रविवार, अप्रैल 19, 2020

विज्ञान का जानकार


तू इन्सान था कल तक,
आज याद बन गया है,
कौन-कौन से लम्हें भूलें,
तेरी कौन सी बात याद करें,
एक पहेली की तरहा तू था,
अब तो एक सवाल बन गया है,
इन्सानों में इन्सानियत खोजता,
तू दुनिया में घूमता रहा,
विज्ञान का तेरा करीब से नाता था,


















तू उसी से मात खा गया,
बहता ख़ून उजड़ती दुनिया,
तेरा सपना बच्चों की बहतर दुनिया,
ज्ञान हर घर तक जायेगा,
अन्धकार दुनिया से मिटेगा,
तू हमेशा कहता था हमसे,
समझो और दुनिया को समझाओं,
इन्सानों का संगठन बनाओं,
जो प्यार करें इन्सान से,
चाटूकार और दलालों की दुनिया,
बड़ी सीमित और संकरी है,
तुम आवाज़़ को आवाम तक ले जाओ,
मेरा गाँव जो सोया-सोया सा है,
तुम एक बार जगा दो,
दुनिया के हर चेहरे पर मुस्कान ला दो।

गुरुवार, अप्रैल 16, 2020

खैरात

हर शाम यह सोचकर गुजारी हमनें,
अंधेरी रात के बाद नई सुबह होगी।

हम अगर धरती पर आ ही गये तो,
दो जून रोटी की किसी को फ़िक्र होगी।

बहती नदियों और लहलहाती फ़सलों में,
मेहनतकश मज़दूरों की हिस्सेदारी होगी।

कामगारों ने शहर में लाखों घर बना डाले,
हज़ारों लोगों ने खुले में रात गुजारी होगी।
















ज़रूरतमंदों की मदद करते रहो लेकिन,
देश की भूख खैरात से ख़त्म नहीं होगी।

रविवार, अप्रैल 12, 2020

पत्र का जवाब


'मैं' वो पत्र हूँ जिसमें,
भार के अनुपात में,
कटौती कर लगे टिकट,
न भेजने वाले को ग़म,
पाने वाले को इंतज़ार बाक़ी,
डाकघर की अभी रकम बाक़ी,










छुटने को झटपटा रहा हूँ,
कौन होगा,
कै़द से छुटने वाला,
उसे देखने को नज़रें अभी प्यासी,
तृप्त हो जाता हूँ,
देखकर हर चेहरे को,
मुँह फेरकर निकल जाते हैं,
किसी के पास छुट्टे पैसे नहीं,
मेरी कल्पनाओं का,
भार कुछ बढ़ सा गया है,
क्योंकि ’मैं’,
उम्र से कुछ दब सा गया हूँ,
इतना अरसा हो गया,
कागज़ की मियाद पूरी होने को है,
छुटने में अभी जद्दोजहद बाक़ी है,
पता भी मटमैला हो गया,
पहुँचने वाले घर का हुलिया,
कुछ बदल गया,
गली मोड़ और मौहल्ले के,
कुछ इन्सान भी बदल गये,
हर बार गुमनाम इन्सान को,
तलाश कर मुड़ आता हूँ,
चला गया था यहीं कहीं,
ये बोल सुन-सुन थक गया हूँ,
डरता हूँ कि दर्दे-दिल की दास्तां,
लेकर 'मैं',
कहीं रद्दी में न डूब जाऊँ, 
दर्द में डूबे इन्सान को,
होगी उम्मीद आबाद होने की,
और ’मैं’,
यह बोझ लेकर मर नहीं सकता,
समस्त चिट्ठी जाति पर,
आजीवन कलंक को 'मैं',
लगने नहीं दे सकता,
इसी उतार-चढ़ाव में,
'मैं',
किसी के अश्कों को बटोर नहीं सकता,
उसका यह दर्द,
मुझे मरने नहीं दे सकता,
आखि़र 'मैं' पत्र हूँ,
पत्र का जवाब नहीं दे सकता।


शुक्रवार, अप्रैल 10, 2020

'मैं' रोटी खोजता रहूँ

तुम दर्द की कविता लिखों,
'मैं' दर्द को सहता रहूँ,
जन्म से मृत्यु का सफ़र,
तेरे लिए गीत होगा,
अभाव में खोजता रहा,
कहीं कोई आसरा मिलें,
तुम उसमें लय खोजों,
साँस भी कर्ज़ की है,
फेफड़ें छोटे होते गये,
काम पर दम फूलता रहा,
तुम सुर तलाशते रहो,
'मैं' बाज़ार की वस्तु,
फ़िल्म का किरदार,
सरकार की योजना हूँ,
तुम उम्मीद भर रखो,
'मैं' रोटी खोजता रहूँ,












काम के लिए मारा फिरना,
ख़ाली हाथ दर-ब-दर फिरना,
तुम मन की बात करो,
लिपि धर्म के इर्द-गिर्द,
शब्द हो गये सांप्रदायिक,
धर्म स्थान किसके है,
तुम समानता की बात करो।

बुधवार, अप्रैल 01, 2020

राहत सामग्री

तूफ़ान के आने की आशंका,
कुछ कर गुज़रने की आशा,
इकट्ठे कर लिये जायेंगे लोग,
हम चाहते हैं लोगों की भागीदारी,
सुनामी छोड़ गया है सैकड़ों सवाल,
हर ओर उठ रहा है एक ही सवाल,
राहत सामग्री इकट्ठा करो,
पीड़ितों के लिए,
जो इकट्ठा हुआ,
आप हम सब जानते हैं,
पहली बार नहीं आयी आपदा,
न पहली बार इकट्ठा हुए हैं लोग,
लेकिन हर बार ठगा जाता रहा है,
मेरे देश का वो ग़रीब,मज़दूर, किसान,
जब तूफ़ान आयेगा,
मेरी झोंपड़ी ओर,
मेरे देश के कर्णधार,
एक बैठक करेंगे,
हम सबका ये फ़ैसला है,
मंत्री जी के साथ पार्टी अध्यक्ष भी जायेंगे,
पिछले कुछ सालों से यहाँ आँधी तूफ़ान,








न जाने कितने घरों में रोटी का अकाल,
तन न ढक पा रहे हैं मेरे भाई,
लेकिन इस बार पार्टी का फ़ैसला है,
मंत्री जी को जनता के बीच जाना है,
तूफ़ान के लिए,
नया तूफ़ान खड़ा करने।

शांति के लिए अपील


मैंने तुझे रोज़ सुना,
तेरी बातों पर यक़ीन किया,
भरोसे को दिल में रखा,
मेरे पेट की आग,
धीरे-धीरे सुलगती रही,
तुने मेरी ख़ामोशी को,
अपनी ताक़त समझ लिया,
नसों में बहती गुप्त ऊष्मा,
न जाने कब से दबायी,
अपील दर अपील होती रही,




















हाथ मेरे काम माँगते रहे,
मुँह को निवाले का इंतज़ार,
पेट को बीमा नहीं चाहिए,
दो जून रोटी की चिंता,
बच्चे हर रोज़ सुनते है,
तेरे 'मन की बात' से कभी,
मेरे पेट की आग नहीं बुझती।