रविवार, अप्रैल 12, 2020

पत्र का जवाब


'मैं' वो पत्र हूँ जिसमें,
भार के अनुपात में,
कटौती कर लगे टिकट,
न भेजने वाले को ग़म,
पाने वाले को इंतज़ार बाक़ी,
डाकघर की अभी रकम बाक़ी,










छुटने को झटपटा रहा हूँ,
कौन होगा,
कै़द से छुटने वाला,
उसे देखने को नज़रें अभी प्यासी,
तृप्त हो जाता हूँ,
देखकर हर चेहरे को,
मुँह फेरकर निकल जाते हैं,
किसी के पास छुट्टे पैसे नहीं,
मेरी कल्पनाओं का,
भार कुछ बढ़ सा गया है,
क्योंकि ’मैं’,
उम्र से कुछ दब सा गया हूँ,
इतना अरसा हो गया,
कागज़ की मियाद पूरी होने को है,
छुटने में अभी जद्दोजहद बाक़ी है,
पता भी मटमैला हो गया,
पहुँचने वाले घर का हुलिया,
कुछ बदल गया,
गली मोड़ और मौहल्ले के,
कुछ इन्सान भी बदल गये,
हर बार गुमनाम इन्सान को,
तलाश कर मुड़ आता हूँ,
चला गया था यहीं कहीं,
ये बोल सुन-सुन थक गया हूँ,
डरता हूँ कि दर्दे-दिल की दास्तां,
लेकर 'मैं',
कहीं रद्दी में न डूब जाऊँ, 
दर्द में डूबे इन्सान को,
होगी उम्मीद आबाद होने की,
और ’मैं’,
यह बोझ लेकर मर नहीं सकता,
समस्त चिट्ठी जाति पर,
आजीवन कलंक को 'मैं',
लगने नहीं दे सकता,
इसी उतार-चढ़ाव में,
'मैं',
किसी के अश्कों को बटोर नहीं सकता,
उसका यह दर्द,
मुझे मरने नहीं दे सकता,
आखि़र 'मैं' पत्र हूँ,
पत्र का जवाब नहीं दे सकता।


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