गुरुवार, मई 28, 2020

गली के बच्चे


हम भी किसी के लाल है,
लहू से नहीं सिर्फ लाल है,
नहीं मालूम हमें खेल क्या,
पेट भरना भी एक खेल है,
अबोध उम्र का दोष क्या,
मालूम नहीं लक्ष्य क्या है,













क्या ज़मीन के हम भी जीव है,
रौदती बसों के राहगीर है,
स्पर्श के लिए मोहताज़ है,
हम भी किसी की गोद के लाल है,
नक्षत्र से निकले कण है,
सदाबहार में भी क्षणिक कण है,
न जाने दोष कोख का या मेरा है,
हाँ! 
मैं भी किसी का लाल हूँ,
मेघ भी मेघ में बरसता है,
भूख में भूख बरसाती है,
तपिश का ताप सहते रहे,
जीवन में आग ही आग बरसाती है,
मुझसे, हमसे,बहुत से,
इस दुनिया में ओर भी है।

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