शनिवार, मई 30, 2020

समाज की बाधाएँ

ये पंक्तियाँ उन्हें समर्पित,
जो आवाज़ नहीं देते,
किसी अंजान राही को,
जो बोल नहीं उठते,
देख पाप-कर्म आँखों से,
धर्म और कर्म है,
ऐश्वर्य का जीवन,
जिन्होंने कष्ट नहीं झेले,
तन-मन और चित पर,
स्नेह नहीं मिला,
माँ-बाप और प्रेम-प्रेमी से,
जिनका बाल्यपन रेत में,
जवानी संघर्ष में,
बुढ़ापा सोच और यातनाओं में,
विचरित हुआ है जीवन,
जीवन से ही संघर्ष करते,
आस है प्रेम के मिलने की,
स्नेह के सिमटने की,
बधे हैं आपने बंधनों में,
ये बिखर नहीं सकते,
समाज की सलाखों से,
जिन्हें जीने की चाहत नहीं,
मौत से भी स्नेह नहीं,
पंक्तियाँ है ये,
उन्हें ही समर्पित।



गुरुवार, मई 28, 2020

गली के बच्चे


हम भी किसी के लाल है,
लहू से नहीं सिर्फ लाल है,
नहीं मालूम हमें खेल क्या,
पेट भरना भी एक खेल है,
अबोध उम्र का दोष क्या,
मालूम नहीं लक्ष्य क्या है,













क्या ज़मीन के हम भी जीव है,
रौदती बसों के राहगीर है,
स्पर्श के लिए मोहताज़ है,
हम भी किसी की गोद के लाल है,
नक्षत्र से निकले कण है,
सदाबहार में भी क्षणिक कण है,
न जाने दोष कोख का या मेरा है,
हाँ! 
मैं भी किसी का लाल हूँ,
मेघ भी मेघ में बरसता है,
भूख में भूख बरसाती है,
तपिश का ताप सहते रहे,
जीवन में आग ही आग बरसाती है,
मुझसे, हमसे,बहुत से,
इस दुनिया में ओर भी है।

मंगलवार, मई 26, 2020

सचिवालय

माथे को पीटता वो इंसान,
सुबह से मक्खी मारता,
दोपहर बाद ही सारी फ़ाइलों का आना,
कमवक़्त,  सुबह से एक ही फ़ाइल थी,
वो भी सहकारी वालों की,
राजेंद्र बाबू पाँच बजने वाले हैं,
ज़रा जल्दी करो ....
और निकालता है एक लेटर हेड,
“मंत्री मण्डल सचिवालय ...”
लगता है उसको फिट करने,
जर्मन की देन है ये टाइपराइटर,










लगता है खटा खट करने,
नाक-भौ चढ़ा कर कहता है,
विषय में घटनोत्तर नहीं लिखा,
मैं, बड़े आदर भाव से कहता हूँ,
श्रीमान, कंडिका नौ में लिखा है,
शिक्षा विभाग है, क्या कच्छा विभाग,
भाषा तक नहीं लिख पाते आप लोग,
न प्रदेश सरकार लिखा है,
ओर ये शुद्धि,
छः महीने पहले हो गयी थी,
अगली बार से ध्यान रखना,
मैंने बड़ी कृतज्ञता के साथ कहा,
धन्यवाद ....
और सचिवालय से ऐसे निकला,
जैसे ओलम्पिक का गोल्ड मेडल।

सरकारी काम

तुम्हारा काम हो गया,
मेरा कोई काम नहीं,
जो भी है वो दफ़्तर का है,
वो बात अलग है,
हाकिम भी लगें हैं
रोज़ अपनी नौकरी बचाने में,
किसको क्या काम देना है,
काम नहीं होगा,
तब भी देना है,
लोकतंत्र, ऑफिस, ऑफिस ...

















घूमता है हर रोज़,
राजनीति के फ़ायदे में,
जल जाती है सुरक्षित फ़ाइलें,
ख़ोज लिये जाते है लोग,
जिन्हें सज़ा करानी होगी,
कल तक नहीं था,
काम का माहौल,
बड़ी मेहनत से बना है,
सत्ता में अपना भी रुतबा,
पाँच साल से पहले,
जो भी काम लो,
उसे पूरा कर दो,
गुणवत्ता नहीं आँकी जाएगी,
देर की तो सारी की सारी,
जमा राशि डूब जाएगी,
जो भी पैसा है,
वह जनता की सुरक्षा और सेवा का है,
वो पार्टी फंड में जमा करो,
सरकारी काम हो रहा है,
सड़क, शहर, गाँव मर्ज़ी चाहे,
जहाँ भी तुम चाहो,
कब्ज़ा कर सकते हो। 


सोमवार, मई 25, 2020

कुरूप

तुम कुरूप हो,
क्या इन्सान नहीं,
क्यों झटपटा रहे हो,
चर्म के लिए,
काले इन्सान नहीं,
गोरे हैवान नहीं,







ख़ून-ख़ून है,
हर देह में ख़ून है,
लम्बे चौड़े किससे कम हो,
भाव-विचार युक्त मुक्त हो,
मंत्र मुग्ध ख़ुद में,
स्वतंत्र विचार हो,
लड़ने के तथ्य पर,
क्यों विचार करते हो,
कालों को नयी पंक्ति में,
गोरे क्या अम्बर में,
मैं’ क्या जंगल में जाऊँ,
न काला न गोरा,
बीच में फंसा,
न बर्फ़ न गर्मी,
शान्ति में फंसा हूँ,







न द्वेष न प्यार,
न द्वन्द न सम्बन्ध,
स्वतंत्र हूँ ख़ुद में मंत्र मुग्ध,
न रूप की चाह,
न भाव का इन्तज़ार।

शुक्रवार, मई 01, 2020

भूख के लिए विश्व युद्ध

तीसरे विश्वयुद्ध की,
शुरूआत हो रही है,
समझौतों के बंड़ल,
जेब में डालो,
और करो परीक्षण,
कश्मीर या रवांडा में,
समुन्द्र और एकान्त बचा नहीं,
हो सके तो,
कहीं घनी आबादी में,
बम्ब फोड़कर देख लो,








इन्सानी ज़िस्म के दर्द को,
बारूद में ठंड़ा कर लो,
तुम सफ़ेद पोशाक पहनकर,
आये दिन विश्व सम्मेलन करो,
एक ओर है धर्म की धर्मावली,
धैर्य तो है नहीं,
ख़ून ही ख़ून का दुश्मन,
रंग रंग में भेद है,
काश् विश्व की बेड़ियाँ,
सीमाएं मिटा दी जाय,
सुरक्षा का बल ही,
इन्सान की असुरक्षा है।