शनिवार, जून 06, 2020

प्रारम्भिक शिक्षा और पंचायतीराज : उत्तर प्रदेश


छियासिवें संविधान संशोधन 2002 में संविधान के खण्ड-3 में एक नया अनुच्छेद 21-, जोड़ा गया है, जिसमें 6-14 वर्ष की आयु के बच्चों की निःशुल्क और अनिवार्य शिक्षा को उनका मूल अधिकार बना दिया गया है। 6 से 14 साल के सभी बच्चों को निःशुल्क और अनिवार्य शिक्षा प्रदान किए जाने हेतु 4 अगस्त 2009 को निःशुल्क और अनिवार्य बाल शिक्षा का अधिकार अधिनियम, 2009 पारित किया। अधिनियम को “निःशुल्क और अनिवार्य बाल शिक्षा का अधिकार अधिनियम -2009 संख्या-35’’ प्राधिकार से प्रख्यापित किया गया, जो जम्मू एवं कश्मीर को छोड़कर देश के अन्य सभी राज्यों में 1 अप्रैल 2010 से लागू है। 
निःशुल्क और अनिवार्य बाल शिक्षा का अधिकार अधिनियम-2009 (अधिनियम संख्या-35 सन् 2009) की धारा 38 द्वारा प्रदत्त शक्ति का प्रयोग करके और इस विषय पर समस्त विद्यमान नियमों और आदेशों का अधिक्रमण करके, उपर्युक्त अधिनियम के उपबन्धों को कार्यान्वित करने के प्रयोजन से “उत्तर प्रदेश निःशुल्क और अनिवार्य बाल शिक्षा का अधिकार नियमावली, 2011’’ 27 जुलाई, 2011 को माननीय राज्यपाल की सहमति से अधिसूचित जारी की गयी है।
भारतीय संविधान सभी बच्चों के उत्थान के लिए प्रतिबद्ध है। इसके अनुच्छेद- 21 , 24, 39 एवं 45 देश में रहने वाले बच्चों की सुरक्षा, शिक्षा व गरिमामय जिन्दगी से सम्बन्धित है।
· अनुच्छेद 21ए - शिक्षा का अधिकार-6 से 14 साल तक की आयु के बच्चों को राज्य, अधिनियम द्वारा निश्चित निःशुल्क एवं अनिवार्य शिक्षा प्रदान करेगा।
· अनुच्छेद 24- बच्चों को कारखानों, आदि में रोजगार देने पर प्रतिबंध। किसी कारखाने या खान या अन्य किसी जोखिम भरे काम में नहीं लगाया जाना चाहिये।
· अनुच्छेद 39- राज्य को, विशेष रूप से, ऐसी नीति बनानी चाहिये जो बच्चों को सुरक्षित कर सके ताकि कम आयु के बच्चे शोषित न हों और आर्थिक आवश्यकताओं के चलते किसी भी नागरिक को उनकी आयु या शक्ति के प्रतिकूल स्थितियों में न भेजा जा सके।
· अनुच्छेद 45- ‘‘राज्य सभी बालकों के लिए 6 वर्ष की आयु पूरी करने तक प्रारंभिक बाल्यावस्था देखरेख और शिक्षा देने के उपबंध करने का प्रयास करेगा।’’
निःशुल्क और अनिवार्य बाल शिक्षा का अधिकार अधिनियम, 2009 के कार्यान्वयन की जिम्मेदारी “समुचित सरकार” और स्थानीय प्राधिकरण को सौंपी गयी है। इन कार्यों का वर्णन आर.टी.ई. अधिनियम 2009 की धारा 8 और 9 में किया गया है। इसके अलावा स्थानीय प्राधिकरण को धारा 32 में उल्लिखित बाल-अधिकार से संबन्धित शिकायतों पर विचार करना होगा और उनका निवारण करना होगा। धारा-2 (ज) में यथा परिभाषित स्थानीय प्राधिकरण निम्नानुसार होगा-
       “स्थानीय प्राधिकारी” से कोई नगर निगम या नगर परिषद, जिला परिषद या नगर पंचायत या पंचायत, चाहे जिस नाम से ज्ञात हो, अभिप्रेत है और इसके अर्न्तगत विद्यालय पर प्रशासनिक नियन्त्रण रखने वाला किसी नगर, शहर या ग्राम में किसी स्थानीय प्राधिकारी के रुप में कार्य करने के लिए तत्समय प्रवृत्त किसी विधि द्वारा या उसके अधीन सशक्त ऐसा अन्य स्थानीय प्राधिकारी या निकाय भी है।
स्थानीय प्राधिकारी की भूमिका अधिनियम में स्पष्टतः वर्णित की गई है स्थानीय प्राधिकारियों से की जाने वाली अपेक्षाएं अत्यधिक तथा चुनौतीपूर्ण हैं। अतः यदि हम चाहते हैं कि स्थानीय प्राधिकारी इन चुनौतियों का सामना करें तो सामाजिक संस्थायें तथा पंचायती राज (पीआरआई) के बीच दीर्घकालीन सहभागिता स्थापित की जानी जरूरी होगी। संविधान के 73वें और 74वें संशोधन के पारित किए जाने के समय से पीआरआई के साथ मिलकर काम कर रहे ऐसे संगठनों को, जिनके पास जरूरी नहीं है कि शिक्षा में काम करने का अनुभव हो, भी शामिल किया जाना चाहिए। आर.टी.ई. अधिनियम 2009 में वर्णित सुविधाओं की व्यवस्था करने में पीआरआई को एक महत्वपूर्ण भूमिका निभानी होगी। आर.टी.ई. अधिनियम के लिखे अनुसार शिक्षा के अधिकार से वंचित किए गए क्षुब्ध व्यक्तियों द्वारा ध्यान दिए जाने के लिए यह पहला स्तर होगा।  इसलिए पीआरआई कार्मिकों का प्रशिक्षण प्रदान करने का अनुभव प्राप्त है। इन कार्मिकों के प्रशिक्षण और पुनः प्रशिक्षण के लिए जिलाधिकारियों को एक व्यापक योजना तैयार करनी होगी। राज्य सरकारों को इसके साथ-साथ यह सुनिश्चित करना चाहिए कि पंचायत राज संस्थानों को समुचित रुप से सहयोजित किया जाए जिससे कि स्थानीय प्राधिकरण  आर.टी.ई. अधिनियम के अधीन अपने कार्यों का निर्वाह कर सके।
आर.टी.ई, 2009 धारा 6 में स्पष्ट किया है कि समुचित सरकार व स्थानीय प्राधिकारी इस अधिनियम के प्रारम्भ से तीन वर्ष की अवधि के भीतर ऐसे क्षेत्र या आस-पास की ऐसी सीमाओं के भीतर जो विहित की जाये, जहाँ विद्यालय इस प्रकार स्थापित नहीं है, एक विद्यालय स्थापित करेंगे। - “स्थानीय प्राधिकारी अर्थात यथास्थिति ग्राम पंचायत/ नगर निगम/ नगर पालिका/ नगर पंचायत किसी पड़ोसी विद्यालय को चिन्हित करेगा, जहॉ बालकों को प्रवेश दिलाया जा सके तथा प्रत्येक बस्ती के लिये अपनी अधिकारिता के भीतर ऐसी सूचना को सार्वजनिक करेगा।’’ (1) पास पड़ोस का क्षेत्र या सीमा, जिसके अन्तर्गत राज्य सरकार द्वारा प्राधिकृत समिति द्वारा विद्यालय की स्थापना निम्नवत् की जानी हैः- “कक्षा एक से पाँच तक के बच्चों के सम्बन्ध में ऐसी बस्ती में विद्यालय स्थापित किया जायेगा जिसके 1.00 किलोमीटर की दूरी के अन्तर्गत कोई विद्यालय नहीं है तथा न्यूनतम आबादी 300 है। कक्षा छः से आठ तक के बच्चों के सम्बन्ध में ऐसी बस्ती में विद्यालय स्थापित किया जायेगा जिसके 3.00 किलोमीटर की दूरी के अन्तर्गत कोई विद्यालय नहीं है तथा न्यूनतम आबादी 800 है।’’
उत्तर प्रदेश बेसिक शिक्षा अधिनियम, 1972 की धारा 10, 10-क और 11 का प्रतिस्थापन ’’उत्तर प्रदेश बेसिक शिक्षा अधिनियम (संशोधन) अध्यादेश, 2000’’ अर्थात्-
धारा-10. उत्तर प्रदेश जिला पंचायत तथा क्षेत्र पंचायत अधिनियिम, 1961 के अधीन जिला पंचायतों के अधिकारों और कृत्यों पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना, प्रत्येक जिला पंचायत, परिषद या राज्य सरकार के अधीक्षण और निदेशन के अध्यधीन रहते हुए, निम्नलिखित समस्त या उनमें से किन्हीं कृत्यों का संपादन करेगी, अर्थात् –
o (क) जिले के ग्रामीण क्षेत्रों में बेसिक स्कूलों के विकास, प्रसार और सुधार के लिए योजनायें तैयार करना;
o (ख) जिले में बेसिक शिक्षा के संबंध में ग्राम पंचायतों के क्रियाकलाप का, सामान्यतया ऐसी रीति से जैसी विहित की जाए, पर्यवेक्षण करना;
o  (ग) बेसिक शिक्षा से सम्बन्धित ऐसी अन्य कृत्यों का सम्पादन करना जिन्हें राज्य सरकार द्वारा उसे सौंपा जाय।

धारा-10 क. यथास्थिति उत्तर प्रदेश नगर निगम अधिनियम 1959 या उत्तर प्रदेश नगरपालिका अधिनियम 1916 के अधीन नगर पालिकाओं के अधिकारों और कृत्यों पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना प्रत्येक नगरपालिका परिषद या राज्य सरकार के अधीक्षण और नियन्त्रण के अध्याधीन रहते हुए निम्नलिखित समस्त या उनमें से किन्ही कृत्यों का सम्पादन करेगी:-
(क) नगरपालिका क्षेत्र में बेसिक स्कूलों की स्थापना, उनका प्रशासन नियन्त्रण व प्रबन्ध करना,
(ख) ऐसे समस्त आवश्यक कदम उठाना जो बेसिक स्कूलों के अध्यापकों और अन्य कर्मचारियों के समय पालन और उपस्थिति के सुनिश्चित करने के लिए आवश्यक समझे जाएं,
(ग) ऐसे बेसिक स्कूलों के विकास, प्रसार और सुधार के लिए योजनाएं तैयार करना,
(घ) नगर पालिका क्षेत्र में बेसिक शिक्षा, अनौपचारिक शिक्षा और प्रौढ़ शिक्षा की अभिवृद्धि और विकास करना
(ङ) नगर पालिका क्षेत्र की सीमाओं के भीतर स्थित किसी बेसिक स्कूल के किसी अध्यापक या अन्य कर्मचारी पर ऐसी रीति से जैसी विहित की जाए, लघु दण्ड देने की सिफारिश करना।

धारा-11. प्रत्येक गांव या गांव समूह के निमित्त, जिसके लिए संयुक्त प्रान्त पंचायत राज अधिनियम, 1947 के अधीन ग्राम पंचायत स्थापित हो, एक समिति स्थापित की जायेगी, जो गांव शिक्षा समिति कहलायेगी, जिसमें निम्नलिखित सदस्य होंगें, अर्थात्-
(क)- ग्राम पंचायत का प्रधान, जो अध्यक्ष होगा;
(ख)- बेसिक स्कूलों के छात्रों के तीन संरक्षक (जिनमें से एक संरक्षक महिला होगी) जो सहायक बेसिक शिक्षा अधिकारी द्वारा नाम निर्दिष्ट किए जायेगें;
(ग)- ग्राम पंचायत में स्थित बेसिक स्कूल का मुख्य अध्यापक और यदि वहां एक से अधिक स्कूल हों, तो उनके मुख्य अध्यापकों में से, ज्येष्ठतम, जो सदस्य-सचिव होगा;

उत्तर प्रदेश बेसिक शिक्षा अधिनियम (संशोधन) अध्यादेश, 2000 के किन्हीं अन्य उपबन्धों में अन्यथा उपबन्धित के सिवाय और ग्राम पंचायत के अधीक्षण और नियंत्रण के अध्यधीन रहते हुए, गांव शिक्षा समिति निम्नलिखित कृत्यों का सम्पादन करेगी, अर्थात्-
1)   पंचायत क्षेत्र में बेसिक स्कूलों की स्थापना, उनका प्रशासन; नियंत्रण और प्रबन्धन करना;
2)   ऐसे बेसिक स्कूलों के विकास, प्रसार और सुधार के लिए योजनाएं तैयार करना;
3)   पंचायत क्षेत्र में बेसिक शिक्षा, अनौपचारिक शिक्षा और प्रौढ़ शिक्षा की अभिवृद्धि और विकास करना;
4)   बेसिक स्कूलों, उनके भवनों और उपस्कारों के सुधार के लिए जिला पंचायत को सुझाव देना;
5)   ऐसे समस्त आवश्यक कदम उठाना, जो बेसिक स्कूलों के अध्यापकों और अन्य कर्मचारियों के समय-पालन और उपस्थिति को सुनिश्चित करने के लिए आवश्यक समझे जायें
6)   पंचायत क्षेत्र की सीमाओं के भीतर स्थित किसी बेसिक स्कूल के किसी अध्यापक या अन्य कर्मचारी पर ऐसी रीति से जैसी विहित की जाये; लघु दण्ड देने की सिफारिश करना;
7)   बेसिक शिक्षा से सम्बन्धित ऐसे अन्य कृत्यों को करना, जिन्हें राज्य सरकार द्वारा उसे सौंपे जायें।

सामुदायिक की भागीदारी और पंचायतों की जवाबदेही को विद्यालय के प्रति जिम्मेदार बनाने की दिशा में प्रत्येक विद्यालय में विद्यालय प्रबंध समिति का गठन और स्थानीय प्राधिकारी की सक्रिय भूमिका हेतु निम्न कार्य किये जा सकते है: -
· स्थानीय प्राधिकार अर्थात् यथास्थिति ग्राम शिक्षा समिति /नगर पालिका /नगर पंचायत अपनी सीमा क्षेत्र में स्थित प्रत्येक बस्ती के लिए किसी पड़ोसी विद्यालय को चिह्नित करेगा जहाँ बच्चों को प्रवेश दिलाया जा सके तथा उस बस्ती हेतु चिह्नित विद्यालय की जानकारी को सार्वजनिक करेगा।
· आर.टी.ई. अधिनियम के प्रचालन पर नजर रखने के लिए एक शिक्षा समिति स्थापित की जाए। यह स्थानीय सरकार में शिक्षा पर कारवाई करने वाली स्थायी समिति का एक संवर्द्धित रूप हो सकती है इसमें निर्वाचित प्रतिनिधि, विशेषज्ञ, कार्यकर्ता, माता-पिता, मुख्याध्यापक तथा शिक्षा विभाग के कर्मचारी शामिल हो सकते हैं।
· किसी बस्ती में विद्यालय स्थापित करना यदि विद्यालय स्थापित कराना सम्भव न हो तो स्थानीय प्राधिकारी ऐसे क्षेत्रों के बच्चों के लिए पर्याप्त व्यवस्था करेगी यथा निःशुल्क यातायात, आवासीय सुविधा आदि।
·  विभिन्न प्रकार की निःशक्तताओं से ग्रस्त बच्चों के मामले में पी.आर.आई. आयोजित शिविरों के माध्यम से उनकी पहचान उनकी निःशक्तता के स्तर का निर्धारण करने यह सुनिश्चित करने में कि ऐसे बच्चों को उपुयक्त सहायक सामग्री और उपकरण उपलब्ध कराए जाएं और यह सुनिश्चित करने में कि ऐसे बच्चों को नियमित स्कूलों में मुख्यालय का अंग बनाए जाने के लिए समुचित सहयोग प्रदान किया जाए, मूल्यवान सहयोग दे सकते हैं। निःशक्तता से ग्रस्त (विकलांग) बच्चों के लिए समुचित और सुरक्षित परिवहन की व्यवस्था करने का प्रयास करेगी। इन बच्चों को निःशुल्क विशेष शिक्षा, सहायक सामग्री एवं उपकरण भी निःशुल्क उपलब्ध कराये जायेंगें।
·  स्थानीय प्राधिकारी दूरवर्ती क्षेत्र के बच्चों, निःशक्तता से ग्रस्त बच्चों, साधनहीन वर्ग तथा कमजोर वर्ग के बच्चों सहित समस्त बच्चों का चिह्नांकन प्रत्येक वर्ष करेगा।
· स्थानीय प्राधिकारी यह सुनिश्चित करने के लिए उत्तरदायी होगा कि विद्यालय में किसी बच्चे के साथ जाति, वर्ग, धर्म तथा बालक बालिका के आधार पर कक्षा में तथा कक्षा के बाहर के गतिविधियों में भेदभाव न किया जाए। 
· स्थानीय प्राधिकारी यह सुनिश्चित करेगा कि सामाजिक एवं सांस्कृतिक कारणों से बच्चों को विद्यालय पहुँचने में कोई बाधा न आये।
· स्थानीय प्राधिकारी अपने क्षेत्र के समस्त बच्चों का जन्म से 14 वर्ष की आयु प्राप्त होने तक का अभिलेख सर्वे के माध्यम से सुरक्षित रखेगा।
· प्रारम्भिक रूप से कोई शिकायत ग्राम शिक्षा समिति/वार्ड शिक्षा समिति को उसके सदस्य सचिव के माध्यम से की जायेगी। ग्राम शिक्षा समिति/वार्ड शिक्षा समिति के विनिश्चय के पश्चात् अपील, यथास्थिति विकास खण्ड स्तरीय सहायक बेसिक शिक्षा अधिकारी/नगर शिक्षा अधिकारी को की जा सकती है। 
· शिकायत की द्वितीय अपील उत्तर प्रदेश बेसिक शिक्षा अधिनियम, 1972 की धारा-10 के अधीन ग्रामीण क्षेत्र से सम्बन्धित मामलों के लिए जिला पंचायत को और धारा 10-क के अधीन नगरीय क्षेत्र से सम्बन्धित मामलों के लिए नगरपालिका को की जा सकती है।

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