रविवार, जून 07, 2020

हिन्दी भाषा का विकास और सिनेमा


भारतीय भाषाओं का वृक्ष है संस्कृत! संस्कृत से ही उत्तर भारतीय भाषाओं का उदय हुआ, मगर यह कबीरदास की एक सूक्ति के समान है, “संस्कृत जलकूप है, भाषा बहता नीर कबीरदास ने संस्कृत को एक कुएं में सुरक्षित जल के समान बताया है, जो सीमित एक स्थान, दिशा एवं स्थिर ही कुछ दूर तक के लोगों तक उसका प्रयोग सीमित राहत है, वह गंगा के जल तरह उत्तर भारत से लेकर पूर्व तक लोगों को जीवन नहीं देता है। गंगा अपने जल की एक-एक बूँद से संस्कृति एवं सभ्यता को सींचती रहती है, हरिद्वार, गढ़मुक्तेश्वर, त्रिवेणी, काशी, पटना और बंगाल तक अनेक संगम है इस सभ्यता की धारा पर- “स्नेह-निर्झर बह गया है ! रेत ज्यों तन रह गया है”।

संस्कृति और सभ्यता के अनुसार भाषा में भी बदलाव आना एक प्राकृतिक सी बात है, इस प्रकार हड़प्पा काल से लेकर आज तक जैसी सभ्यता आयी भाषा भी बदलती रही। चित्रलिपि ही है जिससे हम उनके बारे में कुछ अता-पता लगा लेते हैं अन्यथा हमें उनकी भाषा शिक्षा के ज्ञान की शुरूआत हो सकी और वह संस्कृत का पूर्ण रूप बनकर एक ऐसी भाषा का रूप ले गयी जो आज तक भाषाओं की महान उपलब्धियों में से एक है। व्याकरणात्मक, विशेषण, संधि, संज्ञा, प्रर्यायवाची, विलोम, सूक्तियां, प्रत्यय, लिंग, आदि क्या नहीं है इस भाषा में, जो हम कह सके कि यह अधूरी भाषा है या इसमें भी कुछ दोष बाकी है जिसे सुधारने की आवश्यकता हमें पडे या किसी परेशानी का सामना करना पड़े, लेकिन यह विद्धानों की भाषा थी कि आम बोलचाल की, जिसे कुछ सीमित समाज ही पढ़-बोल सकता था।

अतः समय के प्रतिकूल होने के कारण ही पालि भाषा का उदय हुआ जिसमें संस्कृत के साथ-साथ आम बोलचाल की भाषा यानि अपभ्रशं का भी उपयोग किया गया। यह बौध धर्म की ही मुख्य भाषा होकर रह गयी और इसका भी क्षेत्र सीमित सा हो गया, यह फैलने से पहले ही वृद्ध होती गयी और कुछ समय में फिर संस्कृत का समय गया। 

यह काल संस्कृत का चर्म सीमा पर था इसी काल में इसमें से धीरे-धीरे एक नयी भाषा का जन्म हुआ जो बहुत ही सीमित मध्यम-मध्यम हुआ, वह थी हिन्दी इसमें अक्षरो को देवनागरी लिपि में लिखा जाना संस्कृत प्रधान अक्षरों की भरमार की गयी जो 11वीं शताब्दी से विकसित होती-होती आज तक भी विकास जारी है। इसी समय भारत में नयी भाषायें आईं अरबी, फारसी, जिसका काफी लम्बे समय तक राज-काज पर काफी प्रभाव रहा, वैसे यह भी राजकीय भाषा थी मगर जनता तक इसको पहुँचाने के लिये काफी प्रयास किये गये और लोगों को यह धर्म मानने पर भी मजबूर किया गया जिससे लोगों को यह बोलनी पड़ी। एक कारण यह भी था कि उस वक्त शिक्षा का माध्यम भी अरबी-फारसी कर दिया गया जिससे लोगों को काम-काज नौकरी के लिये यह भाषा सीखनी पड़ी और यह धीरे-धीरे बोलचाल में मिश्रित होती गयी जिसका आज पता भी नहीं चलता कि यह शब्द संस्कृत का है या अरबी का। इस समय जो साहित्य लिखा गया वह अवधी, बृज मैथिली, अन्य और पश्चिम में राजस्थानी, अपभ्रश कुछ संस्कृत प्रधान हिन्दी में लिखा गया। इस काल में कबीर, रहीम, रसखान अनेक मुस्लिम कवि हुए, पर उन्होंने भी आम बोलचाल संस्कृत अरबी के मिश्रित शब्द प्रयोग के लिए। रहीम -रहीमन विपदा हूँ भली, जो थोड़े दिन होए। हित अनहित जगत में, जान परत सब कोय।।”

कबीर, रसखान, मीरा, सूर, तुलसी, आदि कवि जो कि हिन्दी भाषा के वृक्ष की भक्ति काल की शाखा के कुछ पत्ते हैं, उन्होंने हिन्दी के वृक्ष को खूब फैलाया, जोकि एक काल के नाम से जाना जाता है। जो मुख्य रूप से हिन्दी तो नहीं थी, मगर उसके विकास में एक महान कदम समझा जाता है, वैसे यह काल भक्ति प्रधान काल से भरा है। फिर भी निगुर्णता की कुछ सुगन्ध आती है यह हिन्दी के विकास का स्वर्ण युग था जो कि रामायण, पद्मावत जैसे महाकाव्य लिखे गये जो कि आज तक अपनी महानता लिये हैं और कि उनकी बराबर का कोई ग्रन्थ लिखा गया बल्कि जो कुछ उस समय में कवियों ने शब्दों को एक ऐसी माला में पिरो दिया जिसे हम बार-बार स्मृतित करते रहते हैं उनका यह कार्य हिन्दी हिन्दवी, हिन्दुस्तान कभी भुला नही सकता

परिस्थिति हर किसी को मोड़ देती है, जैसी प्राकृतिक रचनायें अपने आप ही बनती बिगड़ती रहती हैं, उसी प्रकार समाज और संस्कृति भी एक के बाद एक नया रूप लेता जाती है, इसका सबसे अधिक प्रभाव उस समय जनता की खोज क्रिया-कलापों पर पड़ता है जोकि कवि को मजबूरन अपनी कविता के माध्यम से जनता में फैली विविधता के गुण को समाप्त करने के लिये उकसाता है, और वह बोल उठता है, जो अपनी भावनाओं के शैलाब को शब्दों में पिरो कर एक रचना तैयार करता है, जो हमें एक नया रास्ता देने में सहायक होती है, मन को भी कुछ भाव देती है।

भक्तिकाल में धर्म में काफी उथल-पुथल हुई जिसका मुख्य कारण इस्लाम को मनवाना, हिन्दू धर्म का पतन, आडम्बरों-पाखण्डों का खण्डन होना, आदि जिससे जनता में काफी बदलाव सा गया और वह किंक्रतर्व्यमूढ़ के चौराहे पर अपने को अकेला मानने लगे जिससे धर्म की अस्थिरता ने इस काल के कवियों को हिला सा दिया और उनके मन में एक उफान सा आया जोकि कुछ कहकर करने के मूढ़ से रचनायें करते रहें। इस काल में अनेकों तरह का काव्य आया मगर फिर भी मनुष्य के लिये सभ्यता को समझने आगे की ओर बढ़ाने के लिये अग्रसर करता रहा।

वैसे तो समाज में फैली हर बुराई के खिलाफ लिखना साहित्य की अपनी एक परम्परा रही है, एक समय था जब वीरों को लड़ने के लिए वीरगाथा काल का उदय उन्हें चौपाईयां वीर रस प्रधान काव्य की रचनाएं की गयी उस समय में बारह बरसि लौं कुकर जीवै, अरू तेरह लोजिये सियार। बरस अठरह छत्री जीवै, आगे जीवन को धिकार।। जैसे काव्य की प्रधानता रही, लेकिन कुछ ही समय में लोगों का मन लड़ाई से भर सा गया और वह भक्ति के मार्ग पर चलने के लिये तैयार हो गया कवि और लेखक भी समाज की चाल के अनुसार अपने पैतरे बदलते रहते हैं। अब वह गुरू और भगवान का गुण गान करने लगे, एक जायसी की पंक्ति देखिए गुरू सुआ जेहि पंथ देखावा। बिन गुरू जगत को निरगुन पावा।। इस काल के कवि भक्त, समाज सुधारक, लोकनायक एवं भविष्य दृष्टा थे, आप ही बताईये कि कौन सारा दिन भगवान का ध्यान करता रहेगा।

अतः समाज ने फिर एक करवट बदली और वह श्रृंगार की ओर आकृषित हुआ इसे कुछ लोग इसे कला काल और कुछ रीतिकाल के नाम से जानते हैं। इस युग में नारी चित्रण, प्रकृति चित्रण, नारी के अंग प्रत्यग की शोभा, हाव-भाव, विलास, चेष्ठा, आदि का वर्णन बड़े सुन्दर ढंग से किया गया है। धनानन्द को ही देखिए सुजान पर दिवाने हो गये थेया नहीं  जुदसा धनानन्द, जीवन की जीवनी जान ही जानै। स्त्री ओर प्रकृति का वर्णन करते करते ही एक कदम ऐसी जगह आकर रूक गया जब पूरा संसार प्रगति की ओर भाग रहा था। 

औद्योगिक के साथ ही जुड़ा आधुनिक युग काव्य के इस पौधे में जुड़ गया, वैसे भी देश को स्वतंत्रता की आवश्यकता थी तो वही पुराना वीरगाथा काल नवजागृति के नाम से सामने आया, फिर देश का गुनगान होने लगा डूबते भार नाथ, बेगि जागो अब जागो भारतेन्दु इस युग में कविता, उपन्यास और कहानी, आदि विधाओं का भी विकास हुआ।

इस दुनिया में आया एक ओर अजूबा, जिसे लोग सिनेमा  के नाम से जानते हैं, अगर दुनिया में कोई कला है तो वह है सिनेमा, कौन नहीं जानता इसे, मात्र 100 वर्ष में अपनी बुलंदियों को छू गया। पहले पहल देश भक्ति की कहानियों, नाटक और गीतों का वर्णन शुरू हुआ, लेकिन आज यह मात्र एक स्त्री के देह दिखाने का माध्यम बन गया लोग जिन्हें हम विद्धान कहते हैं, वह भी इसमें बुरी तरह फंसे हुए हैं, आज अगर कोई लेखक लिखता है तो वह पहले देखता है कि मेरी कहानी रोमांटिक भी है या नहीं, आज का युग पैसे का युग माना जाता है, संस्कृति, सभ्यता और समाज को तो पुड़िया बनाकर जेब में रखते हैं। कहते हैं कि पैसा है तो हर सोसाइटी में इज्जत होती है। चाहे वह अंग प्रदर्शन करके या फुहड़ संगीत के बोल या सरासर अश्लीलता पर टिका है।

साहित्य समाज का दर्पण है लेकिन आज का समाज सिनेमा  का एक चित्र बन चुका है इसके बिना चल नहीं सकता, आज का जीवन अल्पसमय, संघर्षमय एवं अपने को अलग दिखाने का एक सिंबल बन गया है। हम आज गौर करें तो पायेंगे कि लोग शायद इतने कवि, लेखकों साहित्यकारों के नाम रचनाओं से परिचित नही होगें जितने आज के इस फिल्मी समाज से जुड़े हैं। 

शायरी, गीतों और कविताओं को दूध-पानी की तरह मिलाकर पेश किया गया, जिसका परिणाम यह हुआ कि लोग भाषा को छोड़ उस गीत के बोल गुनगुनाने को मजबूर हो गये और वह स्मृति के रूप में लोगों कि जुबान पर चढ़ जाते हैं, जैसे इकबाल का गीत- सारे जहां से अच्छा हिन्दोस्तान हमारा ............... इस दौर में हिन्दी के गीतकार शैलेन्द्र शर्मा और नीरज उर्दू के शायर कैफी आज़मी, हजरत जयपुरी, अकबर इलहाबादी, शाहिर लुधियानवी की मिली-जुली भाषा ने एक प्रगति शील संघ और छायावादी साहित्य के साथ-साथ गीतों में व्याकरण, सौन्दर्य का बड़े सुन्दर ढंग से प्रस्तुतिकरण किया, उन्होनें छन्द, अलंकार, समास और श्रृंगार, मिलन, विरह आदि रसों का नमूना पेश किया- जरा मुल्क के रहबरो को बुलाओ। ये गलियां ये मंजर दिखाओ। जिन्हे नाज है हिन्द पर वो कहां हैं।। इनके द्वारा प्रस्तुत किये गये भाव भाषा दोनों ही स्तरों पर किसी भी साहित्यक गीत अथवा कविता के कम नहीं हैं, यह गीत भी कविता की तरह सोचने पर मजबूर कर देते हैं, भारतीय फिल्म स्वयं में एक कविता है वह कविता की तरह हर कुछ पल बाद अपने को बदलती रहती है।

साहित्य की विधायें जोकि कुछ लोगों के कमरे में कैद है उसे सिनेमा  आम लोगों तक पहुँचा सकता है वह उसके लिए कलारूप - जैसे भाषा, बिंब, प्रतीक एक ऐसा उद्दीपन प्रस्तुत कर सकता है जैसा कि कविता चाहती है, उपन्यास चाहता है, कहानी चाहती है, इत्यादि।


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