शनिवार, जून 06, 2020

विद्यालय स्वास्थ्य कार्यक्रम

मानव संसाधन शिक्षित और स्वस्थ हो यह प्रत्येक देश एवं प्रदेश की प्रगति के लिए आवश्यक है। जिस देश एवं प्रदेश ने अपनी प्रगति से विश्व को अचंभित किया है उसने सबसे पहले अपने नागरिकों को स्वस्थ एवं शिक्षित करने का कार्य किया। शिक्षा और स्वास्थ्य के बीच एक गहरा संबंध है। एक के बिना दूसरे को मजबूती देने के बारे में सोचा भी नहीं जा सकता है। शिक्षा के लिये स्वस्थ मस्तिष्क आवश्यक है। इस प्रकार प्रदेश को प्रगति के पथ पर अग्रसर करने के लिये आवश्यक है कि शिक्षा और स्वास्थ्य दोनों कार्यक्रमों को समान रूप से ध्यान दिया जाए। प्रदेश में बच्चों के विद्यालय में अनुपस्थिति होने पर एक नज़र डाली जाए तो स्पष्ट होता है कि इसका मुख्य कारण बच्चों का बीमार होना भी है।

स्वास्थ्य सिर्फ़ बीमारियों का होना ही नहीं है बल्कि यह भोजन, सुरक्षा, शुद्ध जलापूर्ति, आवास, साफ़-सफ़ाई और स्वास्थ्य सेवाओं जैसी बुनियादी जरूरतों तक पहुँच से भी प्रभावित होता है और आकार प्राप्त करता है। जैविक, सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक पहलुओं से मिलकर बने होने के कारण स्वास्थ्य एक बहुआयामीय संकल्पना है। स्वास्थ्य की इस विस्तृत परिभाषा में व्यक्तिगत स्वास्थ्य का भी सामाजिक कारकों से गहरा संबंध बताया गया है। अतः व्यक्तिगत स्वास्थ्य के महत्वपूर्ण होने के कारण यह जरूरी हो जाता है कि इसका संबंध उस प्राकृतिक, सामाजिक और आर्थिक माहौल के साथ रेखांकित किया जाए जिसमें लोग रहते हैं। बच्चों में खराब स्वास्थ्य और पोषण का स्तर उपस्थिति और शैक्षणिक उपलब्धियों के मार्ग में सबसे बड़ी बाधा है। साथ ही यह नामांकन, ठहराव और विद्यालयी शिक्षा पूरी करने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। बच्चों की मृत्यु और अस्वस्थता के लिए मुख्य रूप से कुछ बीमारियाँ मसलन डायरिया, न्यूमोनिया और कुछ प्रकार के बुखार ज़िम्मेदार हैं। एनएफएचएस के आँकड़े बताते हैं कि ग्रामीण इलाकों में रहने वाले 53 फीसदी बच्चों का वजन सामान्य से कम है और ऐसा कई राज्यों में देखा जा सकता है। कुछ राज्यों में तो यह संख्या 60 फीसदी तक है, विशेषकर गरीब राज्यों के अनुसूचित जाति के समूहों में। बच्चों की इस प्रकार से बाधित वृद्धि चिंता का विषय है और इसका प्रभाव उनके विद्यालयी जीवन पर भी पड़ता है। अलग-अलग उम्र के आँकड़ों  के मुताबिक पाँच वर्ष से कम उम्र के बच्चों के मरने के कारण मुख्य रूप से जन्म के समय वजन कम होना, श्वसन संक्रमण और खून की कमी है। 5-14 वर्ष की आयु के बच्चों में मौत के लिए भी श्वसन संक्रमण और खून की कमी ही मुख्य कारण होती है। स्वतंत्रता से पूर्व भी शिक्षा और स्वास्थ्य के लिए बनी कई समितियों ने कुपोषण और संक्रामक रोगों से निपटने  के लिए कार्यक्रम की ज़रूरत महसूस की थी। भारत समेत कई देशों ने विद्यालय स्वास्थ्य कार्यक्रम के महत्त्व को पहचाना है।

सर्व शिक्षा अभियान एवं समग्र शिक्षा
कार्यान्वयन के लिए कार्यतंत्र के अनुसारनिःशुल्क और अनिवार्य बाल शिक्षा अधिकार अधिनियम, 2009 पर आधारित’ :-
Ø  एनसीएफ- 2005 के आधार पर 1 से 8 तक की कक्षाओं के लिए तैयार की गई मौजूदा एनसीईआरटी पाठ्यवस्तु आरटीई अधिनियम के सुत्रों के अनुरूप है और एक प्रयोगिक पाठ्यवस्तु डिजाइन की दिशा में एक प्रमुख कदम की परिचायक है। यह निम्न सिद्धांतों पर आधारित था जिन्हें सभी राज्य पाठ्यचर्यात्मक हस्तक्षेपणीय उपायों में शामिल किए जाने की जरूरत है : (2) लैंगिक, जातिगत तथा वर्गगत समानता, शांति, स्वास्थ्य और निःशक्त बच्चों की जरूरतों के प्रति संवेद्यता।
Ø  एनसीएफ - 2005 अध्यापन के लिए एक रचनात्मक दृष्टिकोण का आह्वान करता है जिसमें छात्र उनके ईदगिर्द के विष्व को सार्थक बनाते हैं। असमानता और न्याय के प्रश्नों को सबसे आगे रखते हैं और छात्रों को परिवर्तनात्मक कार्रवाई में समर्थ बनाते हैं। स्वास्थ्य और शारीरिक शिक्षा प्रारंभिक स्तर पर स्कूली शिक्षा का एक अविभाज्य अंग होनी चाहिए। सर्व शिक्षा अभियान (एसएसए) उच्च प्राथमिक स्तर पर स्वास्थ्य और शारीरिक शिक्षा का समर्थन करेगा।
Ø  व्यापक मूल्यांकन- शब्दव्यापकका अर्थ है किसी बच्चे को मात्र विभिन्न स्कूली विषयों को सीखने वाले की दृष्टि से देखने की बजाय एक सम्पूर्णतावादी परिपेक्ष्य में देखना। व्यापक मूल्यांकन कार्यनीति का अर्थ होता है कि विकास और वृद्धि के संदर्भ में बच्चें के स्वास्थ्य, व्यक्तित्व, व्यवहार और दृष्टिकोण जैसे पहलुओं को भी देखा जाए।
Ø  सर्व शिक्षा अभियान महिला और बाल विकास मंत्रालय के आईसीडीएस कार्यक्रम के साथ अभिसरण के सुदृढ़ीकरण द्वारा ईसीसीई के महत्व पर बल देता है जिससे कि स्कूल-पूर्व शिक्षा को बढ़ावा दिया जा सके। सर्व शिक्षा अभियान निम्न के माध्यम से आईसीडीएस के साथ प्रभावी सहक्रिया बनाने की दिषा में प्रयासशील रहेगाः (5) स्कूल-पूर्व तथा प्राथमिक स्कूल में अधिगम और विकास के बीच की कड़ी के अभिसारी बोध के लिए नर्सरी अध्यापक प्रशिक्षण के पाठ्यचर्या नवीकरण तथा आंगनवाड़ी कार्मिकों, प्राथमिक अध्यापकों और स्वास्थ्य कार्मिकों के प्रशिक्षण का आयोजन।
Ø  अध्यापकों के लिए सेवा-पूर्व प्रशिक्षण में गुणवत्तात्मक सुधार के लिए अध्यापकों की तैयारी बहुत जरूरी है इसके लिए अन्य विषयों के साथ व्यावहारिक शिक्षा में बच्चों का शारीरिक और भावनात्मक स्वास्थ्य, स्कूल स्वास्थ्य और शिक्षा को पाठ्यक्रम में रखा गया है।
Ø  अनिवार्य बाल शिक्षा अधिकार अधिनियम में शारीरिक दंड और मानसिक उत्पीड़न को निषेध किया गया है। मामूली दंड भी शारीरिक और भावनात्मक, दोनों को चोट पहुंचा सकता है। बच्चों को मारा गया एक तमाचा उसे बहरा बना सकता है और उसे अवमानित कर सकता है। किसी भी तरह का शारीरिक दंड और मानसिक आघात स्वास्थ्य के लिए हानिकारक और बाल-अधिकारों का उल्लंधन है।
भारत का संविधान
Ø  अनुच्छेद 39() राज्य यह सुनिश्चित करेंगे कि बालकों को स्वस्थ वातावरण में स्वतंत्र और गरिमयमय जीवन के विकास के अवसर और सुविधाएं दी जाएं और बालकों तथा अल्पवय व्यक्तियों के शोषण से तथा नैतिक और आर्थिक परित्याग से रक्षा की जाए।
Ø  अनुच्छेद 39() मेंगरिमाशब्द का विशेष उल्लेख है जिसका अर्थ है शिक्षा अधिकार अधिनियम यह मानता है कि गरिमा और दण्ड साथ-साथ नहीं रह सकते है।

शिक्षा का अधिकार अधिनियम के साथ जुड़े हुए ऐसे कार्य जोकि अनिवार्यतः एमएचआरडी अथवा राज्य शिक्षा विभागों तक सीमित नहीं हैं। स्कूल आधारिक सुविधाएं, प्रशिक्षित अध्यापक, पाठ्यचर्या और अध्यापन-अधिगम सामग्री तथा मध्याह्न भोजन उपलब्ध कराने की सीधी जिम्मेदारी निश्चित रूप से एससीईआरटी और एसएसए सहित राज्य सरकारों के शिक्षा विभागों की है इसमें राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन के अधीन कार्यक्रमों को अवष्य ही ऐसे स्कूल स्वास्थ्य कार्यक्रम हाथ में लेने चाहिए जिनमें विशेष रूप से किशोरावस्था को प्राप्त कर रही बालिकाओं सहित दुर्बल वर्गों की ओर विशेष ध्यान देते हुए कृमि-नाशक तथा सुक्ष्म पोषण संपूर्ति शामिल हैं।
विद्यालय स्वास्थ्य कार्यक्रमों में नियमित स्वास्थ्य परीक्षण, दोपहर का भोजन और स्वास्थ्य शिक्षा संबंधी तत्व शामिल हैं। यह कार्यक्रम विद्यालय, शिक्षा मंत्रालय, स्वास्थ्य केंद्रों और अन्य स्वास्थ्य एजेंसियों के बीच परस्पर सहयोग के साथ मिलकर शुरू किया गया प्रयास है। विद्यालय स्वास्थ्य कार्यक्रम के तहत जिन घटकों को शामिल किया जाना चाहिए उनमें प्रमुख हैंः चिकित्सा सुविधाएं, स्वच्छ और साफ़-सुथरा विद्यालयी माहौल, विद्यालय में दिया जाने वाला गर्म पका पकाया भोजन, स्वास्थ्य, योग तथा शारीरिक शिक्षा। विद्यालय स्वास्थ्य कार्यक्रमों में शिक्षा तथा स्वास्थ्य विभाग के बीच बेहतर तालमेल होना चाहिए, साथ ही स्वास्थ्य विभाग की ओर से विद्यालय के सभी स्तरों पर रक्षात्मक, उपचारात्मक और प्रोत्साहित करने वाली सेवाएँ उपलब्ध कराई जानी चाहिए। प्राथमिक विद्यालय के विद्यार्थियों को कक्षा में स्वास्थ्य संबंधी निर्देश कम से कम दिए जाएँ। यहाँ ज्यादा जरूरी उनमें स्वच्छता संबंधी आदतें डालना है।
बच्चों का शारीरिक, मानसिक, सामाजिक विकास तब ही सम्भव है जब वह स्वास्थ्य होंगे। बच्चों को स्वास्थ्य रहने के लिए बीमारी से मुक्त होना जरूरी है। सभी बच्चों के स्वास्थ्य की जांच समय पर की जाय। स्वास्थ्य की जांच और उपचार के साथ ही विटामिन और खनिज तत्वों भी उपलब्ध कराया जाए। बच्चों के चहूँमुखी विकास में स्वास्थ्य ही अहम भूमिका है। बच्चों के स्वास्थ्य का शिक्षा के साथ सीधा संबंध है। स्वस्थ्य बच्चा प्रत्येक दिन बिना किसी बाधा के विद्यालय में जायेगा और उसका शैक्षणिक मानसिक विकास हो पायेगा। जिसका सीधा प्रभाव बच्चों की उपस्थिति पर पड़ता है। प्रत्येक दिन विद्यालय आने वाले बच्चों की शैक्षिक प्रगति दर्ज़ होती है। जो बच्चें विद्यालय में कम पाते है उनमें छीजन (drop out) ज्यादा होती है। विद्यालय में होने वाली छीजन को रोकने के लिए विद्यालय स्वास्थ्य जाँच कार्यक्रम मददगार होगा।

उत्तर प्रदेश में लगभग 50 प्रतिशत से अधिक बच्चे कुपोषण से प्रभावित हैं तथा 10 प्रतिशत गम्भीर कुपोषण से ग्रस्त हैं। इसका मुख्य कारण पेट में कीड़े होना, आयरन की कमी और सही समय पर चिकित्सकों द्वारा देखभाल एवं परामर्श हो पाना हैं। इस स्थिति को सुधारने के उद्देश्य से भारत सरकार द्वारा 1996 मेंविद्यालय स्वास्थ्य कार्यक्रम-1996’ (School Health Programme-1996) शुरू किया। स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय ने मानव संसाधन विकास मंत्रालय, स्कूल शिक्षा और साक्षरता विभाग के साथ मिलकर देश के सभी प्राथमिक विद्यालयों में जाने वाले बच्चों के लिए शुरू किया। उत्तर प्रदेश में वर्ष 2008 में राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन कार्यक्रम के अर्न्तगत विद्यालय स्वास्थ्य कार्यक्रम प्रारम्भ किया गया। इसमें प्रत्येक छः माह पर एक बार चिकित्सकों की टीम विद्यालय पहुंचेगी एवं विद्यालयों में समस्त बच्चों का स्वास्थ्य परीक्षण करेगी। यह टीम बच्चों को डिवर्मिंग की गोलियां खिलायेगी तथा विद्यालय के पास आईएफए की गोलियां रखीं जायेगी जो नियमित रूप से प्रधानाध्यापक द्वारा बच्चों को दी जायेगी। इसी अवसर पर सभी बच्चों की दृष्टि का परीक्षण भी किया जायेगा। इसके साथ ही जो बच्चे किसी गम्भीर रोग से ग्रस्त होंगे उनको चिकित्सालयों में संदर्भित किया जायेगा। जहां उनकी देखभाल विशेषज्ञों द्वारा की जायेंगी।
विद्यालय स्वास्थ्य कार्यक्रम, राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन के तहत विद्यालय स्वास्थ्य सेवा का एक अहम कार्यक्रम है। राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन के तहत देशभर की आबादी के स्वास्थ्य की प्रभावी देखभाल प्रदान करना जो मिशन के दृष्टिकोण में एक प्रभावी एकीकरण पर केंद्रित स्वास्थ्य की चिंताओं का विकेन्द्रीकृत कार्यक्रम है। जिले में स्वच्छता, पोषण निर्धारक, सुरक्षित पीने का पानी, लिंग और सामाजिक चिंता का विषय भी है।
विद्यालय स्वास्थ्य कार्यक्रम, सार्वजनिक क्षेत्र का एक मात्र ऐसा कार्यक्रम है जो विद्यालय उम्र के बच्चों पर केंद्रित है। इसका मुख्य ध्यान बच्चों की शारीरिक और मानसिक जरूरतों पर केंद्रित है और इसके अलावा यह पोषण, योग सुविधाओं और परामर्श प्रदान करने में हस्तक्षेप करता है। वर्तमान और भविष्य के अच्छे स्वास्थ्य, बेहतर शैक्षिक परिणामों को सुनिश्चित करने तथा सामाजिक समानता में सुधार और सभी सेवाओं के लिए लागत में प्रभावी ढंग से लागू कराना तथा बच्चों के विकास में अन्य निवेश की प्रभावकारिता बढ़ जाती है।
राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन के कार्यन्वयन के तहत विकेन्द्रीकृत ढांचा सक्षम है तथा राज्य विद्यालय स्वास्थ्य कार्यक्रम के लिए व्यापक रणनीति विकसित की गयी है।
कार्यक्रम के उद्देश्य
विद्यालय स्वास्थ्य कार्यक्रम के उद्देश्य निम्नलिखित हैः-
Ø  सरकारी और सरकारी सहायता प्राप्त प्राथमिक विद्यालय एवं उच्च प्राथमिक विद्यालयों में पंजीकृत सभी बच्चों का वार्षिक स्वास्थ्य परीक्षण।
Ø  विद्यालयों के सभी बच्चों में स्वास्थ्य और न्युट्रिशन संबंधित समस्याओं का सामूहिक रूप से दूर करना।
Ø  बच्चों के रोगों की जांच और उपेक्षित कार्यवाही के लिए भेजना।
Ø  बच्चों में स्वास्थ्य और साफ-सफाई प्रति जागरूकता पैदा करना।
Ø  बच्चों की स्वास्थ्य जांच के माध्यम से विद्यालयों और समाज में स्वास्थ्य के प्रति जागरूकता लाना
Ø  मध्याह्न भोजन में माइक्रोन्युट्रियन्ट को सुनिश्चित करना।

विद्यालय स्वास्थ्य कार्यक्रम : स्वास्थ्य सेवा के प्रावधान
Ø  स्क्रीनिंग, स्वास्थ्य देखभाल और रेफरलः
·  सामान्य स्वास्थ्य की जांच, रक्ताल्पता/ पोषण की स्थिति का आकलन, दृश्य तीक्ष्णता, सुनने की समस्याओं, दंत चिकित्सा, सामान्य त्वचा रोग, दिल दोष, शारीरिक दिव्यांग/निःशक्तताग्रस्त बच्चें, सीखने में विकार, व्यवहारिक समस्याएं, आदि।
· सभी विद्यालय जाने वाले बच्चों के बीच प्रचलित बीमारियों का ख्याल रखना बुनियादी चिकित्सा किट प्रदान की जाएगी।
·  प्राथमिक सेवाओं के लिए जिला/उप जिला अस्पतालों के लिए रेफरल कार्ड।
Ø  टीकाकरण
·  राष्ट्रीय अनुसूची के अनुसार,
·  निश्चित दिन की गतिविधि,
·  इस मुद्दे के बारें में शिक्षा के साथ युग्मित।
Ø  सूक्ष्मपोषक( विटामिन और आई.एफ.) प्रबंधन
· साप्ताहिक आयरन-फोलेट की गोलियां का वितरण एवं जानकारी देना,
·  जरूरतमंदों को विटामिन-ए का प्रबंधन।
Ø  डि-वर्मिग
·  राष्ट्रीय दिशा-निर्देशों के अनुसार,
·  वर्ष में दोबार अनुसूची की देखरेख करना,
· पहले की सूचना शिक्षा संचार (IEC) सामग्री का उपयोग करना,
·  छात्रों के भाई-बहन को भी आच्छादित करना।
Ø  विद्यालय स्वास्थ्य कार्यक्रम को विद्यालयों में बढ़ावा देना
·  परामर्श सेवाएं,
·  योग का नियमित अभ्यास, शारीरिक शिक्षा, स्वास्थ्य शिक्षा,
· स्वास्थ्य प्रशिक्षकों को सहकर्मी लीडर की तरह विकसित करना,
·  कुछ जगहों पर किशोर स्वास्थ्य शिक्षा शुरू करना,
·  विद्यालय के बाहर (Out of school) के बच्चों को भी जोड़ना,
· स्वास्थ्य क्लब, स्वास्थ्य संसद बनाना,
·  प्राथमिक चिकित्सा कक्ष/कॉर्नर या क्लीनिक बनाना।
कार्यक्रम का प्रबंधन
विद्यालय स्वास्थ्य कार्यक्रम के संचालन के लिए प्रबंधन संरचना। विद्यालय स्वास्थ्य कार्यक्रम का प्रबंधन राज्य से लेकर विद्यालय तक कई स्तरों पर करना होगा। इसकी व्यवस्था राज्य, जिला, विकास खण्ड़ और विद्यालय के स्तरों पर करनी होगी क्योंकि इसमें कई एजेन्सियाँ की भागीदारी है। कार्यक्रम को चलाने एवं क्रियान्वयन के लिए विभिन्न एजेन्सियों और विभागों के बीच समन्वय और तालमेल की आवश्यकता है। विद्यालय स्वास्थ्य कार्यक्रम में राज्य, जिला, प्रखंड और विद्यालय के स्तरों पर प्रबंधन की संरचना निम्नलिखित होगी।

योजना का संचालन
इस योजना के संचालन के लिए प्रत्येक जनपद में जिलाधिकारी की अध्यक्षता में एक जनपदीय टास्कफोर्स का गठन निम्नवत् किया जायेगाः-
अध्यक्ष       -   जिलाधिकारी
उपाध्यक्ष     -   मुख्य विकास अधिकारी
सदस्य        -   मुख्य चिकित्साधिकारी
  बेसिक शिक्षा अधिकारी
  जिला कार्यक्रम अधिकारी (आईसीडीएस)
  जिला पंचायत राज अधिकारी
  महिला सामाख्या की प्रतिनिधि
  स्थानीय एनजीओ के दो प्रतिनिधि
  स्थानीय एनजीओ के दो प्रतिनिधि 
     (जिलाधिकारी द्वारा नामित)
सदस्य       -   जनपदीय नोडल अधिकारी 
                    (अपर/ उप मुख्य चिकित्साधिकारी)

यह टास्कफोर्स इस कार्यक्रम के संचालन एवं पर्यवेक्षण के लिए समस्त कार्यवाही सुनिश्चित करेगी और यह भी सुनिश्चित करेगी कि कार्यक्रम में समस्त सम्बन्धित विभागों का सहयोग प्राप्त हो। मुख्य चिकित्साधिकारी योजना के संचालन हेतु एक उप मुख्य चिकित्साधिकारी को नोडल अधिकारी नामित करेंगे जो जनपदीय टास्क फोर्स का सदस्य सचिव होगा। विकास खण्ड स्तर पर विकास खण्ड स्तरीय पी.एच.सी./सी.एच.सी. के प्रभारी चिकित्साधिकारी इस कार्यक्रम के नोडल अधिकारी होंगे।

जनपदीय कार्य योजना
जनपदीय नोडल अधिकारी एवं जिला बेसिक शिक्षा अधिकारी विचार-विमर्श कर विकास खण्डों एवं जनपदीय कार्य योजना को अन्तिम रूप देंगे। जनपदीय कार्य योजना में विकास खण्ड स्तरीय कार्य योजनाओं के साथ-साथ जनपद की समग्र कार्य योजना का संकलित ब्यौरा होगा। कार्य योजना को जिला टास्कफोर्स की बैठक में अनुमोदित करने के बाद योजना का क्रियान्वयन किया जायेगा।
विद्यालयों में स्वास्थ्य परीक्षण कार्यक्रम
Ø  विद्यालय के लिए निर्धारित स्वास्थ्य परीक्षण की तिथि के पूर्व ही नोडल अधिकारी द्वारा विद्यालय स्वास्थ्य रजिस्टर एवं प्रत्येक बच्चे को दिये जाने वाले स्वास्थ्य कार्ड की पर्याप्त प्रतियां जिला बेसिक शिक्षा अधिकारी के माध्यम से सम्बन्धित विद्यालयों के प्रधानाचार्य को उपलब्ध करा दी जायेंगी, जो विद्यालय में नामांकित प्रत्येक बच्चें के सम्बन्ध में वांछित विवरण स्वास्थ्य परीक्षण के लिए नियत तिथि के पूर्व ही भरकर तैयार रखेंगे।
Ø  स्वास्थ्य परीक्षण के लिए निर्धारित तिथि को मेडिकल टीम एवं शिक्षा विभाग के नामित पर्यवेक्षण अधिकारी सम्बन्धित विद्यालय में पहुंच जायेंगे। यह सुनिश्चित किया जाये कि स्वास्थ्य परीक्षण दिवस पर सम्बन्धित प्रधान एवं वी.ई.सी./एस.एम.सी. के सदस्य भी  विद्यालय में उपस्थित रहें उनकी देखभाल में यह कार्यक्रम चले।
Ø  मेडिकल टीम में निम्न अधिकारियों/कर्मचारियों की उपस्थिति सुनिश्चित की जायेः-
·   चिकित्सा अधिकारी,
· पैरा मेडिकल स्टाफ (स्टाफ नर्स/फार्मेसिस्ट/एच.वी./ए.एन.एम.),
·  गाँव की आशा कार्यकर्त्री,
·  रिफ्रेक्शनिस्ट (यथा उपलब्धता),
·   डेन्टल हाईजेनिक (यथा उपलब्धता)
Ø  स्वास्थ्य परीक्षण टीम अपने साथ वज़न की मशीन, मेजरिंग स्केल, सामान्य औषधियां (यथा पैरासीटामाल, कोट्राईमोक्साजोल, बेंजाइल बेंजोएट, एन्टीबायोटिक स्किन क्रीम, एलबेन्डाजाल, आयरन फोलिक एसिड (छोटी) की गोलियां, .आर.एस. पैकट, विटामिन ’’’’ सीरप, आदि) एवं आवश्यक उपकरण यथा टार्च, विजन चार्ट आदि साथ लेकर जायेंगे। यह टीम अपने साथ बच्चों के लिए राज्य स्तर से भेजे गये आई..सी. मैटिरियल भी विद्यालय में ले जायेगी उसका प्रदर्शन विद्यालय में सुनिश्चित करेगी।
Ø  मेडिकल टीम द्वारा प्रत्येक बच्चे का स्वास्थ्य परीक्षण निम्न बिन्दुओं पर किया जायेगा :-
·   बच्चें का वज़न एवं लम्बाई की जायेगी।
·  बच्चे की दृष्टि ;टपेपवदद्ध की जाँच कर आवश्यकतानुसार चश्मे हेतु संदर्भित किया जायेगा।
·  बच्चे के नाक, कान, गले एवं दांतों की जाँच की जायेगी।
· बच्चे का सामान्य स्वास्थ्य परीक्षण एवं त्वचा संबंधी रोगों की क्लीनिकल जाँच की जायेगी।
· अन्य बिन्दु जो सामान्य परीक्षण में देखे जा सकते है।
Ø  स्वास्थ्य परीक्षण के साथ-साथ प्रत्येक बच्चे को डिवर्मिंग की गोली चिकित्सक की उपस्थिति में दी जायेगी और साथ ही जितने बच्चों का परीक्षण हुआ है उनमें से प्रत्येक के लिए 50 गोलियों की दर से आई.एफ.. गोलियां पैकिंग समेत संबंधित प्रधानाध्यापक को दी जायेंगी। संबंधित प्रधानाध्यापकों/अध्यापकों का यह दायित्व होगा कि वह छः माह में यह 50 गोलियां बच्चों को नियमित अन्तराल पर ’’मध्याह् भोजन’’ के साथ खिलायें। सुविधा के लिए यह उचित होगा कि आई.एफ.. टेबलेट्स देने के लिए सप्ताह में दो दिवस नियत कर कदये जायें और उन्ही दिवसों पर यह आई.एफ.. टेबलेट्स बच्चों को दी जायें।
Ø  प्रत्येक बच्चे की जाँच होने के साथ-साथ उपरोक्त विवरण निर्धारित प्रारूप पर विद्यालय में रखे जाने वाला स्वास्थ्य परीक्षण रजिस्टर एवं प्रत्येक बच्चे के लिए तैयार किये जाने वाले बाल स्वास्थ्य कार्ड में अंकित किया जायेगा।
Ø  बच्चों की जाँच के साथ-साथ मेडिकल टीम द्वारा बच्चों एवं उपस्थित अभिभावकों को व्यक्तिगत स्वच्छता एवं हाईजीन के बारे में परामर्श दिया जायेगा। विशेष तौर पर खाने के पहले व शौच के बाद साबुन से हाथ धोना, नाखून काटना, बालों के जुंए साफ करना, नियमित रूप से स्नान करना, साफ कपडे़ पहनना आदि।
Ø  प्रत्येक बच्चे के लिए आई.एफ.ए. गोलियां राज्य स्तर से क्रय कर जनपदों को उपलब्ध कराई जायेंगी। अन्य सभी सामग्री का क्रय एवं बाल स्वास्थ्य कार्ड एवं रेफरल कार्ड का मुद्रण जनपद स्तर पर सुनिश्चित किया जायेगा तथा विकास खण्ड स्तरीय पी.एच.सी. को उपलब्ध कराया जायेगा।
Ø  जिन बच्चों में विशेष मेडिकल समस्या परिलक्षित होती है उनका पूरा विवरण रेफरल स्लिप में भरकर प्रधानाध्यापक को इस आशय से दिया जायेगा कि वह बच्चे के अभिभावक को हस्तगत करा दें और यह निर्देश दिये जाये कि वह अभिभावक संबंधित पी.एच.सी./ब्लॉक सी.एच.सी. पर बच्चे को मेडिकल परीक्षण/उपचार के लिए ले जायें। संबंधित मुख्य चिकित्साधिकारी का यह दायित्व होगा कि वह सभी पी.एच.सी. एवं सी.एच.सी. को निर्देश दें कि इस प्रकार से रेफर होने वाले बच्चों का उपचार प्राथमिकता पर हो और इसका रिकार्ड भी अलग से रखा जाय।
Ø  स्वास्थ्य परीक्षण टीम जब विद्यालय जाये तो ’’मध्याह् भोजन’’ बनाने वाले रसोइयों का स्वास्थ्य परीक्षण भी किया जाये और उन्हें डिवर्मिंग की गोली अनिवार्य रूप से दी जायें।
Ø  स्वास्थ्य परीक्षण कार्यक्रम में यह प्रयास किया जाना चाहिए कि आशाओं एवं स्थानीय प्रधानों के माध्यम से प्रचार-प्रसार कर अधिकाधिक अभिभावक भी परीक्षण के समय उपस्थित रहें ताकि उन्हें उनके बच्चों के स्वास्थ्य के संबंध में स्थिति से अवगत कराया जा सके और साथ ही बच्चों के पोषण की समस्या में सुधार के लिए उनके स्तर पर क्या कार्यवाही की जा सकती है, उससे भी अवगत कराया जा सके।
Ø  स्वास्थ्य कार्ड पर संबंधित अभिभावक के हस्ताक्षर होने के उपरान्त कार्ड वापस विद्यालय में जमा कर संरक्षित रखा जायेगा और अगली बार होने वाले परीक्षणों के समय इसी कार्ड पर आगे प्रविष्टियां की जायेंगी।
योजना का वित्त पोषण
Ø  यह योजना राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन के अन्तर्गत आर.सी.एच. फ्लैक्सीपूल से वित्त पाषित होगी। वित्तीय व्यवस्था राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन द्वारा की जायेगी।
योजना का अनुश्रवण एवं पर्यवेक्षण
Ø  स्वास्थ्य परीक्षण कार्यक्रम मुख्य चिकित्सा अधिकारी एवं जिला बेसिक अधिकारी के पर्यवेक्षण में संचालित होगा और इसकी मासिक प्रगति की समीक्षा जनपदीय टास्कफोर्स/ जिला स्वास्थ्य समिति द्वारा की जायेगी। जिलाधिकारी अपने स्तर से जनपद के वरिष्ठ अधिकारियों को इन स्वास्थ्य परीक्षणों के आकस्मिक निरीक्षणों हेतु भी नामित कर दें ताकि कार्यक्रम की गुणवत्ता पर नियंत्रण रखा जा सके।
Ø  स्वास्थ्य दिवस के उपरान्त संबंधित चिकित्सा अधिकारी एवं शिक्षा विभाग के संबंधित पर्यवेक्षण अधिकारी के संयुक्त हस्ताक्षर से एक रिपोर्ट अगले कार्य दिवस को ब्लॉक चिकित्सा अधिकारी, नोडल अधिकारी एवं जिला बेसिक शिक्षा अधिकारी को भेजी जायेगी। उक्त के आधार पर विकास खण्ड की संकलित रिपोर्ट जनपद मुख्यालय को प्रेषित की जायेगी।
Ø  प्रत्येक विद्यालय में आई.एफ.ए. के विवरण के संबंध में एक रजिस्टर रखा जायेगा। यह रजिस्टर प्रभारी ब्लॉक पी.एच.सी. द्वारा कन्टीन्जेन्सी से क्रय कर उपलब्ध कराया जायेगा जिनका उत्तरदायित्व होगा कि वह इस रजिस्टर को अद्यावधिक रखें।
Ø  प्रत्येक जनपद से इस कार्यक्रम की मासिक, भौतिक एवं वित्तीय प्रगति की रिपोर्ट संबंधित मुख्य चिकित्साधिकारी द्वारा महानिदेशक, परिवार कल्याण को प्रषित की जायेगी।

कार्य योजना का प्रचार-प्रसार
विद्यालय स्वास्थ्य कार्यक्रम का सफलता के लिए यह आवश्यक होगा कि तैयार की गई कार्य योजना का व्यापक प्रचार-प्रसार मुख्य चिकित्साधिकारी एवं बेसिक शिक्षा अधिकारी द्वारा किया जाये, जिससे प्रत्येक गांव/बस्ती/वार्ड में इस बात की जानकारी हो कि उनके विद्यालय में किस तिथि को मेडिकल टीम पहुंचेगी, ताकि शत-प्रतिशत बच्चों एवं यथासम्भव अभिभावाकों की उपस्थिति भी सुनिश्चित हो सके। जिलाधिकारी यह भी सुनिश्चित करेंगे कि पंचायती राज विभाग एवं अन्य विकास विभागों के अधिकारियों/कर्मचारियों के माध्यम से भी यह सूचना व्यापक रूप से प्रसारित हो जाये।


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