गुरुवार, अप्रैल 16, 2020

खैरात

हर शाम यह सोचकर गुजारी हमनें,
अंधेरी रात के बाद नई सुबह होगी।

हम अगर धरती पर आ ही गये तो,
दो जून रोटी की किसी को फ़िक्र होगी।

बहती नदियों और लहलहाती फ़सलों में,
मेहनतकश मज़दूरों की हिस्सेदारी होगी।

कामगारों ने शहर में लाखों घर बना डाले,
हज़ारों लोगों ने खुले में रात गुजारी होगी।
















ज़रूरतमंदों की मदद करते रहो लेकिन,
देश की भूख खैरात से ख़त्म नहीं होगी।

4 टिप्‍पणियां:

  1. आपकी लिखी रचना "सांध्य दैनिक मुखरित मौन में" आज शुक्रवार 17 एप्रिल 2020 को साझा की गई है.... "सांध्य दैनिक मुखरित मौन में" पर आप भी आइएगा....धन्यवाद!

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  2. बहुत खूब प्रिय गुरमिंदर जी ! बहुत अच्छा लिखा आपने | रचना का हरेक शेर सराहनीय है | समसामयिक मुद्दों पर चिंतन प्रभावी है |

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