बुधवार, अप्रैल 01, 2020

शांति के लिए अपील


मैंने तुझे रोज़ सुना,
तेरी बातों पर यक़ीन किया,
भरोसे को दिल में रखा,
मेरे पेट की आग,
धीरे-धीरे सुलगती रही,
तुने मेरी ख़ामोशी को,
अपनी ताक़त समझ लिया,
नसों में बहती गुप्त ऊष्मा,
न जाने कब से दबायी,
अपील दर अपील होती रही,




















हाथ मेरे काम माँगते रहे,
मुँह को निवाले का इंतज़ार,
पेट को बीमा नहीं चाहिए,
दो जून रोटी की चिंता,
बच्चे हर रोज़ सुनते है,
तेरे 'मन की बात' से कभी,
मेरे पेट की आग नहीं बुझती।

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