रविवार, मार्च 29, 2020

भूख


चमगादड़ की तरह,
उलटा लटका हुआ है,
आज का इन्सान,
मात्र रोटी के टुकड़े के लिए,
दर-दर की ठोकरें झेलता है,
मात्र दो जून रोटी के लिए,
वह पहाड़ से दरिया तक,
खदान से मंज़िल तक,
घर से श्मशान तक,
करता है सफ़र,
मात्र दो टूक रोटी के लिए,


















वैसे भूख कोई पाप नहीं,
आदर्शों को भूल कर,
अस्तित्व को खोकर,
इन्सान पेट के बल लेट रहा है,
शायद, दब जाये भूख,
इस तरह औंधे पसरने से,
लेटने से,
भूख इन्सान को खा जाती है। 

9 टिप्‍पणियां:

  1. इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.

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  2. आपकी लिखी रचना ब्लॉग "पांच लिंकों का आनन्द" में मंगलवार 31 मार्च 2020 को साझा की गयी है......... पाँच लिंकों का आनन्द पर आप भी आइएगा....धन्यवाद!

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  3. सही है सर ,यह भूख बडी जालिम चीज है ..।

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  4. शुक्रिया शुभा जी, सच में भूख इंसानों को खा जाती है।

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  5. बहुत सुन्दर सटीक एवं मार्मिक सृजन।

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  6. शुक्रिया सुधा देवरानी जी, इन्सान पेट के बल लेट रहा है, भूख के लिए।

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