शुक्रवार, जून 26, 2020

मानसून


ज़ख़्मों को कुरेदता नहीं,
अपने आप सहल जाते हैं,
हरे तो जख़्म हैं,
मरे पर न कोई नाम,
अनजाने में,
स्मृति हो जाती हैं,
अपने बीते अतीत की,
जख़्म कहो या,
बीते का फल,
अपनी उम्र में किये,
कर्मों का फल,
उस दोस्त को,
उस दोस्ती का,
एहसास होगा,
बीती दोस्ती का,


मानसून के आने से,
पनप जाती हैं मौसमी घास,
पतझड़ के आने से ही,
आती है बहार बसन्त की,
ज़ख़्मों को कुरेदने से,
आती है याद,
ज़ख़्मों के होने के दिनों की,
दरिया के सूख़ जाने से,
आती है याद,
वर्षा के होने के दिनों की,
निर्वात में पड़ा हो मन,
उठ आती है तरंग,
याद आने से,
ज़ख़्म याद रहता है,
तन पर एक दाग़ लग जाने से,
मन डूब जाता है,
बिसरे हुए ज़माने की याद आने से।



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