सोमवार, मई 25, 2020

कुरूप

तुम कुरूप हो,
क्या इन्सान नहीं,
क्यों झटपटा रहे हो,
चर्म के लिए,
काले इन्सान नहीं,
गोरे हैवान नहीं,







ख़ून-ख़ून है,
हर देह में ख़ून है,
लम्बे चौड़े किससे कम हो,
भाव-विचार युक्त मुक्त हो,
मंत्र मुग्ध ख़ुद में,
स्वतंत्र विचार हो,
लड़ने के तथ्य पर,
क्यों विचार करते हो,
कालों को नयी पंक्ति में,
गोरे क्या अम्बर में,
मैं’ क्या जंगल में जाऊँ,
न काला न गोरा,
बीच में फंसा,
न बर्फ़ न गर्मी,
शान्ति में फंसा हूँ,







न द्वेष न प्यार,
न द्वन्द न सम्बन्ध,
स्वतंत्र हूँ ख़ुद में मंत्र मुग्ध,
न रूप की चाह,
न भाव का इन्तज़ार।

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