम्मेदारी है,
उसकी जनता में पहुँच है,
कुछ काम तो बहुत करना चाहते हैं,
नये अंकुर को कौन सींचना चाहता है,
’मैं’ केवल देखना चाहता हूँ,
लोग कर क्या रहे हैं,
हर बैठक का ’मैं’ भी हिस्सा हूँ,
भागीदार हूँ इस भागीदारी में,
प्रजातंत्र के अर्थ को खोजता हूँ,
हर सभा और सेमिनार में,
क्योंकि काफ़ी लम्बी चर्चा रखी गयी है,
पिछले दो सत्रों से कुछ मिला नहीं,
जो मिला वह प्रजातांत्रिक मुझे तो नहीं लगा,
यहाँ प्रजा भी है तंत्र भी है,
सवाल भी है जवाब भी है,
लेकिन मान्यता किसकी होगी,
कल इसी के लिए ही तो चर्चा रखी है। 

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