शुक्रवार, जुलाई 24, 2020

ऑफिस

उसे काम नहीं आता,
रोज़ ऑफिस चला आता है,
जाने उसने वर्षों क्या किया,
खाली राजनीति के बल खड़ा रहा,
ये हैं शासन का ग़ुलाम,
काम इसे भी नहीं आता ,
ये ज़ुबान से भी तेज़ फिसलता है,
केंचुए से भी कम नरम,
इस आदमी की चमड़ी है,
दोस्तों!
दफ़्तर बैरंग है,
कागज़ पर हस्ताक्षर की क़ीमत,
केवल उसके सन्तोष के लिये,
घटे-बढ़े हमें क्या लेना,
शिक्षा तो आँकड़ों से चली है,
कोई न जोड़ पाया है,
बच्चों जो आज उपस्थित है ,
तुम केवल उन्हें गिनों,
जिन्हें सरकार गिनना चाहती है,
क्योंकि छूटे हुए देवताओं,
और देश के लोगों पर ही,
उसका काम आज तक टिका है,
वैसे वो करना नहीं चाहता,
समय उसे काट रहा है, या.....
वह दफ़्तर में दिनों की,
गिनती कर रहा है,
और उसे,
इंतज़ार है तबादले का।













Source: Photo byTirachard Kumtanom 

बुधवार, जुलाई 22, 2020

गरीबी और भूख

भोजन की उपलब्धता से तात्पर्य यह है कि प्रत्येक व्यक्ति का जीवन स्तर ऐसा हो कि जिसमें उसे जीने के लिए खाने की उपलब्धता पर इतनी भर चिन्ता हो कि वह कुछ घण्टे काम करके अपने लिए खाने का प्रबंध कर सकें। यह तब ही मुमकिन है कि जब समाज में गरीबी, भुखमरी और अकाल की स्थिति न हो। गरीबी का अर्थ यह है कि ऐसी वस्तुओं और सेवाओं का अभाव न रहे जो व्यक्ति की आवश्यकताओं को पूरा करती है, चाहे वह आवश्यकताएं मूल हो अथवा सामान्य हों। यह वस्तुएं और सेवाएं कृषि और कृषि से संबंधित संसाधनों से प्राप्त होती है।  
 
भारत में ग़रीबी दूर करने की दिशा में काम कर रहे प्रोफेसर ज़्यां द्रेज़ लिखते है कि भारत में मानव संसाधन के विकास की ओर कभी ध्यान नहीं दिया जाता है, जिसके चलते लोग अनपढ़ हैं उनका स्वास्थ्य ख़राब है और बच्चे भूखे है।  अस्सी के दशक में भारत के प्रधानमंत्री के एक भाषण को देखे तो पता चलता है कि देश में कुपोषण और गरीबी को किस तरह नाकारा गया है “मैंने अपना अधिक समय देश में यात्रा करने में बिताया। विषेष रूप से गत तीन वर्षों में जब मेरे पास कोई सरकारी सवारी नहीं थी, मुझे कोई भी कुपोषण का उदाहरण नहीं मिला। वास्तव में बच्चें अधिक स्वस्थ दिखाई दिए। उनकी आंखें अधिक चमकीली थीं और वे अधिक अच्छे कपड़े पहने हुए थे।’’  जबकि उस वक्त दिल्ली शहर में ही 26 प्रतिशत लोग गंदी बस्तियों में रहते हैं या गरीबी स्तर से बहुत ही नीचे हैं। इसका कारण यह है कि जो भूख और कुपोषण में जीते हैं, उनके पास आर्थिक ताकत की कमी है, वे प्रायः अदृष्य रहते हैं, राजनैतिक रूप में महत्वहीन हैं और असंगठित हैं। क्या यह एक अत्याचार नहीं है कि जनसंख्या के अन्य हिस्सों की तुलना में दलितों और आदिवासियों में पोषण-स्तर कमतर है।

भूखशिक्षा और हाशिये के लोग के बारें में पढ़ें 

सामान्य गरीबी, नियमित भुखमरी या अकाल आदि के प्रभावों की सही समझ-बूझ के लिए समाज के स्वामित्व अधिकारों के स्वरूप और विनिमय अधिकारिताओं तथा उनकी अन्तर्निहित शक्तियों पर गौर करना आवश्यक है, इसके लिए उत्पादन विधाओं की प्रकृति, आर्थिक वर्ग संरचना और उनके अंतरसंबंधों  का सूक्ष्म अध्ययन आवश्यक हो जाता है। इस लेख में वास्तविक अकाल अवस्थाओं के विश्लेषण में इन मुद्दों को और अधिक सुस्पष्ट एवं स्थूल स्वरूप प्राप्त होगा। खाद्य आपूर्ति पर मालीकाना हक़ एक प्रकार का अधिकार है, जो हक़दारी का दावा करता है लेकिन यह दावा भुखमरी के दौर में पूंजीपतियों के लाभ के लिए उपयोग किया गया एक बाजारीय प्रापेंगेन्डा है न की कोई मौलिक अधिकार।
संविधान और भोजन का अधिकार के बारें में पढ़ें 

अतः भुखमरी के विश्लेषण के लिए अधिकारिता की अधिकारिकता की व्यवस्था को समझना होगा। यह बात गरीबी के सन्दर्भ में और भी स्वाभाविक हो जाती है। अकाल या  भुखमरी के दौर में तो यह अपने आप में ही सिद्ध होती प्रतीत है। भारत में भूख पर बात करना चाहते है क्योंकि भारत में भूख अभी भी पर्याप्त रूप से फैली हुई है दुनिया की आबादी का बीस प्रतिशत हिस्सा इसी भारत की सीमाओं में समाया हुआ है।  भारत में लगभग 20 करोड़ लोग रोज़ भूखे सोते हैं और लगभग 5 करोड़ लोग भुखमरी के कगार पर हैं यानि आसानी से कहा जा सकता है कि दुनिया की आबादी में से लगभग 25 करोड़ लोग भुखमरी के कगार पर है।

चरण सिंह ने अपनी किताब “भारत की भयावह आर्थिक स्थिति: कारण और निदान में लिखते हैं कि अमरीका और आस्ट्रेलिया में किसी भी भोजनालय में दो डालर में स्वच्छ और बगैर मिलावट का शुद्ध भोजन मिल सकता है जो आस्ट्रेलिया और अमरीका के मजदूर की एक घंटे की मजदूरी है जबकि भारत के निर्माणकार्य में लगी हुई अकुशल महिला मजदूर को दिन भर काम करने पर पेट भर भोजन ही किसी ढाबे में मिल सकेगा। जीवित रहने के लिए जब पर्याप्त भोजन नहीं मिलता उस स्थिति को भुखमरी कहा जाता है। इसका सीधा सा कारण है खाने को पर्याप्त भोजन न होना। भुखमरी फैलने का एक कारण हो सकता है खाद्य आपूर्ति या हम कह सकते है कि आम आदमी की पहुँच भोजन तक नहीं है।

भारत में नीति-निर्धारकों ने कुछ हद तक कुपोषण की लगातार उपस्थिति को तो स्वीकार कर लिया जाता है और हल भी निकाला है, बेशक वह मुकम्मिल नही होता, किन्तु भयंकर भूख की स्थितियों या दीर्घकालिक भूख की क्षेत्रीय स्थितियों को कम ही स्वीकार किया जाता है, उसका अध्ययन या हल कम ही किया जाता है। जैसा पहले ही कहा गया है स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद शुरू के वर्षों में खाद्य-असुरक्षा का भारी खतरा जो हमारे देश की करोड़ों की आबादी पर मंडरा रहा था वह अकाल और भारी भुखमरी का था जो कम कृषि उत्पादकता का नतीजा था जिसका कारण कृषि उत्पादकता का अस्थिर मानसून पर निर्भर होना और भूमि और खाद्य का अत्यधिक असमान वितरण था। कुछ भूमि-सुधारों, 1974 से 2004 तक मात्र तीन दशकों में खाद्य उत्पादन में हुई भारी वृद्धि, सार्वजनिक वितरण प्रणाली के तहत देश भर में राशन की दुकानों के बड़े जाल द्वारा खाद्य वितरण में लाए गए सुधार के कारण, यह खतरा काफी हद तक टला है। भारत का कल्याण कृषि से अधिक अच्छा और शीघ्रता से किया जा सकता है। कृषि से भोजन और कपड़ा मिल सकता है तथा घरेलू अथवा लघु उद्योग भी उपलब्ध हो जाते है जिन्हें उत्तरोत्तर बढाने की आवश्यकता है और मेहनत-मजदूरी को कम करने की आवश्यकता नहीं है।


भारत में भोजन की स्थिति पर आधिकारिक दृष्टिकोण भोजन-उत्पादन आपूर्ति पक्ष में वृद्धि पर ध्यान केन्द्रित करने का होता है और भुखमरी को अपवाद की रूप में प्रस्तुत किया जाता है, जो अधिकांशत: मानसून की कमी या प्राकृतिक आपदाओं के कारण पैदा हुई। हरित क्रांति ने आश्वस्त किया कि भारत में जनसंख्या में वृद्धि की तुलना में खाद्यान्न-उत्पादन में वृद्धि आगे रहे। दीर्घकालिक कमी की स्थिति से निकल कर देश आज अधिकांश खाद्य-पदार्थों में सरपल्स और निर्यात के युग में आ गया है। देश खाद्यान्न उत्पादन में आत्मनिर्भर है और इस समय हमारे पास लगभग 6 करोड़ टन का बफर स्टॉक है। पर्याप्त उत्पादन हासिल करने के कदमों के साथ-साथ जन वितरण प्रणाली के माध्यम से सही समय पर और वहनीय दरों पर सही गुणवत्ता और मात्रा का खाद्यान्न सही स्थानों और लोगों तक पहुँचाने की आवश्यकता है।

शहरी भारत की भोजन असुरक्षा एटलस के अनुसार शहरों में लोगों द्वारा ली जा रही औसत कैलोरी ग्रामीण इलाकों की तुलना में कम है और शहरी और ग्रामीण भारत, दोनों ही जगह पिछले तीन दशकों में कैलोरीज़ की खपत थोडी़ सी कम हुई है। फिर भी भूख के विरूद्ध जंग अभी भी किसी भी तरह से जीती नहीं गयी है। जनता के दबाव और राज्य की कार्रवाई अकालों को न होने की अपेक्षा भूख पर काबू पाने या पर्याप्त पोषण जोकि न केवल जिंदा रहने के लिए बल्कि एक स्वस्थ और सक्रिय जीवन के लिए आवश्यक है उस वंचना से निपटने में कम सफल रहे हैं।
विश्व की कुल जनसंख्या में से 35 करोड़ लोग ऐसे है जो बिलकुल ही निराश्रित है और जिनके रहने के लिए मकान तक नहीं है और जो सड़कों की पटरियों और पुलों पर रहते है और जिन्हें अपना पेट कूड़ेंदानों और कूड़े के ढेरों से खाद्यान्न बीनकर भरना पड़ता है और अधिकांश इस प्रकार के निराश्रित व्यक्ति भारतीय उपमहाद्वीप में ही रहते है। भुखमरी पर विमर्श का फोकस भुखमरी से मर रहे लोगों पर न होकर उन लोगों पर होना चाहिए जो जीवन के हिस्से के रूप में भुखमरी के साथ जी रहे हैं। इसका गहरा संबंध उतने ही उपेक्षित मुद्दे  दरिद्रता से है, जिस बात को बिलकुल ही महत्व नहीं दिया जाता वह यह है कि भूख से मौत एक बहुत ही चिरकालिक, अदृष्य दरिद्रता की बीमारी का परिणाम है।

हम लोगों को पर्याप्त मात्रा में सन्तुलित आहार का सेवन करना चाहिये, मांस-मछली, दूध-घी, शाक-सब्जी, फल-फूल अधिक से अधिक मात्रा में सेवन करना चाहिए। परन्तु यह कहने से पूर्व क्या हम इस बात को भी सोचते है कि हममें से कितने ऐसे जोग है जो इन पदार्थों का उपयोग करने में समर्थ है।